प्रार्थना
शुक्लां बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम्॥
श्री ललिता सहस्रनाम के तेरहवें नाम में माँ के सुगंधित केश-पाश का वर्णन करने के बाद, अब वाग्देवियाँ भगवती के 'कोटीर' (मुकुट) की भव्यता का वर्णन करती हैं। चौदहवाँ नाम है 'कुरुविन्द-मणि-श्रेणी-कनत्-कोटीर-मण्डिता'। यह नाम माँ ललिता को संपूर्ण ब्रह्मांड की 'अधिष्ठात्री साम्राज्ञी' के रूप में प्रतिष्ठित करता है।
यह नाम पाँच महत्वपूर्ण शब्दों से मिलकर बना है: कुरुविन्द-मणि (विशेष प्रकार की श्रेष्ठ पद्मराग मणियाँ) + श्रेणी (पंक्तियाँ या कतारें) + कनत् (देदीप्यमान या चमकता हुआ) + कोटीर (मुकुट) + मण्डिता (सुशोभित या अलंकृत)। पूर्ण अर्थ: "वह देवी, जिनका मुकुट श्रेष्ठ पद्मराग मणियों (माणिक्य) की कतारों से अत्यंत देदीप्यमान और सुशोभित है।"
सौन्दर्य लहरी श्लोक 42
आदि शंकराचार्य ने 'सौन्दर्य लहरी' में भगवती के मुकुट की महिमा का अद्भुत वर्णन किया है, जो इस नाम की व्याख्या को और स्पष्ट करता है:
गतैर्माणिक्यत्वं गगनमणिभिः सान्द्रघटितं किरीटं ते हैमं हिमगिरिसुते कीर्तयति यः।
स नीडेयच्छाया-च्छुरण-शबलं चन्द्रशकलं धनुः शौनाशीरं किमिति न निबध्नाति धिषणाम् ॥
भावार्थ: "हे हिमवान की पुत्री! जो आपके स्वर्ण मुकुट का वर्णन करता है, जो बारह सूर्यों (द्वादश आदित्य) के मणिरूप में परिवर्तित होकर आपस में जुड़ जाने से बना है, उसे उस मुकुट में जड़ा हुआ 'चन्द्र-शकल' (अर्धचन्द्र) मणियों की रंग-बिरंगी किरणों के परावर्तन के कारण इंद्रधनुष जैसा प्रतीत होता है।"
यह श्लोक दर्शाता है कि माँ का मुकुट कोई साधारण आभूषण नहीं है; इसमें स्वयं द्वादश आदित्यों (12 सूर्यों) का तेज मणियों के रूप में समाहित है।
'देवी भागवत पुराण' के अनुसार, भगवती ललिता मणिद्वीप के केंद्र में स्थित चिन्तामणि गृह में विराजमान हैं। वहां उनका स्वरूप 'राजराजेश्वरी' का है। पुराणों में वर्णन है कि उनका मुकुट इतना प्रभावशाली है कि उसकी आभा से संपूर्ण ब्रह्मांड प्रकाशित होता है। उनके मुकुट में स्थित अर्धचन्द्र सोलहवीं कला (अमृत कला) का प्रतीक है, जो शाश्वत चेतना को दर्शाता है।
मुकुट शासन और अधिकार का प्रतीक है। 'कुरुविन्द-मणि' (लाल मणियाँ) रजोगुण और सृजनात्मक ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो माँ की अजेय शक्ति को दर्शाती हैं।
सहस्रार चक्र से संबंध: योग मार्ग में, मुकुट का ध्यान सहस्रार चक्र (मस्तिष्क का शीर्ष भाग) पर किया जाता है। मुकुट की मणियों की चमक उस ब्रह्म-ज्योति का प्रतीक है जो अज्ञान के अंधकार को मिटा देती है। यह मुकुट उस साम्राज्ञी का है जो ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव रूपी 'पंच-प्रेतों' को अपनी शक्ति से सक्रिय करती हैं।
