गुरुवार, 9 जुलाई 2026

56.श्रीमन्नगर-नायिका - श्रीमन्नगरनायिकायै नमः

प्रार्थना

शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥

सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ॥

सुमेरुमध्यशृङ्गस्था श्रीमन्नगरनायिका
चिन्तामणिगृहान्तस्था पञ्चब्रह्मासनस्थिता ॥२२॥

श्रीललितासहस्रनाम में पिछले नाम “सुमेरुमध्यशृङ्गस्था” में भगवती के सुमेरु के मध्य-शृङ्ग पर स्थित होने का वर्णन हुआ। उसी प्रवाह में छप्पनवाँ नाम है, श्रीमन्नगरनायिका। यह नाम बताता है कि श्रीललिताम्बिका उस श्रीसम्पन्न दिव्य नगर की अधिष्ठात्री स्वामिनी हैं, जिसे श्रीविद्या-परम्परा में श्रीपुर, श्रीनगर अथवा चिन्तामणि-मण्डित देवी-निवास के रूप में आदरपूर्वक स्मरण किया जाता है।

पदच्छेद, सन्धि और प्रत्यक्ष अर्थ

इस नाम का पदच्छेद है, श्रीमत्-नगर-नायिका। “श्रीमत्” का अर्थ है, श्री, ऐश्वर्य, मंगल, शोभा और दिव्य सम्पदा से युक्त। “नगर” यहाँ साधारण नगर नहीं, अपितु भगवती का दिव्य श्रीपुर है। “नायिका” का अर्थ है स्वामिनी, अधिष्ठात्री और शासनकर्त्री। “श्रीमत्” और “नगर” के संयोग से सन्धि द्वारा “श्रीमन्नगर” रूप बनता है। इसलिए नाम का प्रत्यक्ष अर्थ हुआ, जो श्रीसम्पन्न दिव्य नगररूपी श्रीपुर की अधिष्ठात्री स्वामिनी हैं, वे श्रीमन्नगरनायिका हैं।

भास्कररायीय अर्थ

भास्करराय मखिन् के सौभाग्य-भास्कर में इस नाम का मुख्य संकेत भगवती के श्रीपुर से है। “श्रीमन्नगर” वह परम दिव्य नगर है जो श्रीसम्पदा से विभूषित है, और भगवती उसकी नायिका हैं। यहाँ “नायिका” शब्द केवल निवासिनी का बोध नहीं कराता, अपितु नगर की अधिष्ठात्री, नियन्त्री और साम्राज्ञी का बोध कराता है।

इस प्रकार पिछले नाम में सुमेरु के मध्य-शृङ्ग पर देवी का स्थान बताया गया और इस नाम में उस शिखर पर विराजमान दिव्य श्रीपुर की स्वामिनी के रूप में भगवती का निरूपण हुआ। अर्थ की यह क्रमबद्धता अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। पहले स्थान का निर्देश है, फिर उस स्थान में स्थित श्रीसम्पन्न नगर का निर्देश है, और फिर उस नगर की परात्परा अधिष्ठात्री का निरूपण है।

इस नाम में भगवती को श्रीपुर की नायिका कहने का तात्पर्य यह भी है कि दिव्य ऐश्वर्य, आनन्द, विद्या, शक्ति और शासन, ये सब उनसे ही प्रकाशित होते हैं। श्रीपुर भगवती से पृथक् कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। उसकी श्री, उसकी शोभा, उसकी चेतना और उसका आधिपत्य सब श्रीललिताम्बिका के अनुग्रह से ही अर्थवान् हैं।

सौन्दर्यलहरी में दिव्य निवास का संकेत

सौन्दर्यलहरी के अष्टम श्लोक में भगवती के दिव्य निवास का अत्यन्त रमणीय संकेत मिलता है। यहाँ केवल वही अंश ग्रहणीय है जो इस नाम के अर्थ को पुष्ट करता है:

सुधासिन्धोर्मध्ये सुरविटपिवाटीपरिवृते
मणिद्वीपे नीपोपवनवति चिन्तामणिगृहे ।

अर्थ: अमृत-सागर के मध्य, कल्पवृक्षों की वाटिकाओं से परिवृत, नीप-वृक्षों के उपवनों से सुशोभित मणिद्वीप में स्थित चिन्तामणि-गृह में भगवती का ध्यान किया जाता है। यह श्लोक श्रीमन्नगर-नायिका नाम का प्रत्यक्ष भाष्य नहीं है, परन्तु भगवती के दिव्य निवास, मणिद्वीप और चिन्तामणि-गृह की भावना को सुन्दर तात्त्विक आधार देता है।

ललितोपाख्यान और मणिद्वीप का संकेत

ब्रह्माण्डपुराण के ललितोपाख्यान में भगवती श्रीललिता के दिव्य राज्य, उनके चिन्तामणि-गृह, दिव्य सेना, देवशक्तियों और श्रीविद्यामयी व्यवस्था का वर्णन आता है। इस प्रसंग को इस नाम के साथ सावधानी से जोड़ा जाना चाहिए। “श्रीमन्नगरनायिका” नाम का प्रत्यक्ष अर्थ श्रीपुर की अधिष्ठात्री भगवती है। ललितोपाख्यान में प्राप्त दिव्य नगर, राजराजेश्वरी भाव और श्रीचक्रराज-सम्बद्ध व्यवस्था इस नाम की उपासना-दृष्टि को विस्तार देती है।

