प्रार्थना
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ॥
श्रीललितासहस्रनाम का चौंसठवाँ नाम “देवर्षि-गण-संघात-स्तूयमानात्म-वैभवा” भगवती के उस स्वाभाविक, अनन्त और सर्वव्यापक वैभव का उद्घोष करता है जिसकी स्तुति देवता, ऋषि, देवर्षि तथा विविध गणदेवता करते हैं। इस नाम का प्रधान अर्थ किसी बाह्य ऐश्वर्य का वर्णन नहीं है। यहाँ भगवती का अपना स्वरूप, उनकी सर्वव्यापक सत्ता और अनन्त शक्तिमत्ता स्तुति का विषय है।
पूर्ववर्ती नामों में श्रीललिताम्बिका के दिव्य धाम, श्रीमन्नगर, चिन्तामणिगृह, कदम्बवन और सुधासागर-मध्यवर्ती स्थिति का वर्णन हुआ है। इस नाम से सहस्रनाम का वर्णन एक नवीन क्रम में प्रवेश करता है। अब देवी के स्वरूप की महिमा के साथ उनके दिव्य कार्यों, विशेषतः भण्डासुर के निग्रह के लिए सम्पन्न शक्ति-प्रकाश का वर्णन आरम्भ होता है।
पदच्छेद और प्रत्यक्ष अर्थ
नाम-पाठ: देवर्षिगणसंघातस्तूयमानात्मवैभवा
व्यावहारिक पदच्छेद:
देवर्षि-गण-संघात-स्तूयमान-आत्म-वैभवा
देवर्षि पद से देवों, ऋषियों और देवर्षियों का ग्रहण किया गया है। गण से आदित्यादि विविध गणदेवता अभिप्रेत हैं। संघात का अर्थ समुदाय अथवा महासमुदाय है। स्तूयमान का अर्थ है जिसकी स्तुति की जा रही हो। आत्म का अर्थ अपना स्वरूप अथवा चैतन्यस्वरूप है और वैभवा का अर्थ है वैभव से सम्पन्न अथवा विलक्षण महिमा वाली।
इस प्रकार नाम का प्रत्यक्ष अर्थ है, “जिनके अपने स्वरूपगत वैभव की स्तुति देवों, ऋषियों, देवर्षियों और गणदेवताओं के विशाल समुदायों द्वारा की जाती है, वे श्रीललिताम्बिका।”
भास्कररायीय अर्थ
श्रीभास्करराय मखीन्द्र इस नाम से देवी के स्थूल कार्यों का वर्णन आरम्भ करते हुए उनके रहस्यभूत परस्वरूप का भी संकेत करते हैं। उनके भाष्य में इस नाम का प्रथम और स्वाभाविक अर्थ यह है कि देवगणों तथा ऋषिगणों के महासमुदाय द्वारा भगवती का आत्मस्वरूप स्तुत हो रहा है। ऐसी स्तुति से प्रकट होने वाला उनका असाधारण वैभव ही इस नाम का विषय है।
यहाँ “आत्मवैभव” का अर्थ केवल शोभा, सम्पत्ति अथवा राजकीय ऐश्वर्य नहीं है। भास्करराय इसे भगवती के व्यापकत्व और विभुत्व से भी सम्बद्ध करते हैं। वे समस्त विश्व में व्याप्त हैं, किसी सीमित प्रदेश अथवा रूप में बँधी हुई नहीं हैं और अनन्त शक्तियों से समन्वित हैं। देवता और ऋषि इसी सर्वव्यापक स्वरूप का परिचय पाकर उनकी स्तुति करते हैं।
भाष्य में “संघातशः” का अर्थ “बहुप्रकारेण”, अर्थात् अनेक प्रकारों से भी ग्रहण किया गया है। इस दृष्टि से भगवती की स्तुति किसी एक विशेषण अथवा एक ही प्रकार की वाणी तक सीमित नहीं है। विविध ज्ञान, अनुभव, उपासना और शास्त्रीय दृष्टियों से उनके वैभव का गुणगान किया जाता है, तथापि उनका स्वरूप किसी एक वर्णन में पूर्णतः सीमित नहीं होता।
भास्करराय एक निरुक्तिपरक अर्थ में “संघात” को “सम्यक् घात”, अर्थात् भण्डासुर के समुचित निग्रह की ओर संकेत करने वाला भी मानते हैं। इसी कारण इसके तुरन्त पश्चात् “भण्डासुरवधोद्युक्तशक्तिसेनासमन्विता” नाम आता है। प्रथम नाम में देवताओं और ऋषियों की स्तुति है, जबकि अगले नाम से उस प्रार्थना के प्रत्युत्तर में प्रकट भगवती की शक्तिसेना और युद्ध-संकल्प का वर्णन आरम्भ होता है।
देवर्षि और गणसमुदाय
