प्रार्थना
शुक्लां बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम्॥
श्री ललिता सहस्रनाम के क्रम में, माँ के दिव्य कानों के आभूषणों का वर्णन करने के बाद, वाग्देवियाँ उनके मुख-सौंदर्य के एक अत्यंत आकर्षक अंग 'कपोल' (गालों) का वर्णन करती हैं। तेईसवाँ नाम है 'पद्मराग-शिलादर्श-परिभावि-कपोल-भू'। यह नाम माँ के सौंदर्य को केवल शारीरिक चमक तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उसे ब्रह्मांडीय चेतना के परावर्तन से जोड़ता है।
यह नाम छह गूढ़ शब्दों के मेल से बना है: पद्मराग (माणिक्य या श्रेष्ठ लाल मणि/Ruby) + शिला*+ आदर्श* (दर्पण) + परिभावि (तिरस्कृत करने वाली या मात देने वाली) + कपोल (गाल) + भू (स्थान या क्षेत्र)। पूर्ण अर्थ: "वह देवी, जिनके कपोलों (गालों) का स्थान इतना चमकदार और चिकना है कि वह श्रेष्ठ पद्मराग मणियों (माणिक्य) से बने दर्पणों की चमक और स्वच्छता को भी मात दे देता है"।
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| पद्मराग शिला |
आदि शंकराचार्य ने 'सौन्दर्य लहरी' के श्लोक 59 में माँ के इन दर्पण जैसे गालों का अद्भुत वर्णन किया है:
स्फुरद्-गण्डाभोग-प्रतिफलित-ताटङ्क-युगलं चतुश्चक्रं मन्ये तव मुखमिदं मन्मथ-रथम्।
भावार्थ: "हे माता! आपके चमकते हुए कपोलों में आपके कानों के कुंडल (सूर्य और चंद्रमा) प्रतिबिम्बित हो रहे हैं। ऐसा लगता है मानो आपका यह मुख कामदेव का वह दिव्य रथ है जिसमें चार पहिये (दो वास्तविक कुंडल और दो उनके प्रतिबिंब) लगे हुए हैं"। यह दर्शाता है कि माँ के गाल इतने स्वच्छ और दीप्तिमान हैं कि वे संपूर्ण ब्रह्मांडीय प्रकाश को परावर्तित करने में सक्षम हैं।
'देवी भागवत पुराण' के अनुसार, मणिद्वीप की साम्राज्ञी के गालों की आभा पद्मराग मणियों के समान अरुण (लाल) है जो संपूर्ण दिशाओं को प्रकाशित करती है। पुराणों में उल्लेख है कि माँ का यह विग्रह स्वयं 'शुद्ध सत्व' का बना है, जिसमें किसी भी प्रकार की मलिनता नहीं है।
'मूक पंचशती' में मूक कवि वर्णन करते हैं कि माँ के कपोल साधक के हृदय के लिए एक निर्मल दर्पण की तरह हैं। जिस प्रकार दर्पण में अपना वास्तविक स्वरूप दिखता है, माँ के इन दीप्तिमान कपोलों का ध्यान करने से साधक को अपने भीतर की 'शुद्ध आत्मा' का दर्शन होता है।
श्री विद्या साधना और तन्त्र के अनुसार, यह नाम अत्यंत महत्वपूर्ण रहस्य प्रकट करता है: तंत्र शास्त्र में शिव 'प्रकाश' हैं और शक्ति 'विमर्श' (दर्पण) हैं। माँ के गाल दर्पण की तरह हैं, जिसका अर्थ है कि वे उस शुद्ध चेतना का प्रतिबिंब हैं जो इस सृष्टि के रूप में प्रकट होती है।
गालों पर पड़ने वाला कुंडल का प्रतिबिंब यह दर्शाता है कि 'बिंब' (ईश्वर) और 'प्रतिबिंब' (जीव) वास्तव में एक ही हैं। माँ का यह रूप साधक को द्वैत से अद्वैत की ओर ले जाता है।
पद्मराग का लाल रंग 'अनुराग' (दिव्य प्रेम) का प्रतीक है। माँ की पूरी सत्ता करुणा और प्रेम से ओतप्रोत है, जो उनके कपोलों की लालिमा के रूप में झलकती है।
'पद्मराग-शिलादर्श-परिभावि-कपोल-भू' नाम का ध्यान करने से साधक के मानसिक विकार दूर होते हैं और मन दर्पण की तरह स्वच्छ हो जाता है। यह नाम हमें सिखाता है कि जिस प्रकार माँ के गालों पर दिव्य प्रकाश परावर्तित होता है, हमें भी अपने जीवन को माँ की कृपा के प्रकाश से इतना स्वच्छ बनाना चाहिए कि हमारा हृदय भी उनके प्रेम को परावर्तित कर सके। यह माँ के 'स्थूल रूप' (भौतिक विग्रह) के ध्यान की पराकाष्ठा है, जो साधक को अंततः उनके 'सूक्ष्म' और 'पर' रूप की ओर ले जाती है।
* - यह रूप सवर्णदीर्घ सन्धि के नियम से बनता है।
सवर्णस्वरयोः संयोगे दीर्घः स्वरः भवति इति सवर्णदीर्घसन्धिः।
पाणिनिसूत्रम् "अकः सवर्णे दीर्घः" (६।१।१०१)
जब दो समान वर्ग के स्वर (सवर्ण स्वर) आमने‑सामने आते हैं, तो वे मिलकर एक ही दीर्घ स्वर बन जाते हैं।
इसी कारण व्याकरण की दृष्टि से शिला + आदर्श = शिलादर्श और समास में इसे शिलाऽदर्श नहीं लिखा जाता, क्योंकि अवग्रह (ऽ) केवल बाह्य सन्धि के लिखित संकेत के रूप में आता है, समस्तपद के भीतर नहीं।

