प्रार्थना
शुक्लां बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम्॥
श्री ललिता सहस्रनाम के सत्ताईसवें नाम में माँ की वीणा से भी मधुर वाणी का वर्णन करने के बाद, वाग्देवियाँ अब उनके मुख-सौंदर्य की उस अवस्था का वर्णन करती हैं जहाँ शब्द मौन हो जाते हैं और केवल एक 'मंदस्मित' (कोमल मुस्कान) शेष रहती है। अट्ठाइसवाँ नाम है 'मंदस्मित-प्रभा-पूर-मज्जत्-कामेश-मानसा'। यह नाम भगवती की मुस्कान को केवल एक शारीरिक विशेषता नहीं, बल्कि एक ऐसा 'प्रकाश-पुंज' मानता है जिसमें स्वयं परमशिव (कामेश्वर) का मन डूबा रहता है।
यह नाम माँ की मुस्कान की गहराई को स्पष्ट करता है: मंदस्मित (अत्यंत कोमल और सौम्य मुस्कान) + प्रभा-पूर (कान्ति का प्रवाह या बाढ़) + मज्जत् (डूबा हुआ या निमग्न) + कामेश-मानसा (भगवान कामेश्वर का मन)। पूर्ण अर्थ: "वह देवी, जिनकी मंद मुस्कान की कान्ति के प्रवाह में भगवान कामेश्वर का मन निरंतर डूबा रहता है"।
आदि शंकराचार्य ने 'सौन्दर्य लहरी' के 59वें श्लोक में माँ के मुखमंडल और मुस्कान के प्रभाव का वर्णन किया है:
स्फुरद्-गण्डाभोग-प्रतिफलित-ताटङ्क-युगलं चतुश्चक्रं मन्ये तव मुखमिदं मन्मथ-रथम्।
भावार्थ: आचार्य कहते हैं कि माँ का मुस्कुराता हुआ मुख कामदेव का वह दिव्य रथ है, जिसकी चमक स्वयं शिव को भी अपनी ओर आकर्षित कर लेती है। माँ की मुस्कान इतनी प्रभावशाली है कि वह शिव के उस मन को भी विचलित कर देती है जिसने कामदेव को भस्म कर दिया था।
महाकवि मूक कवि ने अपनी अमर कृति 'मूक पंचशती' का एक पूरा भाग (100 श्लोक) केवल माँ की इसी मुस्कान को समर्पित किया है, जिसे 'मंदस्मित शतकम्' कहा जाता है। वे कहते हैं कि माँ की मुस्कान साक्षात 'अद्वैत' की किरण है। जिस प्रकार चंद्रमा की चांदनी चकोर पक्षी को आनंद देती है, उसी प्रकार माँ का मंदहास साधक के हृदय के ताप को मिटाकर उसे परमानंद में डुबो देता है।
'देवी भागवत पुराण' के अनुसार, जब भगवती ललिता 'चिन्तामणि गृह' में कामेश्वर के वामांग (बाईं ओर) बैठती हैं, तब उनकी एक हल्की सी मुस्कान ही संपूर्ण ब्रह्मांड में 'आनंद' का संचार करती है। पुराणों में वर्णन है कि उनकी मुस्कान इतनी सुगन्धित और उज्ज्वल है कि वह कमल के केसर के समान श्वेत और देदीप्यमान प्रतीत होती है।
श्री विद्या साधना में, यह नाम एक अत्यंत गुप्त रहस्य को उजागर करता है। शिव 'प्रकाश' हैं और शक्ति 'विमर्श' हैं। मुस्कान 'विमर्श' का वह स्वरूप है जो 'प्रकाश' (शिव) को स्वयं के आनंद का अनुभव कराती है। शिव का मन माँ की मुस्कान में डूबने का अर्थ है शुद्ध चेतना का परमानंद में विलीन होना।
मुस्कान वह बिंदु है जहाँ 'इच्छा' पूर्णता को प्राप्त करती है। तन्त्र में माना जाता है कि माँ की मुस्कान से ही साधक के भीतर सोई हुई कुण्डलिनी शक्ति जागृत होकर सहस्त्रार में शिव से मिलने के लिए उद्यत होती है।
'मज्जत्' शब्द यहाँ महत्वपूर्ण है। यह दर्शाता है कि जिस प्रकार माँ की मुस्कान शिव के मन को डुबो देती है, वैसे ही वह भक्त के समस्त सांसारिक कष्टों और अहंकार को भी अपने भीतर विलीन कर लेती है।
'मंदस्मित-प्रभा-पूर-मज्जत्-कामेश-मानसा' नाम का ध्यान करने से साधक के जीवन में शांति और प्रसन्नता का उदय होता है। यह नाम हमें सिखाता है कि कठिन से कठिन परिस्थिति में भी माँ का एक 'मंदहास' हमारे जीवन को दिव्यता से भर सकता है। जब हम माँ के इस स्वरूप का चिंतन करते हैं, तो हमारा मन भी कामेश्वर की भांति उस शाश्वत आनंद के सागर में डूबने लगता है।
