प्रार्थना
शुक्लां बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम्॥
श्री ललिता सहस्रनाम के तेईसवें नाम में माँ के दर्पण-तुल्य कपोलों (गालों) का वर्णन करने के बाद, अब वाग्देवियाँ उनके मुख-सौंदर्य के केंद्र अधरों (होंठों) की ओर बढ़ती हैं। चौबीसवाँ नाम है 'नवविद्रुम-बिम्बश्री-न्यक्कारि-रदनच्छदा'। यह नाम भगवती के अधरों की तुलना प्रकृति की सबसे सुंदर लाल वस्तुओं से करता है और उन्हें सर्वोच्च बताता है।
यह नाम छह महत्वपूर्ण शब्दों का एक कलात्मक संयोजन है: नव (नवीन या ताज़ा) + विद्रुम (मूंगा/Coral) + बिम्ब (बिम्ब फल - एक अत्यंत लाल जंगली फल) + श्री (शोभा या सुंदरता) + न्यक्कारि (तिरस्कृत करने वाली या मात देने वाली) + रदनच्छद (ओष्ठ या होंठ जो दांतों को ढंकते हैं)। पूर्ण अर्थ: "वह देवी, जिनके होंठों (अधरों) की लालिमा और चमक इतनी श्रेष्ठ है कि वे ताज़ा मूंगों और पके हुए बिम्ब फल की सुंदरता को भी लज्जित कर देती हैं"।
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| नवविद्रुम (Coral) |
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| बिम्ब फल (Ivy Gourd or Scarlet Gourd) |
आदि शंकराचार्य ने 'सौन्दर्य लहरी' के 62वें श्लोक में भगवती के इन अधरों का अत्यंत सुंदर वर्णन किया है:
प्रकृत्याऽरक्तायास्त्व सुदति दन्तच्छदरुचेः प्रवक्ष्ये सादृश्यं जनयतु फलं विद्रुमलता।
न बिम्बं तद्विम्ब-प्रतिफलन-रागादरुणितं तुलामध्यारोढुं कथमिव बिलज्जेत कलया ॥
भावार्थ: "हे सुंदर दांतों वाली माता! मैं आपके स्वाभाविक रूप से लाल होंठों की तुलना किससे करूँ? यदि मैं मूंगे की लता (विद्रुम-लता) से तुलना करूँ, तो वह भी फल देने में असमर्थ है। बिम्ब फल तो आपके अधरों के प्रतिबिंब से ही लाल हुआ है, वह स्वयं आपकी तुलना में आने में लज्जित होता है"। यह श्लोक स्पष्ट करता है कि माँ के होंठों की लालिमा 'स्वाभाविक' है, न कि किसी कृत्रिम लेप से।
'देवी भागवत पुराण' के अनुसार, मणिद्वीप की साम्राज्ञी के अधर संपूर्ण ब्रह्मांड की 'इच्छा शक्ति' के केंद्र हैं। पुराणों में वर्णन है कि उनके होंठों की चमक से ही समस्त लाल पुष्पों और मणियों को उनका रंग प्राप्त हुआ है।
'मूक पंचशती' के 'मंदस्मित शतक' में मूक कवि वर्णन करते हैं कि माँ के होंठों की लालिमा साधक के हृदय में 'अनुराग' (परम प्रेम) उत्पन्न करती है। मान्यता है कि मूक कवि ने माँ के मुख से गिरे हुए 'ताम्बूल' (बीड़ा) का स्वाद चखकर ही वाणी प्राप्त की थी, जिससे उनके होंठों की महिमा और भी बढ़ जाती है।
श्री विद्या साधना में, यह नाम केवल सौंदर्य तक सीमित नहीं है: वैखरी वाणी - ओष्ठ 'वाणी' के प्रकट होने का अंतिम द्वार हैं। तन्त्र में, इन्हें 'वैखरी' वाणी का स्थान माना गया है, जहाँ से ब्रह्म-ज्ञान शब्दों के रूप में बाहर आता है।
अधरों की लालिमा 'रजोगुण' और 'करुणा' का प्रतीक है। माँ का लाल वर्ण यह दर्शाता है कि वे भक्तों के प्रति अत्यंत दयालु और प्रेममयी हैं। श्री विद्या के 'वाग्भव कूट' में मुख और अधरों का ध्यान विशेष फलदायी होता है, क्योंकि यहीं से 'गुरु-मुख' द्वारा मन्त्र का संचार होता है।


