प्रार्थना
श्रीललितासहस्रनाम के पूर्ववर्ती नामों में श्रीललिताम्बिका के दिव्य निवास, सार्वभौम ऐश्वर्य और देवर्षियों द्वारा स्तुत आत्मवैभव का निरूपण हुआ है। प्रस्तुत नाम से भण्डासुर के विरुद्ध उनके दिव्य अभियान का वर्णन आरम्भ होता है। भगवती केवल युद्ध के लिए उद्यत नहीं हैं, अपितु अपनी आज्ञा में स्थित, विविध सामर्थ्यों से सम्पन्न शक्तिसेना से समन्वित हैं।
यह नाम श्रीललिताम्बिका के उस स्वरूप का वन्दन करता है जिसमें उनका सार्वभौम शासन, धर्मसंस्थापनकारी संकल्प और उनकी शक्तियों की सुव्यवस्थित अभिव्यक्ति एक साथ प्रकट होते हैं। यहाँ प्रधान विषय भगवती का भण्डासुर-वध के लिए उद्यत शक्तिसेना से युक्त होना है। अन्तःकरणगत अथवा आध्यात्मिक अर्थ इसके पश्चात् उपासना-दृष्टि से ग्रहण किया जा सकता है, किन्तु वह इस नाम के प्रत्यक्ष आख्यानगत अर्थ का स्थान नहीं लेता।
पदच्छेद और प्रत्यक्ष अर्थ
पदच्छेद: भण्डासुर-वध-उद्युक्त-शक्ति-सेना-समन्विता।
भण्डासुर, भण्ड नामक असुर।
वध, संहार।
उद्युक्त, किसी कार्य के लिए तत्पर, सन्नद्ध अथवा उद्यत।
शक्तिसेना, भगवती की विविध शक्तियों से निर्मित दिव्य सेना।
समन्विता, युक्त, सहित अथवा सम्यक् रूप से सम्बद्ध।
समस्त पदों का सम्बन्ध अन्तिम स्त्रीलिङ्ग पद समन्विता से है। अतः नाम का अर्चना-मन्त्ररूप इस प्रकार है:
भास्कररायीय अर्थ
भास्करराय मखिन् इस नाम का अर्थ उसके प्रत्यक्ष आख्यानगत प्रसङ्ग में ग्रहण करते हैं। भण्डासुर के वध के लिए उद्यत अर्थात् सन्नद्ध शक्तियों की सेना से युक्त होने के कारण देवी इस नाम से अभिहित होती हैं। यहाँ शक्ति शब्द भगवती की अधीनस्थ दिव्य शक्तियों का वाचक है और उन्हीं का समुदाय शक्तिसेना कहलाता है।
इस व्याख्या में श्रीललिताम्बिका सर्वशक्तियों की अधिष्ठात्री हैं। सेना की प्रत्येक शक्ति उनसे पृथक् स्वतन्त्र परम सत्ता नहीं, अपितु उन्हीं के सार्वभौम सामर्थ्य की विशिष्ट अभिव्यक्ति है। भगवती मूल शक्ति हैं और शक्तिसेना उनके संकल्प के अनुसार कार्य करने वाली दिव्य शक्ति-व्यवस्था है।
समन्विता पद केवल चारों ओर से घिरी होने का संकेत नहीं देता। यह भगवती और उनकी शक्तिसेना के उद्देश्य, आज्ञा तथा कार्य की पूर्ण संगति को भी प्रकट करता है। समस्त शक्ति-समुदाय एक ही देवी-संकल्प के अधीन भण्डासुर-वध के लिए उद्यत है।
ललितोपाख्यान का प्रसङ्ग
ब्रह्माण्डपुराणान्तर्गत ललितोपाख्यान में भण्डासुर और उसके राज्य के विरुद्ध श्रीललिताम्बिका के अभियान का विस्तारपूर्वक वर्णन प्राप्त होता है। देवकार्य की सिद्धि के लिए भगवती का प्रादुर्भाव होता है और तत्पश्चात् वे अपनी दिव्य शक्तियों सहित युद्ध के लिए प्रस्थान करती हैं। वर्तमान नाम उसी महायात्रा का आरम्भिक संकेत है।
इस नाम में शक्तिसेना का सामान्य उल्लेख हुआ है। इसके पश्चात् सहस्रनाम में उस सेना के विशिष्ट विभागों, अधिष्ठात्री शक्तियों और दिव्य रथों का क्रमशः वर्णन आता है। सम्पत्करी के अधीन गजसेना, अश्वारूढा के अधीन अश्वसेना, मन्त्रिणी का गेयचक्ररथ, दण्डनाथा का किरिचक्ररथ और स्वयं श्रीललिताम्बिका का चक्रराजरथ इसी विस्तृत युद्ध-वर्णन के विभिन्न अङ्ग हैं।
अतः वर्तमान नाम सम्पूर्ण शक्तिसेना का समष्टिगत परिचय देता है, जबकि आगामी नाम उसके प्रमुख विभागों और उनके कार्यों का पृथक् निरूपण करते हैं। इस क्रमबद्धता से यह भी ज्ञात होता है कि सहस्रनाम में भण्डासुर-वध का प्रसङ्ग आकस्मिक रूप से नहीं आया, अपितु सुव्यवस्थित आख्यान के रूप में विकसित होता है।
शक्तिसेना का स्वरूप
शक्तिसेना को साधारण लौकिक सेना के समान समझना पर्याप्त नहीं है। श्रीविद्या-परम्परा में भगवती ही समस्त इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति की परम अधिष्ठात्री हैं। उनके द्वारा नियोजित देवियाँ, योगिनियाँ और शक्ति-समुदाय उनके एक ही अपरिमित सामर्थ्य के विविध कार्यरूप हैं।
