मंगलवार, 9 जून 2026

26.कर्पूर-वीटिकामोद-समाकर्षि-दिगन्तरा - कर्पूरवीटिकामोदसमाकर्षि दिगन्तरायै नमः

कर्पूरवीटिकामोदसमाकर्षिदिगन्तरा - Goddess Lalitha Tripura Sundari

प्रार्थना

शुक्लां बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥

सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
      तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
      सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम्॥

शुद्ध-विद्याङ्कुराकार-द्विजपङ्क्ति-द्वयोज्ज्वला।
कर्पूर-वीटिकामोद-समाकर्षि-दिगन्तरा॥१०॥

श्री ललिता सहस्रनाम के 25वें नाम 'शुद्धविद्यांकुराकार-द्विजपंक्ति-द्वयोज्ज्वला' में माँ के ज्ञान रूपी अंकुरों जैसे दांतों का वर्णन करने के बाद, अब वाग्देवियाँ उनके मुख-सौन्दर्य और उनके द्वारा चबाए जाने वाले 'ताम्बूल' (पान) की अलौकिक सुगन्ध का गुणगान करती हैं। 26वाँ नाम है  'कर्पूर-वीटिका-मोद-समाकर्षि-दिगन्तरा'।

यह नाम भगवती की वाणी की मधुरता, उनके श्वासों की पवित्रता और उस दिव्य आकर्षण को दर्शाता है जो सम्पूर्ण ब्रह्मांड को अपनी ओर खींच लेता है। कर्पूर (कपूर) + वीटिका (पान का बीड़ा) + आमोद (तीव्र और मनमोहक सुगन्ध) + समाकर्षि (पूर्णतः आकर्षित करने वाली) + दिगन्तरा (सभी दिशाओं और ब्रह्मांड के सुदूर कोनों तक)। पूर्ण अर्थ: "वह देवी, जिनके कपूर युक्त ताम्बूल (पान) की दिव्य सुगन्ध समस्त दिशाओं को सुगन्धित कर देती है और सबको अपनी ओर आकर्षित करती है"।

आदि शंकराचार्य ने 'सौन्दर्य लहरी' के 65वें श्लोक में माँ के मुख के इस 'ताम्बूल' का वर्णन बड़े ही आध्यात्मिक ढंग से किया है:
रणे जित्वा दैत्यानपहृत-शिरस्त्रैः कवचिभिः
    निवृत्तैश्चण्डांश-त्रिपुरहर-निर्मालय-विमुखैः। 
विशाखेंद्र-उपेन्द्रैः शशविशद-कर्पूर-शकलाः
    विलीयन्ते मातस्तव वदनताम्बूल-कवलाः॥

भावार्थ: "हे माता! युद्ध में असुरों को जीतने के बाद, जब इन्द्र, विष्णु और कार्तिकेय लौटते हैं, तो वे शिव के 'निर्माल्य' (चढ़े हुए प्रसाद) को ग्रहण करने के बजाय, आपके मुख से गिरे हुए कपूर युक्त ताम्बूल के कणों को पाने के लिए लालायित रहते हैं"। यह दर्शाता है कि माँ का उच्छिष्ट (प्रसाद) भी देवताओं के लिए परम दुर्लभ और शक्तिदायक है।

'मूक पंचशती' के अनुसार, माँ के मुख का यह ताम्बूल ही वह 'प्रसाद' है जिसने एक मूक (गूँगे) व्यक्ति को महाकवि बना दिया। सुगन्ध यहाँ केवल गन्ध नहीं, बल्कि 'ज्ञान' का प्रतीक है जो सभी दिशाओं में फैलता है।

श्री विद्या साधना में, यह नाम साधक के 'वाणी' के शुद्धिकरण से जुड़ा है। तन्त्र शास्त्र में मुख को 'वाग्भव कूट' माना गया है। कपूर का श्वेत वर्ण 'सत्व गुण' और शुद्ध बुद्धि का प्रतीक है। माँ का ताम्बूल चबाना यह दर्शाता है कि उनकी वाणी अत्यंत परिष्कृत और मधुर है।

जिस प्रकार सुगन्ध अपने आप चारों ओर फैल जाती है, उसी प्रकार माँ की 'करुणा' और 'विद्या' बिना किसी प्रयास के ब्रह्मांड के हर जीव को अपनी ओर आकर्षित करती है।

ताम्बूल में प्रयुक्त सुपारी, चूना और कत्था (खदिर) 'इच्छा, ज्ञान और क्रिया' शक्तियों के मेल का प्रतीक हैं।

'कर्पूर-वीटिका-मोद-समाकर्षि-दिगन्तरा' नाम का ध्यान करने से साधक की वाणी में ओज और मिठास आती है। यह नाम हमें सिखाता है कि जब हमारी चेतना माँ के चरणों में स्थिर होती है, तो हमारे जीवन के विचार भी कपूर की तरह पवित्र और सुगन्धित हो जाते हैं, जो समाज में सकारात्मकता (आमोद) फैलाते हैं।

122.शाम्भवी - शाम्भव्यै नमः

प्रार्थना शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान...