प्रार्थना
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ॥
चिन्तामणि-गृहान्तस्था पञ्च-ब्रह्मासन-स्थिता ॥२२॥
श्रीललिता सहस्रनाम में पिछले नाम श्रीमन्नगर-नायिका द्वारा भगवती को श्रीमन्नगर की अधीश्वरी के रूप में प्रणमित किया गया। अब वाग्देवियाँ उस परम दिव्य नगर के अन्तरतम निवास का निर्देश करती हैं। सत्तावनवाँ नाम है चिन्तामणि-गृहान्तस्था। यह नाम श्रीललिताम्बिका के उस दिव्य अधिष्ठान को प्रकट करता है जहाँ वे चिन्तामणिमय गृह के भीतर विराजमान हैं।
यहाँ प्रत्यक्ष अर्थ पहले ग्रहण करना चाहिए। यह नाम केवल प्रतीकात्मक कल्पना नहीं है। भास्कररायीय व्याख्या के अनुसार भगवती उस चिन्तामणि-निर्मित गृह के भीतर स्थित हैं जो श्रीनगर के मध्य में उनका परम निवास है। इसके बाद ही उपासना-दृष्टि से इसके सूक्ष्म संकेतों पर विचार किया जा सकता है।
पदच्छेद, समास और प्रत्यक्ष अर्थ
चिन्तामणि-गृहान्तस्था का पदच्छेद है चिन्तामणि-गृह-अन्तस्था।
चिन्तामणि अर्थात् दिव्य इच्छितफलप्रद रत्न, गृह अर्थात् भवन, प्रासाद या निवास, और अन्तस्था अर्थात् भीतर स्थित। इस प्रकार इस नाम का सीधा अर्थ है, वे भगवती जो चिन्तामणिमय गृह के भीतर विराजमान हैं।
अर्चना में इसका रूप है: ॐ चिन्तामणिगृहान्तस्थायै नमः। यहाँ स्थायै दत्तिविभक्ति, स्त्रीलिङ्ग, एकवचन का रूप है, इसलिए यही अर्चना-मन्त्र का शुद्ध रूप है।
भास्कररायीय अर्थ
भास्करराय मखिन इस नाम का अर्थ मुख्यतः भगवती के दिव्य निवास के रूप में करते हैं। श्रीमन्नगर में भगवती का जो अन्तरतम, परम रमणीय और दिव्य भवन है, वह चिन्तामणिमय गृह है। भगवती उसी के भीतर विराजती हैं, इसलिए वे चिन्तामणि-गृहान्तस्था कही जाती हैं।
चिन्तामणि का सामान्य अर्थ इच्छितफल देने वाले दिव्य रत्न के रूप में प्रसिद्ध है। श्रीविद्या में यह अर्थ केवल लौकिक कामना-पूर्ति तक सीमित नहीं है। भगवती का निवास चिन्तामणिमय कहा गया है, क्योंकि उनके समीप साधक की शुद्ध संकल्पना भगवत्कृपा से कल्याण, ज्ञान, शान्ति और मोक्षमार्ग की ओर प्रवृत्त होती है। यहाँ इच्छा का अर्थ अविवेकी भोग-वृत्ति नहीं, अपितु शुद्ध, देवीमुखी, साधनानुकूल संकल्प है।
इस नाम में गृह शब्द भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। श्रीललिताम्बिका केवल दूरस्थ देवता के रूप में नहीं, अपितु अपने परम धाम में, अपने निज अन्तःपुर में स्थित राजराजेश्वरी के रूप में प्रकट हैं। पिछले नाम में वे श्रीमन्नगर की नायिका हैं, और इस नाम में उसी श्रीनगर के अन्तरतम चिन्तामणिगृह में स्थित परमेश्वरी हैं।
सौन्दर्यलहरी में चिन्तामणि-गृह का संकेत
आदि शङ्करभगवत्पाद के नाम से प्रसिद्ध सौन्दर्यलहरी में भी भगवती के मणिद्वीप और चिन्तामणि-गृह का अत्यन्त सुन्दर संकेत प्राप्त होता है। यहाँ केवल वही अंश दिया जा रहा है जो इस नाम से सीधे सम्बद्ध है।
मणिद्वीपे नीपोपवनवति चिन्तामणिगृहे ।
अर्थ: अमृतसागर के मध्य, देववृक्षों की वाटिका से परिवेष्टित, कदम्बवनयुक्त मणिद्वीप में स्थित चिन्तामणि-गृह में भगवती का दिव्य निवास है।
यह वर्णन इस नाम के प्रत्यक्ष अर्थ को और पुष्ट करता है। भगवती का निवास मणिद्वीप के भीतर, दिव्य वृक्षों और अमृतमय वातावरण से युक्त चिन्तामणि-गृह में माना गया है। यह वर्णन उपासक के मन में देवी के परम धाम का भक्तिपूर्ण ध्यान जाग्रत करता है।
