मंगलवार, 30 जून 2026

47.मराली-मन्दगमना - मरालीमन्दगमनायै नमः

प्रार्थना

शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥

सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
    तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
    सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ॥

शिञ्जान-मणिमञ्जीर-मण्डित-श्री-पदाम्बुजा ।
मराली-मन्दगमना महालावण्य-शेवधिः ॥२०॥

श्रीललिता सहस्रनाम के सौन्दर्य-वर्णन में भगवती के चरण-कमलों, नखों और मणिमञ्जीरों की शोभा के पश्चात् अब वाग्देवियाँ उनके पद-सञ्चालन की माधुरी का वर्णन करती हैं। सैंतालीसवाँ नाम है मराली-मन्दगमना। यह नाम श्रीललिताम्बिका की उस मृदु, ललित और गरिमामयी गति का बोध कराता है, जिसकी उपमा मराली अर्थात् हंसिनी की सहज, सौम्य और मनोहर चाल से दी गई है।

पदच्छेद, अर्चना-मन्त्र और प्रत्यक्ष अर्थ

इस नाम का पदच्छेद है मराली-मन्दगमनामराली शब्द का अर्थ है हंसिनी। मन्द का अर्थ यहाँ जड़ता या विलम्ब नहीं, अपितु सौम्यता, शान्त गरिमा और ललित माधुर्य है। गमना का अर्थ है गति अथवा चाल। इस प्रकार प्रत्यक्ष अर्थ हुआ कि भगवती की गति मराली के समान मृदु, सुशोभित और विलासपूर्ण है।

भास्कररायीय अर्थ

भास्करराय मखिन् के सौभाग्य-भास्कर में इस नाम का अर्थ सीधा और सुन्दर है। भगवती की चाल मराली अर्थात् हंसिनी के समान मन्द और मनोहर है। यहाँ मुख्य भाव देवी के दिव्य विग्रह की लावण्यमयी गति का है। यह गति न अधिक शीघ्र है, न स्थूल; वह अलौकिक सौन्दर्य, शान्त माधुर्य और राजराजेश्वरी के सहज गौरव से युक्त है।

अतः इस नाम में प्रत्यक्षतः देवी के पद-सञ्चालन का काव्यमय वर्णन है। इसे केवल प्रतीक अथवा योगिक रहस्य में सीमित कर देना उचित नहीं। पहले यह समझना चाहिए कि वाग्देवियाँ श्रीललिताम्बिका की मूर्तिमती सौन्दर्य-सम्पदा का स्तवन कर रही हैं। उसके पश्चात् ही उपासना-दृष्टि से इसके सूक्ष्म संकेतों का विचार किया जा सकता है।

सौन्दर्यलहरी में हंस और देवी-गति का काव्य-साम्य

भगवती के चरण-सौन्दर्य और उनकी चाल की माधुरी के विषय में सौन्दर्यलहरी में एक अत्यन्त प्रसिद्ध काव्यमय संकेत प्राप्त होता है। वहाँ भवन के कलहंस देवी के चरण-न्यास की क्रीड़ा को सीखने का प्रयत्न करते हुए कहे गए हैं:

पदन्यास-क्रीडा-परिचयमिवारब्धुमनसः
स्खलन्तस्ते खेलं भवनकलहंसा न जहति ॥

अर्थ: हे देवि, आपके भवन के कलहंस आपके चरण-न्यास की क्रीड़ा को सीखना चाहते हैं, परन्तु उस दिव्य चाल की समानता कर पाने में वे भी च्युत होते हुए प्रतीत होते हैं।

इस श्लोक का आशय यह है कि हंस, जो स्वयं सौन्दर्य और शुद्धता का प्रतीक माना जाता है, वह भी देवी के पद-सञ्चालन की दिव्य माधुरी से शिक्षा पाता है। इस प्रकार सौन्दर्यलहरी का यह काव्य मराली-मन्दगमना नाम की भावना को सुन्दर रूप से प्रकाशित करता है, यद्यपि सहस्रनाम का मूल अर्थ भास्कररायीय परम्परा के अनुसार देवी की मराली-सदृश मन्द गति ही है।

