प्रार्थना
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ॥
मराली-मन्दगमना महालावण्य-शेवधिः ॥ २०॥
श्रीललितासहस्रनाम में भगवती के श्रीविग्रह का वर्णन अब चरणयुगल की पूर्ण शोभा तक पहुँचता है। पैंतालीसवें नाम में उनके चरणों की प्रभा से कमल की शोभा का अतिक्रमण कहा गया। उसके पश्चात् छियालीसवाँ नाम “सिञ्जान-मणिमञ्जीर-मण्डित-श्री-पदाम्बुजा” आता है। पाठान्तर में “शिञ्जान” भी मिलता है। इस नाम में भगवती के चरण-कमलों को रत्नमय मञ्जीरों की मधुर झंकार से अलंकृत बताया गया है।
इस नाम का पदच्छेद इस प्रकार है। सिञ्जान, मणिमञ्जीर, मण्डित, श्री और पदाम्बुजा। “सिञ्जान” का अर्थ है मधुर झंकार करने वाला। “मणिमञ्जीर” का अर्थ है रत्नों से युक्त नूपुर। “मण्डित” का अर्थ है अलंकृत। “श्रीपदाम्बुजा” का अर्थ है भगवती के मंगलमय चरण-कमल। अतः इस नाम का भाव है कि भगवती के श्रीचरण-कमल रत्नमय नूपुरों की मधुर झंकार से सुशोभित हैं।
भास्कररायीय अर्थ
भास्करराय की व्याख्या का मुख्य भाव अत्यन्त स्पष्ट है। भगवती के चरण-कमल मणिमय मञ्जीरों से मण्डित हैं और उन मञ्जीरों से मधुर नाद प्रकट होता है। यहाँ वाग्देवियाँ केवल आभूषण का उल्लेख नहीं करतीं, अपितु चरणों के सौन्दर्य, उनकी गतिशील कृपा और नादमयी मंगलता का संकेत देती हैं।
चरण भगवती की शरणागति का प्रतीक हैं, और मञ्जीर उनके चलने, आने और अनुग्रह करने का संकेत देते हैं। साधक के लिए यह नाम बताता है कि देवी का अनुग्रह स्थिर कल्पना मात्र नहीं है। वह चलायमान करुणा है, जो भक्त के जीवन में आती है, उसके अन्तःकरण को स्पर्श करती है और मधुर नादरूप से उसे अपने समीप बुलाती है।
सौन्दर्यलहरी का प्रमाण
सौन्दर्यलहरी के इक्यानवें श्लोक में देवी के मणिमञ्जीरों की ध्वनि का अत्यन्त सुन्दर वर्णन है। वहाँ कहा गया है कि देवी के भवन के राजहंस उनकी गति सीखने का प्रयत्न करते हैं। जब वे डगमगाते हैं, तब देवी के चरण-कमलों से उत्पन्न मणिमञ्जीर-रणित मानो उन्हें सुन्दर गति की शिक्षा देता है।
अतस्तेषां शिक्षां सुभगमणिमञ्जीररणित-
च्छलादाचक्षाणं चरणकमलं चारुचरिते ॥
इसका भाव है कि हे सुचरित्रे देवी, आपके चरण-कमल रत्नमय मञ्जीरों की मनोहर झंकार के माध्यम से उन राजहंसों को शिक्षा देते हुए प्रतीत होते हैं। यह श्लोक “सिञ्जान-मणिमञ्जीर” नाम का सुन्दर काव्यमय विस्तार है। इसी के साथ अगले नाम “मराली-मन्दगमना” का भाव भी जुड़ता है, क्योंकि देवी की गति राजहंस से भी अधिक ललित और शिक्षादायिनी कही गई है।
मूकपञ्चशती में मञ्जीर-निनाद
मूकपञ्चशती के पादारविन्दशतक में कामाक्षी के चरणों का अत्यन्त मनोहर स्तवन मिलता है। वहाँ चरणों की अरुण प्रभा, नखकिरण, पादारविन्द और मणिमञ्जीर-निनाद का अनेक प्रकार से वर्णन है। कामाक्षी और ललिता अभिन्न पराशक्ति के रूप में पूजित हैं, इसलिए यह स्तुति इस नाम के भाव को और गहन करती है।
कथं वाचालोऽपि प्रकटमणिमञ्जीरनिनदैः
सदैवानन्दार्द्रान् विरचयति वाचंयमजनान् ॥
इसका भाव है कि हे कामाक्षि, आपके चरणों के प्रकट मणिमञ्जीर-निनाद से मौनशील साधक भी भीतर से आनन्दमय हो उठते हैं। यहाँ मञ्जीर-ध्वनि को साधक के मौन, चित्तशुद्धि और आन्तरिक आनन्द से जोड़ा गया है।
नाद और चरण-शरणागति
