प्रार्थना
शुक्लां बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम्॥
श्री ललिता सहस्रनाम के अड़तीसवें नाम में माँ की रत्नजड़ित करधनी का वर्णन करने के बाद, अब वाग्देवियाँ उनके विग्रह के उस भाग की ओर बढ़ती हैं जो सौंदर्य की पराकाष्ठा है और जिसका ज्ञान केवल परमेश्वर को है। उनतालीसवाँ नाम है 'कामेष-ज्ञात-सौभाग्य-मार्दवोरु-द्वयान्विता'। यह नाम भगवती के 'सौभाग्य' और उनके विग्रह की 'कोमलता' को एक अत्यंत गोपनीय और पवित्र संदर्भ में प्रस्तुत करता है।
इस नाम के प्रत्येक पद में रहस्य छिपा है। कामेष (भगवान कामेश्वर, जो इच्छाओं के स्वामी और माँ ललिता के प्रियतम हैं) + ज्ञात (जो जाना गया हो) + सौभाग्य (अत्यंत शुभ सुंदरता, वैभव या सुहाग) + मार्दव (कोमलता) + उरु-द्वय (जंघाओं का जोड़ा) + अन्विता (युक्त या सुशोभित)। पूर्ण अर्थ: "वह देवी, जिनकी जंघाओं के युग्म का अलौकिक सौभाग्य (सौंदर्य) और अद्वितीय कोमलता केवल भगवान कामेश्वर ही जानते हैं"।
ब्रह्माण्ड पुराण और ललितोपाख्यान ग्रंथों के अनुसार, जब माँ ललिता भंडासुर के वध हेतु प्रकट हुईं, तो उनके विग्रह का निर्माण देवताओं के तेज और चित-अग्नि से हुआ था। उनकी जंघाओं का सौंदर्य कामदेव के तरकश के समान बताया गया है, जो भगवान शिव के वैराग्य को भी भंग करने में सक्षम है।
मणिद्वीप के वर्णन में उल्लेख है कि माँ ललिता कामेश्वर की बाईं गोद में विराजमान हैं। यह नाम उसी स्थिति को दर्शाता है जहाँ शिव और शक्ति का पूर्ण एकीकरण होता है। त्रिपुरा रहस्य ग्रंथ माँ को 'तीन अवस्थाओं' (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) की अधिष्ठात्री बताता है। यहाँ 'ज्ञात' शब्द संकेत देता है कि शक्ति का वास्तविक स्वरूप केवल विशुद्ध चेतना (शिव) ही जान सकती है।
आदि शंकराचार्य ने 'सौन्दर्य लहरी' के 82वें श्लोक में (जो इस नाम के समान भाव रखता है) माँ की जंघाओं की तुलना स्वर्ण-कदली के स्तंभों और ऐरावत की सूंड से की है, और उन्हें 'अतुलनीय' बताया है।
'मूक पंचशती' में मूक कवि कहते हैं कि माँ कामाक्षी के अंगों की कोमलता साधक के कठोर से कठोर पापों और कर्म-बंधनों को पिघलाने वाली है। 'मार्दव' (कोमलता) यहाँ माँ के वात्सल्य और करुणा का प्रतीक है।
श्री विद्या साधना में, यह नाम 'सामरस्य' की उच्च अवस्था का प्रतीक है। तंत्र में जंघाओं को 'गुप्त' रखा जाता है। 'कामेष-ज्ञात' शब्द दर्शाता है कि परा-शक्ति का रहस्य अत्यंत गोपनीय है और इसे केवल गुरु की कृपा या शिवत्व की प्राप्ति के बाद ही जाना जा सकता है।
योगिनी हृदय और वामकेश्वर तंत्रों के अनुसार, माँ का शरीर स्वयं 'श्री चक्र' है। उनकी जंघाएँ उन आधारों का प्रतीक हैं जिन पर संपूर्ण सृष्टि टिकी है। जंघाएँ गति का प्रतीक हैं। माँ का यह स्वरूप साधक को संसार में रहते हुए भी आध्यात्मिक लक्ष्य की ओर निरंतर बढ़ने की प्रेरणा देता है।
'पराशुराम कल्पसूत्र' के अनुसार, श्री विद्या की दीक्षा लेने वाला साधक माँ के हर अंग में मंत्र और यंत्र का दर्शन करता है। यह नाम 'सौभाग्य' प्रदान करने वाला है, जिसका अर्थ है कि माँ अपने भक्त को वह सब कुछ प्रदान करती हैं जिसकी वह कामना करता है, और अंत में उसे मोक्ष की ओर ले जाती हैं।
'कामेष-ज्ञात-सौभाग्य-मार्दवोरु-द्वयान्विता' नाम का ध्यान करने से दांपत्य जीवन में मधुरता आती है और साधक को गुरु-तत्व का सान्निध्य प्राप्त होता है। यह नाम हमें सिखाता है कि सत्य 'कोमल' और 'सुंदर' है, लेकिन वह केवल पूर्ण समर्पण से ही जाना जा सकता है। जब शिव और शक्ति का मिलन हृदय में होता है, तब भक्त माँ के उस वास्तविक 'सौभाग्य' का अनुभव करता है जो वाणी और बुद्धि से परे है।