मराली-भाव का शास्त्रीय सौन्दर्य

भारतीय काव्य और उपासना-परम्परा में हंस शुद्धता, विवेक, माधुर्य और गम्भीर सौन्दर्य का प्रतीक है। हंस की गति में एक विशेष प्रकार की सन्तुलित कोमलता होती है। उसमें चञ्चलता नहीं, अपितु लय है; असावधानी नहीं, अपितु माधुर्य है; और भारयुक्त स्थूलता नहीं, अपितु सुगठित शान्त गरिमा है। श्रीललिताम्बिका की गति को मराली-सदृश कहने का तात्पर्य इसी दिव्य लावण्य की ओर है।

इस नाम का सम्बन्ध पूर्ववर्ती नाम शिञ्जान-मणिमञ्जीर-मण्डित-श्री-पदाम्बुजा से भी स्वाभाविक रूप से जुड़ता है। पहले नाम में देवी के चरण-कमलों को रत्नमय मञ्जीरों की मधुर ध्वनि से मण्डित कहा गया। अब उसी चरण-युगल की गति का वर्णन है। जब ऐसे चरण चलते हैं, तब उनकी गति भी हंसिनी के समान मृदु और आनन्दमयी ही होगी।

श्रीविद्या में तात्त्विक संकेत

श्रीविद्या-उपासना में देवी का सौन्दर्य केवल बाह्य रूप-वर्णन नहीं है। वह चैतन्य की सुव्यवस्थित, सौम्य और अनुग्रहमयी अभिव्यक्ति का भी संकेत करता है। मन्दगमन यहाँ साधनात्मक दृष्टि से उस शान्त लय का स्मरण कराता है, जिसमें साधक का अन्तःकरण उद्वेग से मुक्त होकर भगवती के चरणों में स्थिर होता है।

हंस-तत्त्व का सम्बन्ध अनेक उपासना-परम्पराओं में प्राण, विवेक और शुद्ध चैतन्य से भी जोड़ा गया है। इस नाम में ऐसे सूक्ष्म संकेतों का स्मरण किया जा सकता है, परन्तु इन्हें मूल अर्थ के स्थान पर नहीं रखना चाहिए। मूल अर्थ देवी की मराली-सदृश मन्द और मनोहर गति ही है; तात्त्विक अर्थ उसी प्रत्यक्ष सौन्दर्य के भीतर छिपे उपासना-रस के रूप में ग्रहणीय है।

साधक के लिए संदेश

मराली-मन्दगमना नाम साधक को सिखाता है कि भगवती की ओर अग्रसर होने वाली गति भी सौम्य, शुद्ध और लयपूर्ण होनी चाहिए। साधना में अधैर्य, प्रदर्शन और असंयम की अपेक्षा श्रद्धा, धैर्य, विनय और अन्तर्मुखता अधिक आवश्यक हैं। मराली की मन्द गति की भाँति साधक का चित्त भी भगवती के चरणों की ओर शान्त भाव से प्रवृत्त हो, यही इस नाम का साधनात्मक सन्देश है।

इस नाम के जप में साधक श्रीललिताम्बिका से प्रार्थना करता है कि उनके दिव्य चरणों की मृदु गति का स्मरण उसके अन्तःकरण में भी शान्ति, माधुर्य और सम्यक् लय उत्पन्न करे। देवी की चाल की यह मराली-सदृश छवि साधक को बाह्य चञ्चलता से हटाकर भगवती के श्रीचरणों में स्थित करती है।

समाहार: मराली-मन्दगमना नाम में श्रीललिताम्बिका की हंसिनी-सदृश, मन्द, माधुर्यपूर्ण और गरिमामयी गति का स्तवन है। भास्कररायीय परम्परा के अनुसार यह नाम देवी के प्रत्यक्ष दिव्य सौन्दर्य का वर्णन करता है। उपासना-दृष्टि से यही गति साधक के अन्तःकरण में शान्त लय, पवित्रता और भगवती के चरणों में विनम्र शरणागति का भाव जगाती है।

122.शाम्भवी - शाम्भव्यै नमः

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