गुरुवार, 4 जून 2026

21.कदम्बमञ्जरी-कॢप्त-कर्णपूर-मनोहरा - कदम्बमञ्जरीकॢप्तकर्णपूरमनोहरायै नमः

कदम्बमञ्जरीकॢप्तकर्णपूरमनोहरा

प्रार्थना

शुक्लां बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥

सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
      तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
      सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम्॥

कदम्बमञ्जरी-कॢप्त-कर्णपूर-मनोहरा
ताटङ्क-युगली-भूत-तपनोडुप-मण्डला॥८॥

श्री ललिता सहस्रनाम के बीसवें नाम में माँ की नक्षत्रों जैसी चमक वाली नासिका मणि का वर्णन करने के बाद, इक्कीसवाँ नाम उनके सौन्दर्य वर्णन की शृंखला में उनके श्रवण-अंगों (कानों) की ओर बढ़ता है 'कदम्ब-मञ्जरी-क्लृप्त-कर्णपूर-मनोहरा'। यह नाम भगवती के उन दिव्य कानों का वर्णन करता है जो भौतिक आभूषणों के बजाय प्रकृति के शुद्ध और सुगंधित उपहारों से सुशोभित हैं।

यह नाम माँ के सौन्दर्य को प्रकृति के साथ अद्भुत तरीके से जोड़ता है: कदम्ब-मञ्जरी (खिले हुए कदम्ब के पुष्पों का गुच्छा) + क्लृप्त-कर्णपूर (जो कानों के आभूषण 'कर्ण-फूल' के रूप में सजाए गए हैं)  + मनोहरा (मन को हर लेने वाली या अत्यंत सुन्दर)। पूर्ण अर्थ: "वह देवी, जो अपने कानों में कदम्ब के पुष्पों के गुच्छे आभूषण की तरह पहनने के कारण अत्यंत मनमोहक प्रतीत होती हैं"।

आदि शंकराचार्य ने 'सौन्दर्य लहरी' के श्लोक 60 में माँ के कानों और उनके आभूषणों की महिमा का सूक्ष्म वर्णन किया है, जो इस नाम के भाव को पूर्णता प्रदान करता है:
सूक्तीरमृतलहरीकौशलहरीः पिबन्त्याः शर्वाणि श्रवणचुलुकाभ्यामविरलम्। 
चमत्कारश्लाघाचलितशिरसः कुण्डलगणो झणत्कारैस्तारैः प्रतिवचनमाचष्ट इव ते॥

भावार्थ: "हे शिव की अर्धांगिनी शर्वाणी! जब आप माँ सरस्वती के मधुर संगीत और अमृत-लहरी जैसी वाणी को अपने कानों के पात्रों से निरंतर पीती हैं, तो प्रशंसा में आपके सिर हिलाने से आपके कानों के कुंडल (या पुष्प-गुच्छ) जो झनकार उत्पन्न करते हैं, ऐसा लगता है मानो वे उस संगीत का उत्तर दे रहे हों"। यह दर्शाता है कि माँ के कान केवल सौन्दर्य के लिए नहीं, बल्कि दिव्य विद्या और संगीत को ग्रहण करने के लिए भी प्रसिद्ध हैं।

'देवी भागवत पुराण' और मणिद्वीप के वर्णन में उल्लेख है कि भगवती ललिता को कदम्ब के वन अत्यंत प्रिय हैं और वे 'कदम्ब-वन-वासिनी' कहलाती हैं। उनके विग्रह पर कदम्ब पुष्पों का होना उनकी 'मूल-प्रकृति' के साथ आत्मीयता को दर्शाता है।

'मूक पंचशती' में मूक कवि वर्णन करते हैं कि माँ के मुख का सौन्दर्य कमल के समान है और कानों में लगे कदम्ब के पुष्प उन भौंरों के समान हैं जो उस मुख-कमल का रस पान करने के लिए आए हैं। यह पुष्प-आभूषण उनके भक्तों के प्रति उनके कोमल और वात्सल्यपूर्ण स्वभाव का प्रतीक है।

श्री विद्या साधना में, यह नाम साधक के लिए गहरे संकेत छिपाए हुए है: कान 'श्रुति' (वेदों) के केंद्र हैं। माँ का कदम्ब धारण करना यह दर्शाता है कि वे समस्त नाद ब्रह्म (ब्रह्मांडीय ध्वनि) की स्वामिनी हैं। तंत्र शास्त्र के अनुसार, गुरु शिष्य के कानों में ही मूल मंत्र (बीज मंत्र) प्रदान करते हैं। कदम्ब की मंजरी उस गुप्त ज्ञान के पल्लवित होने और फलने का प्रतीक है।

कदम्ब का वृक्ष वर्षा ऋतु में खिलता है, जो साधक के हृदय में भक्ति की वर्षा और कुण्डलिनी जागरण के आनंद को दर्शाता है।

'कदम्ब-मञ्जरी-क्लृप्त-कर्णपूर-मनोहरा' नाम का ध्यान करने से साधक की आध्यात्मिक श्रवण शक्ति विकसित होती है। यह नाम हमें सिखाता है कि वास्तविक आभूषण स्वर्ण या रत्न नहीं, बल्कि वे दिव्य गुण और ज्ञान हैं जो हमारे व्यक्तित्व को सुगन्धित करते हैं। माँ के इस स्वरूप का स्मरण हमारे मानसिक द्वंद्वों को शांत कर हमें शाश्वत आनंद की ओर ले जाता है।

122.शाम्भवी - शाम्भव्यै नमः

प्रार्थना शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान...