प्रार्थना
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं बिभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ॥
पदद्वयप्रभाजालपराकृतसरोरुहा ॥ १९॥
श्रीललितासहस्रनाम में भगवती के दिव्य विग्रह का वर्णन क्रमशः शिखा से चरणों तक आता है। चवालीसवें नाम में उनके नखों की दीप्ति से प्रणत जनों के तमोगुण के आच्छादन का वर्णन हुआ। उसके पश्चात् पैंतालीसवाँ नाम “पदद्वय-प्रभाजाल-पराकृत-सरोरुहा” आता है। इस नाम में भगवती के दोनों चरणों की ऐसी दिव्य प्रभा कही गई है, जिसके सामने कमल की शोभा भी पराजित हो जाती है।
इस नाम का पदच्छेद इस प्रकार है। पदद्वय, प्रभाजाल, पराकृत और सरोरुहा। “पदद्वय” का अर्थ है दोनों चरण। “प्रभाजाल” का अर्थ है प्रकाश-किरणों का समूह। “पराकृत” का अर्थ है पराजित या अतिक्रान्त किया हुआ। “सरोरुहा” का अर्थ है सरोवर में उत्पन्न कमल। अतः इस नाम का भाव है कि भगवती के दोनों चरणों से निकलने वाली प्रभा ने कमल की शोभा को भी अतिक्रान्त कर दिया है।
भास्कररायीय अर्थ
भास्करराय की व्याख्या का मुख्य भाव अत्यन्त सरल और गूढ़ है। देवी के चरणयुगल की प्रभा इतनी विलक्षण है कि वह सरोरुह, अर्थात् कमल, को भी पराजित करती है। सामान्यतः देवताओं के चरणों की तुलना कमल से की जाती है। पर यहाँ वाग्देवियाँ कहती हैं कि भगवती के चरण केवल कमल-समान नहीं हैं, वे कमल से भी श्रेष्ठ हैं। कमल उनकी चरण-प्रभा का उपमान बनने में समर्थ नहीं है।
यह श्रेष्ठता केवल रूप-सौन्दर्य की नहीं है। कमल बाह्य प्रकाश, जल, ऋतु और दिन-रात्रि पर आश्रित है। देवी के चरणों की प्रभा नित्य, आत्मप्रकाशमयी और करुणारूप है। कमल देखने वाले की आँख को आनन्द देता है, पर भगवती के चरण साधक के अन्तःकरण को प्रकाशित करते हैं।
सौन्दर्यलहरी का प्रत्यक्ष प्रमाण
आदि शङ्कराचार्य सौन्दर्यलहरी के सतासीवें श्लोक में इसी भाव को अत्यन्त सुन्दर रीति से व्यक्त करते हैं। वहाँ देवी के चरणों की कमल से तुलना करते हुए कहा गया है कि देवी के चरण कमल पर विजय प्राप्त करते हैं। कमल हिम से नष्ट हो जाता है, रात्रि में बन्द हो जाता है और केवल लक्ष्मी का पात्र बनता है। देवी के चरण हिमालय में निवास करने में समर्थ हैं, रात्रि के अन्तिम भाग में भी उज्ज्वल रहते हैं और समयाचार-मार्ग के साधकों को श्री प्रदान करते हैं।
हिमानीहन्तव्यं हिमगिरिनिवासैकचतुरौ
निशायां निद्राणं निशि चरमभागे च विशदौ ।
वरं लक्ष्मीपात्रं श्रियमतिसृजन्तौ समयिनां
सरोजं त्वत्पादौ जननि जयतश्चित्रमिह किम् ॥
इसका भाव है कि हे जननी, आपके चरणों का कमल को जीत लेना आश्चर्य की बात नहीं है। कमल हिम से नष्ट होता है, पर आपके चरण हिमगिरि में निवास करने में समर्थ हैं। कमल रात्रि में बन्द हो जाता है, पर आपके चरण रात्रि के अन्तिम भाग में भी विशद रहते हैं। कमल लक्ष्मी का पात्र मात्र है, पर आपके चरण समयाचारियों को श्री प्रदान करते हैं। इसलिए आपके चरणों की कमल से श्रेष्ठता स्वाभाविक है।
चरण-रज की महिमा
सौन्दर्यलहरी के दूसरे श्लोक में देवी के चरणपङ्केरुह से उत्पन्न रज की महिमा कही गई है। वहाँ कहा गया है कि ब्रह्मा उसी चरण-रज को ग्रहण कर लोकों की रचना करते हैं, विष्णु उसे सहस्र शिरों से धारण करते हैं और हर उसे भस्म की भाँति धारण करते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि भगवती के चरण केवल सौन्दर्य का विषय नहीं, अपितु सृष्टि, स्थिति और लय की मूल शक्ति के आधार हैं।