देवीभागवतपुराण में भी मणिद्वीप को देवी के परम धाम के रूप में महिमामय रीति से वर्णित किया गया है। वहाँ के वर्णन में देवी सर्वदेवमयी, सर्वशक्तिमयी और सर्वलोकाधिष्ठात्री रूप में प्रतिष्ठित हैं। इस आधार पर श्रीमन्नगर को केवल भौतिक निवास न मानकर देव्या के परम ऐश्वर्य, परम शान्ति और परम चैतन्य के अधिष्ठान के रूप में समझा जा सकता है।

श्रीविद्या में तात्त्विक संकेत

श्रीविद्या की उपासना-दृष्टि में श्रीपुर का सम्बन्ध श्रीचक्र से भी जोड़ा जाता है। यह अर्थ प्रत्यक्ष पद-विग्रह का स्थान नहीं लेता, अपितु साधनात्मक संकेत के रूप में समझना चाहिए। श्रीचक्र के आवरणों में साधक बाह्य से आन्तरिक की ओर, विविध शक्तियों के मण्डल से होते हुए, अन्ततः बिन्दु में प्रतिष्ठित पराशक्ति की ओर उन्मुख होता है। इस दृष्टि से श्रीचक्र देव्या का चैतन्यमय नगर है और बिन्दु उस नगर का परम रहस्यात्मक अधिष्ठान है।

इस विषय में रहस्य-मन्त्र, बीज और आवरण-पूजा से सम्बन्धित गूढ़ विवरण गुरु-परम्परा के अन्तर्गत ही ग्रहणीय हैं। यहाँ इतना समझना पर्याप्त है कि “श्रीमन्नगरनायिका” नाम साधक को स्मरण कराता है कि समस्त श्रीविद्यामयी व्यवस्था की स्वामिनी स्वयं श्रीललिताम्बिका हैं। आवरण, देवता, मन्त्र और यन्त्र, ये सब उन्हीं की पराशक्ति के विविध प्रकाश हैं।

देहरूपी नगर में अधिष्ठात्री भगवती

उपासना-दृष्टि से साधक अपने अन्तःकरण को भी एक नगर के समान देख सकता है। इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राण और चित्त, ये सब उसी आन्तरिक नगर के विभाग हैं। जब यह नगर अविद्या, विक्षेप और अहंकाररूपी वृत्तियों से संचालित होता है, तब साधक में अशान्ति उत्पन्न होती है। परन्तु जब साधक श्रद्धापूर्वक भगवती को अपने अन्तःकरण की अधिष्ठात्री नायिका के रूप में वरण करता है, तब वही अन्तःकरण साधना, विवेक और शरणागति का क्षेत्र बनता है।

अतः “श्रीमन्नगरनायिका” नाम केवल दूरस्थ दिव्य लोक का वर्णन नहीं करता। यह नाम साधक को यह भी स्मरण कराता है कि भगवती के अनुग्रह से ही अन्तःकरण में श्री, सौम्यता, मर्यादा, प्रकाश और धर्ममयी व्यवस्था प्रतिष्ठित होती है।

साधक के लिए संदेश

इस नाम के जप में साधक भगवती से प्रार्थना करता है कि वे उसके अन्तःकरण में भी श्रीपुरवत् पवित्रता, शान्ति और चैतन्य की स्थापना करें। जैसे श्रीमन्नगर भगवती की अधिष्ठात्री सत्ता से शोभित है, वैसे ही साधक का जीवन भी देवी की स्मृति, मर्यादा, करुणा और विवेक से सुशोभित हो।

इस नाम का भाव यह नहीं कि साधक किसी बाह्य वैभव की आकांक्षा करे। इसका श्रेष्ठ भाव यह है कि साधक अपने भीतर देवी की नायिकात्व-शक्ति को स्वीकार करे। जब जीवन के प्रत्येक कर्म में भगवती का अधिष्ठान स्मरण होता है, तब साधक के लिए घर, देह, अन्तःकरण और साधना, ये सब देवी की सेवा के क्षेत्र बन जाते हैं।

सारांश: “श्रीमन्नगरनायिका” नाम का प्रत्यक्ष अर्थ है, श्रीसम्पन्न दिव्य नगररूपी श्रीपुर की अधिष्ठात्री स्वामिनी भगवती। भास्कररायीय अर्थ में यह नाम देवी के राजराजेश्वरी स्वरूप, श्रीपुराधिष्ठान और परम ऐश्वर्य को प्रकट करता है। श्रीविद्या की उपासना-दृष्टि में यही श्रीपुर श्रीचक्र के चैतन्यमय रहस्य का संकेत भी देता है। इस नाम के जप में साधक भगवती से प्रार्थना करता है कि वे उसके अन्तःकरणरूपी नगर में भी श्री, शान्ति, विवेक और चैतन्य का अधिष्ठान करें।

122.शाम्भवी - शाम्भव्यै नमः

प्रार्थना शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान...