प्रार्थना
शुक्लां बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम्॥
श्री ललिता सहस्रनाम के इक्कीसवें नाम में माँ के कानों में सुशोभित कदम्ब की मंजरियों का वर्णन करने के बाद, वाग्देवियाँ अब उनके दिव्य 'ताटङ्क' (कर्ण-फूल या कुंडल) के अलौकिक स्वरूप का वर्णन करती हैं। बाईसवाँ नाम है 'ताटङ्क-युगली-भूत-तपनोडुप-मण्डला'। यह नाम माँ ललिता को केवल एक देवी के रूप में नहीं, बल्कि समस्त प्रकाश और समय के नियंत्रक के रूप में प्रतिष्ठित करता है।
ताटङ्क (कानों के आभूषण) + युगली-भूत (जोड़े के रूप में बने हुए) + तपन (सूर्य, जो तपता है) + उडुप (चंद्रमा जो नक्षत्रों का स्वामी है) + मण्डला (गोल घेरा)। पूर्ण अर्थ: "वह देवी, जिन्होंने सूर्य और चंद्रमा के मंडलों को अपने कानों के कुंडल की जोड़ी के रूप में धारण किया है"।
आदि शंकराचार्य ने 'सौन्दर्य लहरी' के श्लोक 59 में माँ के इन ताटङ्कों का वर्णन करते हुए बताया है कि इनकी चमक उनके कपोलों (गालों) में प्रतिबिम्बित होती है:
स्फुरद्-गण्डाभोग-प्रतिफलित-ताटङ्क-युगलं चतुश्चक्रं मन्ये तव मुखमिदं मन्मथ-रथम्।
भावार्थ: "हे माता! आपके चमकते हुए कपोलों में आपके ताटङ्कों (सूर्य-चंद्र कुंडल) का जो प्रतिबिंब पड़ता है, उसे देखकर मुझे ऐसा प्रतीत होता है मानो आपका यह मुख कामदेव का वह दिव्य रथ है जिसमें चार पहिये (दो वास्तविक कुंडल और दो उनके प्रतिबिंब) लगे हुए हैं"।
इसके अतिरिक्त, श्लोक 28 में आचार्य कहते हैं कि माँ के ताटङ्क इतने शक्तिशाली हैं कि वे 'महाप्रलय' के समय भी नष्ट नहीं होते, जो उनके 'नित्य' और 'अविनाशी' सुहाग (शिव) का प्रतीक हैं।
'देवी भागवत पुराण' के अनुसार, मणिद्वीप की साम्राज्ञी के कान के आभूषण 'श्रीचक्र' की तरह सुंदर हैं और वे उनके मुख-कमल की शोभा को कई गुना बढ़ा देते हैं। पुराणों में वर्णन है कि उनका दाहिना कुंडल सूर्य है (जो ज्ञान और क्रिया का प्रतीक है) और बायां कुंडल चंद्रमा है (जो इच्छा और करुणा का प्रतीक है)।
'मूक पंचशती' में मूक कवि वर्णन करते हैं कि माँ के ये सूर्य-चंद्र कुंडल साधक के अज्ञान रूपी अंधकार को मिटा देते हैं। जिस प्रकार सूर्य और चंद्रमा के बिना जगत अंधकारमय है, उसी प्रकार माँ की कृपा-रूपी इन प्रकाश पुंजों के बिना जीवन में आध्यात्मिक चेतना संभव नहीं है।
श्री विद्या साधना और तन्त्र के अनुसार, यह नाम अत्यंत गूढ़ अर्थ रखता है: दाहिना कुंडल (सूर्य) 'पिङ्गला' नाड़ी और 'प्रकाश' (शिव) का प्रतीक है। बायां कुंडल (चंद्रमा) 'इड़ा' नाड़ी और 'विमर्श' (शक्ति) का प्रतीक है। इन्हें धारण करने का अर्थ है कि माँ समस्त द्वंद्वों को संतुलित करती हैं।
सूर्य दिन का और चंद्रमा रात का स्वामी है। माँ ने इन्हें अपने कानों में आभूषण की तरह पहना है, जिसका अर्थ है कि 'काल' उनकी आज्ञा का दास है। वे 'महाकाली' हैं जो समय से परे हैं।
तंत्र में इन्हें अग्नि, सूर्य और सोम के तीन मंडलों के रूप में देखा जाता है, जो श्री चक्र के केंद्र बिंदु की ओर ले जाते हैं।
'ताटङ्क-युगली-भूत-तपनोडुप-मण्डला' नाम का ध्यान करने से साधक के जीवन में मानसिक संतुलन और आत्म-ज्ञान का उदय होता है। यह नाम हमें सिखाता है कि जो शक्तियाँ (सूर्य और चंद्रमा) इस ब्रह्मांड को ऊर्जा और शीतलता प्रदान करती हैं, वे माँ के लिए केवल छोटे से आभूषण मात्र हैं। माँ के इस विराट स्वरूप का स्मरण हमें सांसारिक तुच्छताओं से ऊपर उठाकर शाश्वत सत्य की ओर ले जाता है।
