प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ॥
मराली-मन्दगमना महालावण्य-शेवधिः ॥
श्रीललिता सहस्रनाम में भगवती के दिव्य स्वरूप का वर्णन शिरोभाग से चरणारविन्द तक अत्यन्त सूक्ष्म रीति से किया गया है। पूर्वनामों में उनके नूपुर-मण्डित चरणकमलों और मराल-सदृश मन्द गति का स्मरण हुआ। अब वाग्देवियाँ उन समस्त अंग-सौन्दर्यों को एक साथ समेटकर कहती हैं कि भगवती महालावण्य-शेवधिः हैं। अर्थात् वे महान् लावण्य की अक्षय निधि हैं।
इस नाम में केवल किसी एक अंग की शोभा का वर्णन नहीं है। यहाँ भगवती के समग्र दिव्य विग्रह में व्याप्त उस अलौकिक माधुर्य का संकेत है, जो अंगों की रचना, कान्ति, सौकुमार्य, प्रसाद और चैतन्य को एकरस कर देता है। श्रीललिताम्बिका का सौन्दर्य जड़ दृश्यता नहीं, अपितु चिदानन्दस्वरूप पराशक्ति की सहज छटा है।
महालावण्य-शेवधिः इस नाम का पदच्छेद है: महा + लावण्य + शेवधिः।
महा का अर्थ है महान्, अतिशय, अनुपम अथवा असीम। लावण्य का अर्थ है अंगों में भीतर से झलकने वाली सहज शोभा, माधुर्य और कोमल कान्ति। शेवधिः शब्द का अर्थ है निधि, कोश अथवा खजाना। इस प्रकार इस नाम का प्रत्यक्ष अर्थ है: जो देवी महान् लावण्य की निधि हैं, वे महालावण्य-शेवधिः हैं।
अर्चना में इसका चतुर्थी-एकवचन स्त्रीलिङ्ग रूप होगा: ॐ महालावण्य-शेवधये नमः। यहाँ शेवधिः शब्द का दैवता-सम्बोधन अर्चना-प्रयोग में शेवधये रूप से ग्रहण किया जाता है।
भास्करराय मखिन् की सौभाग्य-भास्कर व्याख्या में इस नाम का मुख्य भाव यही है कि भगवती महान् लावण्य की निधि हैं। यहाँ लावण्य को केवल बाह्य रूप-सौन्दर्य मानना पर्याप्त नहीं है। रूप अंगों की सुन्दर रचना से सम्बद्ध हो सकता है, पर लावण्य उस रचना में व्याप्त जीवित माधुर्य, कान्ति और रस का नाम है। अतः भगवती के प्रत्येक अंग में जो शोभा पूर्वनामों में क्रमशः वर्णित हुई है, उसका समग्र और परिपूर्ण कोश इस नाम में सूचित होता है।
शेवधि शब्द इस बात को सूचित करता है कि यह लावण्य भगवती में किसी बाहरी अलङ्कार से प्राप्त नहीं हुआ है। वे स्वयं लावण्य की मूल निधि हैं। अलङ्कार, रत्न, वस्त्र और दिव्य आयुध उनके सौन्दर्य को प्रकट करते हैं, परन्तु उनके सौन्दर्य का कारण नहीं बनते। उनका महालावण्य उनके चिदानन्दमय स्वरूप की सहज अभिव्यक्ति है।
प्रतिभाति यदङ्गेषु तल्लावण्यमिहोच्यते ॥
इस काव्यशास्त्रीय परिभाषा से महालावण्य-शेवधिः नाम का भाव और स्पष्ट होता है। भगवती का लावण्य केवल रेखा, वर्ण अथवा आकार में नहीं है। वह भीतर से प्रकाशित होने वाली दिव्य चैतन्य-कान्ति है, जो उनके सम्पूर्ण स्वरूप को आनन्दमय बना देती है।