ललितोपाख्यान और श्रीविद्या-परम्परा का संकेत
श्रीविद्या-परम्परा में श्रीमन्नगर, मणिद्वीप, सुधासिन्धु और चिन्तामणि-गृह के वर्णन भगवती के परम साम्राज्य का ध्यान कराने के लिए आते हैं। ललितोपाख्यान में श्रीललिताम्बिका को दिव्य श्रीपुर की अधीश्वरी के रूप में वर्णित किया गया है। सहस्रनाम की यह नाममाला उसी परम्परा के अनुरूप क्रमशः उनके नगर, उनके गृह और उनके सिंहासन का निरूपण करती है।
इस नाम के बाद आने वाला नाम पञ्च-ब्रह्मासन-स्थिता है। इससे भी स्पष्ट होता है कि यहाँ वाग्देवियाँ भगवती के धाम-वर्णन को क्रम से आगे बढ़ा रही हैं। पहले सुमेरु के मध्य शृङ्ग पर उनका अधिष्ठान, फिर श्रीमन्नगर की नायिका-स्थिति, फिर चिन्तामणि-गृह का आन्तरिक निवास, और फिर पञ्चब्रह्ममय आसन पर उनका विराजना बताया गया है।
श्रीविद्या में तात्त्विक संकेत
उपासना-दृष्टि से चिन्तामणि-गृह को साधक के शुद्ध अन्तःकरण का भी संकेत माना जा सकता है। जैसे चिन्तामणि रत्न उज्ज्वल, पवित्र और इच्छित फल देने वाला कहा जाता है, वैसे ही भगवती की कृपा से शुद्ध हुआ अन्तःकरण देवीचिन्तन के लिए योग्य अधिष्ठान बनता है।
श्रीचक्रोपासना में भी यह नाम सूक्ष्म संकेत देता है। श्रीपुर और श्रीचक्र के सम्बन्ध को श्रीविद्या-परम्परा में अत्यन्त आदर से देखा जाता है। इस दृष्टि से चिन्तामणि-गृह को श्रीचक्र के अन्तरतम तत्त्व, भगवती के परम अधिष्ठान और शिवशक्ति-सामरस्य के ध्यान से जोड़ा जाता है। यहाँ रहस्य-मन्त्र, बीज या गुह्य क्रिया-विवरण का प्रसंग नहीं है, इसलिए इस विषय को केवल संकेत रूप में ही ग्रहण करना उचित है।
इस तात्त्विक अर्थ में चिन्तामणि वह दिव्य चैतन्य है जिसमें शुद्ध संकल्प सिद्धि की दिशा पाता है। गृह वह अन्तःस्थान है जहाँ साधक की चंचल वृत्ति निवृत्त होकर भगवती के चरणों में स्थित होती है। और अन्तस्था का भाव यह बताता है कि देवी बाहर खोजी जाने वाली वस्तु मात्र नहीं, अपितु भक्त के शुद्ध हृदय में अनुभव की जाने वाली परम चैतन्यमयी सत्ता हैं।
साधक के लिए संदेश
चिन्तामणि-गृहान्तस्था नाम के जप में साधक भगवती से प्रार्थना करता है कि उसका अन्तःकरण शुद्ध, स्थिर और देवीचिन्तन के योग्य बने। इस नाम का भाव यह नहीं है कि भगवती साधक की प्रत्येक असंयत इच्छा को पूर्ण करें, बल्कि यह है कि वे उसके संकल्पों को पवित्र करें और उन्हें परम कल्याण की ओर मोड़ें।
जब साधक भगवती को चिन्तामणि-गृह में विराजमान देखता है, तब वह अपने भीतर भी ऐसा पवित्र गृह बनाने का संकल्प करता है। श्रद्धा उसकी भूमि बनती है, शरणागति उसकी दीवारें बनती हैं, मन्त्रस्मरण उसका दीप बनता है और भगवती का अनुग्रह उसमें प्रकाशित चैतन्य बनकर विराजता है।
सारभाव: चिन्तामणि-गृहान्तस्था नाम भगवती श्रीललिताम्बिका के परम दिव्य निवास का स्मरण कराता है। वे श्रीमन्नगर के अन्तरतम चिन्तामणिमय गृह में विराजमान राजराजेश्वरी हैं। उपासना-दृष्टि से यह नाम साधक को अपने अन्तःकरण को शुद्ध, प्रकाशमय और देवीचिन्तनयोग्य बनाने की प्रेरणा देता है। इस नाम के जप में साधक भगवती से प्रार्थना करता है कि उसकी वृत्ति भगवती के चरणों में स्थिर हो और उसके संकल्प परम कल्याण की दिशा में प्रवाहित हों।