प्रार्थना
शुक्लां बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम्॥
श्री ललिता सहस्रनाम के चौबीसवें नाम में माँ के प्रवाल (मूँगे) जैसे लाल अधरों का वर्णन करने के बाद, अब वाग्देवियाँ उनके मुख-सौंदर्य के भीतर स्थित दन्त-पंक्ति (दांतों की पंक्तियों) का वर्णन करती हैं। पच्चीसवाँ नाम है 'शुद्धविद्यांकुराकार-द्विजपंक्ति-द्वयोज्ज्वला'।
यह नाम भगवती के दांतों की सुंदरता को 'शुद्ध विद्या' (परम ज्ञान) के प्रकटीकरण से जोड़ता है। शुद्ध-विद्या (आत्म-ज्ञान या श्री विद्या का सोलह अक्षरों वाला 'षोडशाक्षरी' मन्त्र) + अंकुर (कोपल या नई फूटती हुई कली) + आकार (स्वरूप या आकार) + द्विज-पंक्ति (दांतों की पंक्तियाँ - दांतों को 'द्विज' इसलिए कहा जाता है क्योंकि वे दो बार जन्म लेते हैं) + द्वय (दोनों - ऊपर और नीचे की पंक्तियाँ) + उज्ज्वला (अत्यंत देदीप्यमान या चमकदार)। पूर्ण अर्थ: "वह देवी, जिनके दांतों की दोनों पंक्तियाँ इतनी सफेद और चमकदार हैं कि वे 'शुद्ध विद्या' (ज्ञान) के निकलते हुए अंकुरों के समान प्रतीत होती हैं"।
आदि शंकराचार्य ने 'सौन्दर्य लहरी' के 45वें श्लोक में भगवती की मुस्कान और दांतों का वर्णन 'श्वेत तंतुओं' के रूप में किया है
दरस्मेरे यस्मिन् दशनरुचिरकिञ्जल्करुचिरे सुगन्धौ माद्यन्ति स्मरदहनचक्षुर्मधुलिहः।
भावार्थ: "हे माता! आपकी मन्द मुस्कान में चमकते हुए दांतों की आभा कमल के सफेद केसर के समान है। इस मुस्कान की सुगन्ध से कामदेव को भस्म करने वाले भगवान शिव के नेत्र रूपी भ्रमर मदहोश हो जाते हैं"।
'देवी भागवत पुराण' और मणिद्वीप के वर्णन में उल्लेख है कि माँ के दांत पके हुए अनार के बीजों की तरह लालिमा लिए हुए सफेद और व्यवस्थित हैं।
श्री विद्या के अनुसार, यह नाम एक महान रहस्य उजागर करता है: संस्कृत भाषा में 51 अक्षर होते हैं, लेकिन सहस्रनाम के 1000 नाम केवल 32 अक्षरों से शुरू होते हैं। माँ की दांतों की दो पंक्तियों में कुल 32 दांत होते हैं (16 ऊपर, 16 नीचे)। यह नाम संकेत देता है कि ये 32 दांत ही उन 32 बीजाक्षरों के प्रतीक हैं जिनसे इस गुप्त स्तोत्र की रचना हुई है।
श्री ललिता सहस्रनाम के 1000 नाम केवल 32 अक्षरों से आरम्भ होते हैं। यह संख्या अपने-आप में अत्यन्त संकेतपूर्ण है, क्योंकि मानव मुख में भी कुल 32 दांत होते हैं।
परन्तु इससे भी गहरा संकेत तब दिखाई देता है जब इन 32 दांतों की रचना और इन 32 आरम्भाक्षरों की ध्वनि-रचना को साथ रखकर देखा जाता है।
दांतों का प्रत्येक चतुर्थांश 8 दांतों से बना होता है। उसकी रचना इस प्रकार होती है:
आश्चर्य यह है कि श्री ललिता सहस्रनाम के 32 आरम्भाक्षरों को भी इसी दन्त-संरचना के अनुरूप 4 समूहों में रखा जा सकता है। प्रत्येक समूह में 2 स्वर, 1 अर्धस्वर और 5 व्यंजन आते हैं — और प्रत्येक समूह ठीक 250 नामों को धारण करता है।
इस व्यवस्था में 32 अक्षर केवल एक संख्यात्मक तथ्य नहीं रह जाते। वे माँ के मुख, दन्त-पंक्ति और वाणी-शक्ति से जुड़े हुए प्रतीक की तरह दिखाई देते हैं।
जैसे प्रत्येक दन्त-चतुर्थांश में 2 incisors, 1 canine और 5 posterior teeth होते हैं, वैसे ही प्रत्येक अक्षर-समूह में 2 स्वर, 1 अर्धस्वर और 5 व्यंजन रखे जा सकते हैं। और फिर भी प्रत्येक समूह ठीक 250 नामों को धारण करता है।
यह संकेत करता है कि श्री ललिता सहस्रनाम की वाणी केवल भाषा नहीं है, बल्कि माँ की दन्त-पंक्ति, मुख और मातृका-शक्ति से जुड़ी हुई एक अत्यन्त संतुलित ध्वनि-संरचना है।
जिस प्रकार बीज से अंकुर फूटता है, माँ की मधुर वाणी और मुस्कान से 'शुद्ध विद्या' (ब्रह्म-ज्ञान) अंकुरित होकर भक्त के हृदय में प्रकाशित होती है।
मूक कवि अपनी रचना 'मूक पंचशती' के 'मंदस्मित शतकम्' में कहते हैं कि माँ के दांतों की चमक साधक के अज्ञान रूपी अंधकार को उसी प्रकार काट देती है जैसे श्वेत अंकुर मिट्टी को फाड़कर बाहर आते हैं। उनकी मुस्कान साक्षात 'अद्वैत' ज्ञान का बीजारोपण है।
'शुद्धविद्यांकुराकार-द्विजपंक्ति-द्वयोज्ज्वला' नाम का ध्यान करने से बुद्धि निर्मल होती है और सत्य का साक्षात्कार होता है। यह नाम हमें सिखाता है कि माँ का सौंदर्य केवल बाह्य आकर्षण नहीं है, बल्कि उनके विग्रह का कण-कण परम ज्ञान की अभिव्यक्ति है। जब हम उनके इस स्वरूप का चिन्तन करते हैं, तो हमारे भीतर सोई हुई चेतना अंकुरित होकर खिलने लगती है।