श्रीविद्या-दृष्टि में देवी शब्द, मन्त्र और नाद की अधिष्ठात्री हैं। सहस्रनाम में आगे वे “नादरूपा”, “परा”, “पश्यन्ती”, “मध्यमा” और “वैखरीरूपा” कही गई हैं। इसलिए इस नाम के “सिञ्जान” शब्द को साधना-दृष्टि से केवल लौकिक धातु-ध्वनि तक सीमित नहीं रखना चाहिए। यह देवी-कृपा के उस मधुर संकेत का भी बोध कराता है, जिससे साधक का चित्त शरणागति की ओर मुड़ता है।
फिर भी यह सावधानी आवश्यक है कि इस नाम में प्रत्यक्षतः मणिमञ्जीर की झंकार और चरण-कमलों की शोभा कही गई है। अनाहत-नाद, कुण्डलिनी या सूक्ष्म ध्वनि की व्याख्या साधनात्मक संकेत के रूप में ग्रहण की जा सकती है, पर उसे इस नाम का एकमात्र प्रत्यक्ष अर्थ नहीं मानना चाहिए। भास्कररायीय परम्परा में नाम का प्रत्यक्ष अर्थ, तात्त्विक संकेत और साधनात्मक अर्थ तीनों अपनी-अपनी मर्यादा में ग्रहण किए जाते हैं।
त्रिपुरारहस्य की तात्त्विक दृष्टि
त्रिपुरारहस्य की दृष्टि से परम देवी त्रिपुरा जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति से परे स्थित शुद्ध चैतन्यमयी सत्ता हैं। इस तात्त्विक दृष्टि से देवी के चरणों का ध्यान केवल रूप-सौन्दर्य का ध्यान नहीं रहता। वह साधक को उस चैतन्य की ओर ले जाता है, जो समस्त अनुभवों को प्रकाशित करता है।
इस नाम में मञ्जीर-नाद साधक को भीतर जाग्रत करने वाली कृपा का संकेत बन सकता है। जिस प्रकार बाहरी झंकार कानों को आकृष्ट करती है, उसी प्रकार देवी की चैतन्यमयी कृपा साधक के भीतर सोई हुई श्रद्धा, विनय और आत्मचिन्तन को जाग्रत करती है।
मणिद्वीप की भावभूमि
देवीभागवत के मणिद्वीप-वर्णन में भगवती का धाम रत्न, कमल, दिव्य प्रभा और मधुर कलरव से युक्त बताया गया है। उसी भावभूमि में देवी के रत्नमय आभूषणों का सौन्दर्य भी वर्णित है। यह वर्णन इस नाम की पृष्ठभूमि को सुशोभित करता है, क्योंकि “मणिमञ्जीर” भगवती के रत्नमय, चैतन्यमय और आनन्दरूप वैभव का एक कोमल अंग है।
देवी के चरणों का नूपुर केवल आभूषण नहीं है। वह इस बात का संकेत है कि परमदेवी अपने भक्तों से दूर निर्लिप्त सत्ता मात्र नहीं हैं। वे चलकर भक्त के समीप आने वाली, शरणागत को स्वीकार करने वाली और अपने चरण-नाद से भक्त के चित्त को शुद्ध करने वाली करुणामयी जननी हैं।
साधक के लिए संदेश
शिखा से चरण तक आने वाला यह श्रीविग्रह-वर्णन इस नाम में चरण-शरणागति के मधुर नाद पर ठहरता है। इसके बाद सहस्रनाम में देवी की गति, लावण्य, श्रीपुर, श्रीचक्र, भण्डासुर-वध और तत्त्वस्वरूप का विस्तार आता है। अतः यह नाम रूप-ध्यान और तत्त्व-ध्यान के बीच एक मधुर सेतु के समान है।
अर्चना में यह नाम “सिञ्जान-मणिमञ्जीर-मण्डित-श्री-पदाम्बुजायै नमः” रूप से उच्चरित होता है। इसके जप में साधक भगवती से प्रार्थना करता है कि उसके भीतर की जड़ता, अश्रद्धा, चित्त-विक्षेप और अहंकाररूपी मलिन वृत्तियाँ देवी के चरण-मञ्जीर की मधुर कृपाध्वनि से शान्त हों और उसका चित्त श्रीचरणों में स्थिर हो।
इस प्रकार “सिञ्जान-मणिमञ्जीर-मण्डित-श्री-पदाम्बुजा” नाम भगवती के चरण-कमलों की श्रवणीय और दृष्टिगोचर शोभा का गान है। इसमें चरणों की शरणागति, मणिमय आभूषणों का वैभव, मधुर नाद की मंगलता और देवी-कृपा की निकटता एक साथ प्रकट होती है। जो साधक श्रद्धा से इस नाम का स्मरण करता है, वह देवी के चरण-नाद को अपने अन्तःकरण में विनय, भक्ति और आत्मप्रकाश के रूप में अनुभव करने की दिशा में अग्रसर होता है।