आदि शङ्कराचार्यकृत सौन्दर्यलहरी में भगवती के सौन्दर्य को कवियों की उपमा-शक्ति से भी परे बताया गया है। यह सन्दर्भ इस नाम के मुख्य भाव के अनुकूल है, क्योंकि यहाँ भी देवी के सौन्दर्य को सामान्य तुलनाओं से परे माना गया है।
कवीन्द्राः कल्पन्ते कथमपि विरिञ्चि-प्रभृतयः ॥
इस श्लोक का आशय यह नहीं कि भगवती के सौन्दर्य को केवल काव्य-वर्णन का विषय बनाया जाए। इसका तात्पर्य यह है कि उनका सौन्दर्य समस्त उपमाओं का आश्रय है, किन्तु स्वयं किसी उपमा में सीमित नहीं होता। यही भाव महालावण्य-शेवधिः नाम में “लावण्य की निधि” के रूप में व्यक्त हुआ है।
श्रीविद्या की उपासना-दृष्टि से भगवती का सौन्दर्य केवल दृश्य शोभा नहीं है। वह चित्, आनन्द और विमर्शशक्ति की संयुक्त अभिव्यक्ति है। परम चैतन्य जब अनुग्रहपूर्वक रूप, माधुर्य और रस के रूप में भक्त के हृदय में उतरता है, तब साधक उसे देवी के लावण्य के रूप में अनुभव करता है।
इस अर्थ में महालावण्य-शेवधिः नाम भगवती के सौन्दर्य को उनके परात्पर स्वरूप से जोड़ता है। उनका लावण्य मायिक आकर्षण नहीं, अपितु आनन्दमयी पराशक्ति की उपास्य छटा है। इसी कारण श्रीललिताम्बिका के विग्रह-वर्णन में सौन्दर्य और तत्त्व, दोनों का समन्वय दिखता है।
रहस्य-सम्प्रदाय में देवी के रूप, मन्त्र और चक्र का सम्बन्ध अत्यन्त गम्भीर है। ऐसे विषयों में मर्यादा अपेक्षित है। सामान्य भक्तिपरक अर्थ में इतना समझना पर्याप्त है कि श्रीललिताम्बिका का महालावण्य उनके अनन्त चैतन्य, करुणा और आनन्द का साकार संकेत है।
इस नाम के जप में साधक भगवती से प्रार्थना करता है कि उसका अन्तःकरण भी देवी के लावण्य का पात्र बने। यहाँ लावण्य का साधनात्मक अर्थ है अन्तःकरण की शुद्धि, भाव की कोमलता, दृष्टि की पवित्रता और भक्ति का माधुर्य। जब मन राग, द्वेष, असूया और अहंकाररूपी मल से मुक्त होने लगता है, तब उसमें भगवती की छटा का सूक्ष्म प्रतिबिम्ब प्रकट होता है।
भगवती को महालावण्य-शेवधिः रूप में स्मरण करने से साधक को यह स्मरण रहता है कि परम तत्त्व केवल भयावह शक्ति नहीं, केवल निर्गुण विचार भी नहीं, अपितु परम माधुर्य, परम करुणा और परम आनन्द से परिपूर्ण चैतन्य है। श्रीललिताम्बिका का सौन्दर्य भक्त को बाह्य आसक्ति में नहीं बाँधता, अपितु उसे शुद्ध रस, श्रद्धा और शरणागति की ओर ले जाता है।
महालावण्य-शेवधिः नाम में श्रीललिताम्बिका का समग्र दिव्य माधुर्य निहित है। वे महान् लावण्य की अक्षय निधि हैं। उनके चरण, गति, अंग, मुख, नेत्र, स्मित और सम्पूर्ण विग्रह में जो शोभा है, वह उनके चिदानन्दस्वरूप की सहज कान्ति है। इस नाम का स्मरण करते हुए साधक भगवती से प्रार्थना करता है कि उसके अन्तःकरण में भी शुद्ध भाव, पवित्र दृष्टि, मधुर भक्ति और श्रीमातृचरणों में स्थिर शरणागति प्रकट हो।