किसी शक्ति का गजसेना से, किसी का अश्वसेना से, किसी का मन्त्रणा से और किसी का दण्डनीति से सम्बन्ध होना भगवती के शासन की सुव्यवस्था को प्रकट करता है। प्रत्येक शक्ति को उसका नियत स्थान, उत्तरदायित्व और कार्य प्राप्त है। इस प्रकार शक्तिसेना देवी के सार्वभौम राज्य, अनुशासन और उद्देश्यपूर्ण क्रिया की अभिव्यक्ति है।
भगवती स्वयं इस सेना की परमेश्वरी हैं। उनका सामर्थ्य सेना पर आश्रित नहीं है, बल्कि सेना का सामर्थ्य उन्हीं पर आश्रित है। फिर भी वे अपनी शक्तियों को कार्य में प्रवृत्त करती हैं। इसमें पराशक्ति की एकता और उसकी अनेक क्रियात्मक अभिव्यक्तियों का सुन्दर समन्वय दिखाई देता है।
शक्ति-तत्त्व का शास्त्रीय संकेत
सौन्दर्यलहरी का आरम्भ शक्ति की अनिवार्यता का स्मरण कराता है:
यह उद्धरण वर्तमान नाम की प्रत्यक्ष व्याख्या नहीं है, किन्तु शक्ति-तत्त्व को समझने में सहायक तात्त्विक संकेत अवश्य देता है। श्रीललिताम्बिका स्वयं पराशक्ति हैं और उनकी शक्तिसेना उसी परम शक्ति की बहुविध क्रियात्मक अभिव्यक्ति है।
श्रीविद्या में तात्त्विक संकेत
उपासना-दृष्टि से भण्डासुर उस जड़ता, अविद्या, अहन्ता और देवी-विमुख वृत्ति का संकेत माना जा सकता है जो चैतन्य के प्रकाश को आवृत करती है। यह साधनात्मक अर्थ है, नाम का एकमात्र अथवा प्रत्यक्ष अर्थ नहीं। प्रत्यक्ष स्तर पर भण्डासुर ललितोपाख्यान का असुरराज है, जिसके वध के लिए भगवती अपनी शक्तिसेना सहित उद्यत होती हैं।
इसी प्रकार शक्तिसेना को साधक के अन्तःकरण में जाग्रत होने वाली देवी-अनुकूल वृत्तियों का संकेत माना जा सकता है। विवेक, श्रद्धा, संयम, मन्त्रनिष्ठा, गुरुसेवा, शरणागति और धर्मानुकूल क्रिया जब एक ही परम लक्ष्य की ओर प्रवृत्त होती हैं, तब साधना में समन्वय उत्पन्न होता है।
यहाँ विशेष महत्त्व समन्विता पद का है। केवल अनेक साधन, अनेक विचार अथवा अनेक क्षमताएँ पर्याप्त नहीं हैं। उनका भगवती के प्रति एकनिष्ठ भाव में संयोजन आवश्यक है। बिखरी हुई अन्तःकरण-वृत्तियाँ साधना को दुर्बल करती हैं, जबकि देवी-समर्पित वृत्तियों का समन्वय साधक को स्थिरता प्रदान करता है।
साधक के लिए संदेश
यह नाम साधक को स्मरण कराता है कि देवी की करुणा केवल कोमलता के रूप में ही प्रकट नहीं होती। धर्मविरोधी और चैतन्यावरोधक प्रवृत्तियों के निराकरण के लिए वही करुणा दृढ़ संकल्प, अनुशासन और रक्षणकारी शक्ति का रूप धारण करती है।
इस नाम के जप में साधक श्रीललिताम्बिका से प्रार्थना करता है कि उसकी बुद्धि, इन्द्रियाँ, प्राण और अन्तःकरण की समस्त शुभ वृत्तियाँ देवी-संकल्प से समन्वित हों। वह भगवती से यह भी प्रार्थना करता है कि अविद्या, प्रमाद, अहन्ता और विषयासक्तिरूपी अन्तर्बाधाओं का निराकरण करने के लिए उसे विवेक, धैर्य और साधनानिष्ठा प्राप्त हो।
नाम का भाव यह नहीं कि साधक स्वयं को लौकिक संघर्ष के लिए उग्र बनाए। इसका भाव यह है कि वह धर्मानुकूल जीवन, अन्तःकरण की शुद्धि और देवी के प्रति अविचल समर्पण के लिए अपनी समस्त क्षमताओं को सुव्यवस्थित करे।
“भण्डासुरवधोद्युक्तशक्तिसेनासमन्विता” नाम में श्रीललिताम्बिका का धर्मसंस्थापनकारी और रक्षणशील स्वरूप प्रकट होता है। वे भण्डासुर के वध के लिए उद्यत अपनी दिव्य शक्तिसेना से समन्वित हैं। समस्त शक्तियाँ उन्हीं से उद्भूत, उन्हीं की आज्ञा में स्थित और उन्हीं के संकल्प की पूर्ति में प्रवृत्त हैं। इस नाम का स्मरण करते हुए साधक भगवती से प्रार्थना करता है कि उसका सम्पूर्ण अन्तःकरण देवी-अनुकूल भाव में समन्वित हो और वह श्रद्धा, विवेक तथा शरणागति के साथ साधनामार्ग पर स्थिर रहे।