प्रार्थना
शुक्लां बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम्॥
श्री ललिता सहस्रनाम के छब्बीसवें नाम में माँ के मुख के सुगंधित 'ताम्बूल' का वर्णन करने के बाद, वाग्देवियाँ माँ के मुख-सौंदर्य के सबसे सूक्ष्म और प्रभावशाली गुण उनकी वाणी का गुणगान करती हैं। सत्ताईसवाँ नाम है 'निजसल्लाप-माधुर्य-विनिर्भर्त्सित-कच्छपी'। यह नाम संकेत देता है कि माँ की सामान्य बातचीत भी संगीत की अधिष्ठात्री देवी के वाद्ययंत्र से अधिक मधुर है।
यह नाम माँ की वाणी की तुलना देवी सरस्वती की प्रसिद्ध वीणा 'कच्छपी' से करता है: निज-सल्लाप (स्वयं की सहज बातचीत या संवाद) + माधुर्य (मिठास या माधुर्य) + विनिर्भर्त्सित (तिरस्कृत करना, मात देना या लज्जित कर देना) + कच्छपी (माँ सरस्वती की वीणा का नाम)। पूर्ण अर्थ: "वह देवी, जिनकी सहज बातचीत का माधुर्य माँ सरस्वती की वीणा 'कच्छपी' की मधुर ध्वनियों को भी फीका कर देता है और उन्हें लज्जित कर देता है"।
आदि शंकराचार्य ने 'सौन्दर्य लहरी' के 66वें श्लोक में इस नाम के भाव को एक अत्यंत सुंदर दृश्य के माध्यम से स्पष्ट किया है:
विपञ्च्या गायन्ती विविध-मपदानं पशुपतेः
त्वयारब्धे वक्तुं चलित-शिरसा साधुवचने।
तदीयैर्-माधुर्यैर्-अपलपित-तन्त्री-कलरवां
निजां वीणां वाणी निचुलयति चोलेन निभृतम् ॥
भावार्थ: "हे माता! जब सरस्वती जी वीणा पर आपके स्वामी पशुपति (शिव) की कथाओं का गान करती हैं, तब आप प्रसन्न होकर अपनी मधुर वाणी में 'साधु-साधु' (बहुत अच्छा) कहती हैं। आपकी उस वाणी का माधुर्य इतना अधिक होता है कि वीणा की मधुर झंकार भी उसके सामने कर्कश लगने लगती है। तब लज्जित होकर सरस्वती जी अपनी वीणा को चुपचाप कपड़े के खोल में छिपा लेती हैं"।
'देवी भागवत पुराण' के अनुसार, मणिद्वीप की साम्राज्ञी की वाणी केवल शब्द नहीं, बल्कि 'ब्रह्म-नाद' है। उनके मुख से निकलने वाला प्रत्येक शब्द समस्त वेदों और शास्त्रों का मूल स्रोत है।
श्री विद्या और तंत्र शास्त्र के अनुसार, माँ का मुख 'वाग्भव कूट' का प्रतीक है, जो ज्ञान और वाणी का अधिष्ठान है।
यह नाम माँ की 'वैखरी' वाणी (उच्चारित शब्द) के सौंदर्य को दर्शाता है। तंत्र में माना जाता है कि जब साधक का कंठ शुद्ध होता है, तो उसकी वाणी में माँ ललिता के इस नाम की शक्ति समाहित हो जाती है, जिससे उसे 'वाक्-सिद्धि' प्राप्त होती है।
मूक कवि अपनी रचना 'मूक पंचशती' में कहते हैं कि माँ की वाणी वह अमृत है जो जन्म-मरण के चक्र को शांत कर देती है। माँ का मधुर बोलना भक्त के हृदय के ताप को उसी प्रकार हर लेता है जैसे चंद्रमा की चांदनी चकोर को शीतलता प्रदान करती है।
'निजसल्लाप-माधुर्य-विनिर्भर्त्सित-कच्छपी' नाम का ध्यान करने से साधक के भीतर सात्विक वाणी का उदय होता है। यह नाम हमें सिखाता है कि सत्य और प्रिय बोलना ही माँ की वास्तविक सेवा है। जब हम माँ के इस मधुर स्वरूप का चिंतन करते हैं, तो हमारे मन के कड़वे विचार शांत हो जाते हैं और हमारी वाणी में सौम्यता और आकर्षण का वास होता है।
