प्रार्थना
श्रीललितासहस्रनाम के पूर्ववर्ती नामों में भगवती के दिव्य अधिष्ठानरूपी श्रीमन्नगर तथा उसके मध्य स्थित चिन्तामणिगृह का वर्णन हुआ है। अब वाग्देवियाँ उस परम आसन का परिचय देती हैं जिस पर श्रीललिताम्बिका विराजमान हैं। उनका अट्ठावनवाँ नाम है पञ्चब्रह्मासनस्थिता।
यह नाम सर्वप्रथम देवी की प्रत्यक्ष आसन-स्थिति का वर्णन करता है। साथ ही यह इस गम्भीर शाक्त सिद्धान्त को प्रकट करता है कि ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिवरूपी पञ्चब्रह्म भी भगवती की चैतन्यशक्ति से ही अपने-अपने कार्य में समर्थ होते हैं।
पदच्छेद और प्रत्यक्ष अर्थ
पदच्छेद: पञ्चब्रह्म-आसन-स्थिता।
पञ्चब्रह्म अर्थात् ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव। आसन का अर्थ बैठने का आधार है तथा स्थिता का अर्थ उस पर स्थित अथवा विराजमान है।
इस प्रकार नाम का सीधा अर्थ है, “जो पञ्चब्रह्मों से निर्मित आसन पर विराजमान हैं।”
भास्कररायीय अर्थ
भास्करराय मखिन् की व्याख्या के अनुसार इस दिव्य आसन के चार आधार ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और ईश्वर हैं तथा सदाशिव उसका फलक अथवा ऊपरी आसनभाग हैं। इन पाँचों से संयुक्त होने के कारण वह पञ्चब्रह्मासन कहलाता है। उस पर विराजमान भगवती पञ्चब्रह्मासनस्थिता हैं।
यहाँ “आसन” शब्द को केवल किसी साधारण सिंहासन के अर्थ में नहीं समझना चाहिए। यह देवी की परमाधिष्ठात्री स्थिति का द्योतक है। जिन पञ्चब्रह्मों के द्वारा जगत् की सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोधान और अनुग्रह से संबद्ध कार्य सम्पन्न होते हैं, वे स्वयं श्रीललिताम्बिका की शक्ति से अधिष्ठित हैं।
अतः इस नाम का आशय पाँचों देवताओं का अवमूल्यन करना नहीं है। इसका अभिप्राय यह है कि उनके भीतर कार्यरत सामर्थ्य भगवती की पराशक्तिरूपी चेतना से अभिन्न है। शक्ति के बिना कोई भी दैवी कार्य प्रवृत्त नहीं हो सकता।
सौन्दर्यलहरी का साक्ष्य
सौन्दर्यलहरी के बानवेवें श्लोक में भी इसी दिव्य मञ्च का अत्यन्त सुन्दर काव्यात्मक वर्णन प्राप्त होता है:
अर्थ: हे देवी! ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और ईश्वर आपके मञ्च के आधाररूप हो गए हैं। स्वच्छ स्फटिक के समान कान्तिमान सदाशिव उस मञ्च के आच्छादनरूप में स्थित हैं।
इस काव्यात्मक चित्रण में वही व्यवस्था व्यक्त होती है जो पञ्चब्रह्मासनस्थिता नाम में संक्षेपतः निहित है। देवी पञ्चब्रह्ममय मञ्च पर परमेश्वरी के रूप में विराजमान हैं और उनकी अरुण प्रभा सम्पूर्ण आसन को अपने सौन्दर्य से आलोकित करती है।
पञ्चब्रह्म और पञ्चकृत्य
श्रीविद्या-परम्परा में पञ्चब्रह्मों का संबंध पाँच दैवी कृत्यों से देखा जाता है। ब्रह्मा सृष्टि, विष्णु स्थिति, रुद्र संहार, ईश्वर तिरोधान तथा सदाशिव अनुग्रह से संबद्ध हैं। इन कृत्यों का विस्तार सहस्रनाम में आगे सृष्टिकर्त्री, ब्रह्मरूपा, गोप्त्री, गोविन्दरूपिणी, संहारिणी, रुद्ररूपा, तिरोधानकरी, ईश्वरी, सदाशिवा और अनुग्रहदा जैसे नामों द्वारा भी प्रकट किया गया है।
इससे यह तात्त्विक भाव स्पष्ट होता है कि भगवती इन पाँच कार्यों से पृथक् कोई निष्क्रिय सत्ता नहीं हैं। वे स्वयं चित्शक्तिरूपिणी होकर समस्त दैवी क्रियाशक्ति की मूल अधिष्ठात्री हैं।
श्रीविद्या में तात्त्विक संकेत
उपासना-दृष्टि से पञ्चब्रह्मासन भगवती के सर्वाधिष्ठानत्व का संकेत देता है। ब्रह्मा से सदाशिव तक जो कुछ सृजन करता, धारण करता, संहृत करता, आवृत करता अथवा अनुग्रह प्रदान करता है, उस सम्पूर्ण सामर्थ्य का मूल पराचैतन्य श्रीललिताम्बिका ही हैं।
शक्ति से रहित चेतन अधिष्ठाता किसी क्रिया को सम्पन्न नहीं करता और चेतना से पृथक् शक्ति का भी स्वतंत्र अस्तित्व नहीं माना जाता। अतः इस नाम में शिव और शक्ति का विरोध नहीं, अपितु उनका अविभाज्य ऐक्य अन्तर्निहित है। भगवती का पञ्चब्रह्मासन पर विराजना उनके इसी सर्वोपरि चित्शक्ति-स्वरूप को व्यक्त करता है।
इस रहस्य को केवल स्थूल प्रतिमा-विन्यास तक सीमित नहीं करना चाहिए। आसन की मूर्त कल्पना उपासना के लिए ग्राह्य है, किन्तु उसका अन्तरंग तात्पर्य यह है कि समस्त देवता, समस्त क्रियाएँ और उनके समस्त फल अन्ततः एक ही पराशक्ति में अधिष्ठित हैं।
साधक के लिए संदेश
इस नाम का जप करते हुए साधक भगवती का ध्यान उस परमेश्वरी के रूप में करता है जिनकी शक्ति से सृष्टि का प्रत्येक विधान संचालित होता है। इससे अन्तःकरण में यह भाव दृढ़ होता है कि साधक का ज्ञान, सामर्थ्य, कर्म और साधना भी स्वयं उसकी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, अपितु भगवती के अनुग्रह से प्राप्त साधन हैं।
इस भाव से अहंकार शिथिल होता है और शरणागति पुष्ट होती है। साधक भगवती से प्रार्थना करता है कि वे उसके अन्तःकरण को ऐसा पवित्र आसन बनाएँ जिसमें श्रद्धा, विवेक, संयम और भक्ति प्रतिष्ठित हों तथा जहाँ उनके चैतन्य का स्मरण निरन्तर बना रहे।
पञ्चब्रह्मासनस्थिता वह श्रीललिताम्बिका हैं जो ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव से निर्मित दिव्य आसन पर विराजमान हैं। यह नाम उनके परमाधिष्ठात्री स्वरूप, पञ्चकृत्यों की मूल चित्शक्ति तथा समस्त दैवी सामर्थ्य के आधाररूप महत्त्व को प्रकट करता है। उनके चरणों में प्रणत साधक यही प्रार्थना करता है कि उसका अन्तःकरण अहंकार से रहित होकर भगवती के स्मरण और अनुग्रह का योग्य आसन बने।