भास्करराय नाम के स्तुतिकारों का विस्तार भी स्पष्ट करते हैं। देवों में ब्रह्मादि देवता, ऋषियों में वसिष्ठादि महर्षि और देवर्षियों में नारदादि मुनि अभिप्रेत हैं। गण पद से आदित्यादि अनेक गणदेवताओं का ग्रहण होता है। अतः “गण” और “संघात” पुनरुक्त पद नहीं हैं। गण विविध देववर्गों का बोधक है और संघात उन सभी के संयुक्त महासमुदाय का।
नाम का आशय यह नहीं है कि स्तुति से भगवती का वैभव उत्पन्न होता है। उनका वैभव नित्य और स्वाभाविक है। देवता तथा ऋषि उस पूर्वसिद्ध महिमा को पहचानकर उसका गान करते हैं। स्तुति यहाँ भगवती को महान बनाने का साधन नहीं, अपितु स्तुतिकार के अन्तःकरण में उनके माहात्म्य की स्वीकृति और शरणागति की अभिव्यक्ति है।
ललितोपाख्यान में देवस्तुति
सौभाग्यभास्कर इस नाम की व्याख्या में ब्रह्माण्डपुराण के ललितोपाख्यान में वर्णित देवस्तुति का स्मरण कराता है। भण्डासुर से पीड़ित देवगण भगवती की शरण ग्रहण करके उनके जगन्मातृत्व, परात्परता और कल्याणमय स्वरूप की स्तुति करते हैं। ललितास्तवराज का आरम्भ इस प्रकार होता है:
जय कल्याणनिलये जय कामकलात्मिके ॥
इस स्तुति में देवताओं की असहायता मात्र नहीं, उनकी तत्त्वबुद्धि भी प्रकट होती है। वे स्वीकार करते हैं कि जगत् की रक्षा करने वाली समस्त देवशक्तियों का मूल भगवती ही हैं। भण्डासुर का निग्रह भी किसी पृथक् शक्ति से नहीं, उन्हीं की स्वाभाविक शक्तिमत्ता से सम्पन्न होना है।
भाष्य नारदादि देवर्षियों द्वारा भगवती के समक्ष भण्डासुर के कारण उत्पन्न त्रैलोक्य-पीड़ा निवेदित किए जाने के प्रसंग का भी संकेत करता है। इस प्रकार नाम में वर्णित स्तुति आगामी देवी-चरित की भूमिका है। देवर्षियों की वाणी भगवती की महिमा का गान भी करती है और लोककल्याण के लिए उनकी शरण भी ग्रहण करती है।
श्रीविद्या में तात्त्विक संकेत
उपासना-दृष्टि से इस नाम का “आत्म” पद अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। भास्करराय इसके द्वारा उस चैतन्यस्वरूप का संकेत करते हैं जो समस्त प्राणियों में अनुगत है, सभी अनुभूतियों का आधार है और प्रत्येक ज्ञान-वृत्ति को प्रकाशित करता है। भगवती का आत्मवैभव इसी सर्वान्तर्यामी चैतन्य का विभुत्व और अनन्त शक्तिसम्पन्नता है।
यह तात्त्विक अर्थ नाम के प्रत्यक्ष अर्थ का निषेध नहीं करता। प्रत्यक्ष अर्थ में देवता और ऋषि भगवती की स्तुति कर रहे हैं। रहस्यार्थ में वे जिनकी स्तुति कर रहे हैं, वे उनसे दूर स्थित कोई सीमित सत्ता नहीं, अपितु समस्त ज्ञान, वाणी और देवशक्ति को प्रकाशित करने वाली परम चिति हैं। श्रीविद्या की मर्यादा में इतना ही कहना उचित है कि उपास्य देवी और साधक के अन्तरतम चैतन्य का सम्बन्ध अत्यन्त गहन है। इसके मन्त्रात्मक रहस्य गुरु-परम्परा से ही ग्रहणीय हैं।
साधक के लिए संदेश
देवता, महर्षि और देवर्षि ज्ञान, तप और सामर्थ्य से सम्पन्न होते हुए भी भगवती के समक्ष विनत होकर उनकी स्तुति करते हैं। साधक के लिए इसमें विनय का गम्भीर उपदेश है। जितना ज्ञान परिपक्व होता है, उतना ही वह अपने मूल प्रकाश की ओर झुकता है। सच्ची स्तुति अहंभाव का विस्तार नहीं, भगवती के आत्मवैभव के समक्ष बुद्धि और वाणी का समर्पण है।
इस नाम के जप में साधक श्रीललिताम्बिका से प्रार्थना करता है कि उसकी वाणी सत्य और पवित्र बने, बुद्धि तत्त्वविचार में स्थिर हो, विद्या विनय से संयुक्त रहे और उसका अन्तःकरण भगवती की सर्वव्यापक सत्ता को श्रद्धापूर्वक स्वीकार कर सके। उसके भीतर उत्पन्न प्रत्येक शुभ विचार, ज्ञान और सामर्थ्य भगवती के अनुग्रह का स्मरण कराए।