मूकपञ्चशती में चरण-शरणागति
मूककवि की मूकपञ्चशती में एक पूरा शतक कामाक्षी के पादारविन्द पर केन्द्रित है। इस पादारविन्दशतक में देवी के चरणों को शरण, कृपा, ज्ञान और अन्तःकरण-शुद्धि का आधार माना गया है। कामाक्षी और ललिता अभिन्न पराशक्ति के रूप में पूजित हैं। इसलिए कामाक्षी के चरणारविन्द की स्तुति इस नाम के भाव को और पुष्ट करती है।
पादारविन्दशतक की भावधारा यह बताती है कि देवी के चरण केवल नमन करने योग्य अंग नहीं हैं। वे साधक के लिए आश्रय हैं, चित्त की दिशा हैं और अज्ञान के तिमिर को दूर करने वाली करुणा की किरणें हैं। इसी दृष्टि से “प्रभाजाल” शब्द केवल भौतिक प्रकाश नहीं, अपितु भगवती की अनुग्रह-किरणों का भी बोध कराता है।
त्रिपुरारहस्य की तात्त्विक दृष्टि
त्रिपुरारहस्य में त्रिपुरा को जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति से परे स्थित शुद्ध चैतन्य के रूप में समझाया गया है। इस तात्त्विक दृष्टि से देवी के चरणों का ध्यान रूप-सौन्दर्य तक सीमित नहीं रहता। साधक जब देवी के चरणों में मन को रखता है, तब वह बदलते हुए अनुभवों से हटकर उस चैतन्य-महिमा की ओर मुड़ता है जो सभी अवस्थाओं को प्रकाशित करती है।
इसीलिए “प्रभाजाल” को साधना-दृष्टि से चित्-प्रकाश का संकेत भी माना जा सकता है। कमल बाह्य प्रकाश से खिलता है, पर साधक का हृदय देवी के चरण-प्रकाश से खिलता है। यह प्रकाश तमस, संशय, अहंकार और चित्त की संकुचित दृष्टि को शान्त करता है।
मणिद्वीप और कमल-भावभूमि
देवीभागवत में वर्णित मणिद्वीप दिव्य रत्नों, चिन्तामणि, अमृतमय सरोवरों और पुष्पित कमलों से युक्त देवी-धाम है। यह वर्णन भगवती की दिव्य प्रभा और सौन्दर्य की विराट भावभूमि देता है। इस भावभूमि में कमल अत्यन्त पवित्र और सुन्दर माना जाता है, फिर भी सहस्रनाम का यह नाम बताता है कि भगवती के चरणों की प्रभा उस कमल-शोभा को भी अतिक्रमित कर देती है।
भक्त के लिए यह संकेत अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। संसार में जो वस्तु सबसे सुन्दर प्रतीत होती है, वह भी देवी-चरणों की प्रभा के सामने सीमित है। कमल प्रकृति का सौन्दर्य है, पर देवी के चरण अनन्त चैतन्य, करुणा और मोक्षमार्ग के सौन्दर्य हैं।
साधक के लिए संदेश
श्रीविद्या-साधना में चरण-चिन्तन विनय, शरणागति और अनुग्रह-स्वीकार का साधन है। साधक जब देवी के चरणों का ध्यान करता है, तब वह अपने अहंकार को नीचे रखकर भगवती की करुणा को स्वीकार करता है। इसी विनय से ज्ञान का द्वार खुलता है और चित्त में शुद्धता आती है।
अर्चना में यह नाम “पदद्वय-प्रभाजाल-पराकृत-सरोरुहायै नमः” रूप से उच्चरित होता है। इसके जप में साधक भगवती से प्रार्थना करता है कि उसके भीतर अहंकार, अज्ञान, संशय और तमस के रूप में स्थित मलिन वृत्तियाँ देवी के चरण-प्रभाजाल से दूर हों और उसका हृदय भक्ति, विनय और आत्मप्रकाश से खिल उठे।
इस प्रकार “पदद्वय-प्रभाजाल-पराकृत-सरोरुहा” नाम भगवती के चरणयुगल की अनुपम महिमा का गान है। यह नाम बताता है कि कमल की शोभा, कोमलता और पवित्रता भी देवी के चरणों की दिव्य प्रभा के सामने सीमित है। जो साधक श्रद्धा से उन चरणों का स्मरण करता है, उसका चित्त विनय से झुकता है, भक्ति से पिघलता है और अन्ततः उसी चरण-प्रकाश में आत्मकल्याण की दिशा पाता है।