गुरुवार, 16 जुलाई 2026

63.कामदायिनी - कामदायिन्यै नमः

प्रार्थना

शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ॥

महापद्माटवीसंस्था कदम्बवनवासिनी ।
सुधासागरमध्यस्था कामाक्षी कामदायिनी ॥२३॥

श्रीललितासहस्रनाम का तिरसठवाँ नाम “कामदायिनी” भगवती की उस अनुग्रहमयी सामर्थ्य का उद्घोष करता है, जिसके द्वारा वे अपने आश्रितों के धर्मानुकूल मनोरथों को पूर्ण करती हैं। पूर्ववर्ती नाम “कामाक्षी” में उनके करुणामय एवं कमनीय नेत्रों का वर्णन है। उसके पश्चात् आया यह नाम बताता है कि उनकी कृपादृष्टि केवल दर्शनमात्र नहीं, अपितु अभीष्ट-प्रदायिनी भी है।

यहाँ “काम” का प्राथमिक अर्थ इच्छा, अभिलाषा अथवा मनोरथ है। किन्तु श्रीविद्या-दृष्टि से इसका अर्थ केवल क्षणभंगुर विषयाकांक्षा तक सीमित नहीं है। इसमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूपी पुरुषार्थों की प्राप्ति की कामना तथा अन्ततः परम तत्त्व की उपलब्धि का मनोरथ भी समाविष्ट हो सकता है।

पदच्छेद, व्युत्पत्ति और प्रत्यक्ष अर्थ

पदच्छेद: काम + दायिनी

व्युत्पत्ति: कामान् ददातीति कामदायिनी।

अर्थात् जो कामनाओं और मनोरथों को प्रदान करती हैं, वे कामदायिनी हैं। “दायिनी” स्त्रीलिङ्ग पद का अर्थ देने वाली अथवा प्रदान करने वाली है।

अर्चना-मन्त्र: ॐ कामदायिन्यै नमः।

भास्कररायीय अर्थ

भास्करराय मखीन्द्र इस नाम का सर्वप्रथम अत्यन्त सरल और प्रत्यक्ष अर्थ करते हैं:

कामान् मनोरथान् ददातीति कामदायिनी ।
अर्थात् जो कामनारूपी मनोरथों को प्रदान करती हैं, वे कामदायिनी हैं।

यही इस नाम का प्रधान और सीधा अर्थ है। भगवती जीव के अन्तरतम भाव को जानती हैं और उसकी पात्रता, धर्म तथा परम कल्याण के अनुरूप फल प्रदान करती हैं। अतः यहाँ कामनापूर्ति का आशय प्रत्येक अविवेकी इच्छा को पुष्ट करना नहीं, अपितु देवी के सर्वज्ञ अनुग्रह द्वारा उचित मनोरथ की सिद्धि है।

भास्करराय इसके पश्चात् कुछ गूढ़ व्युत्पत्तिपरक अर्थ भी प्रस्तुत करते हैं। एक अर्थ में भगवती अपने भक्तों को कामेश्वर प्रदान करती हैं। इसका तात्पर्य किसी लौकिक वस्तु के दान से नहीं, अपितु शिव के साथ अभेदभाव की प्राप्ति से है। श्रीविद्या में देवी और कामेश्वर का परमार्थतः अभेद स्वीकार किया जाता है। अतः उनका परम दान साधक को शिवतत्त्व की अनुभूति प्रदान करना है।

भाष्यकार एक अन्य व्युत्पत्ति में “काम” को मन्मथ मानकर उसके खण्डन की ओर संकेत करते हैं। इस दृष्टि से भगवती अनियन्त्रित कामवृत्ति का शमन करके साधक के लिए शुभ मार्ग प्रशस्त करती हैं। यह अर्थ प्रत्यक्ष नामार्थ के स्थान पर नहीं, अपितु भाष्य में प्रस्तुत एक वैकल्पिक शब्दनिर्वचन के रूप में ग्रहण करना चाहिए।

एक और व्युत्पत्ति में “दाय” का अर्थ परम्परा से प्राप्त स्वत्व है। इस प्रकार भगवती कामेश्वर के साथ अनादिसिद्ध अभिन्नता से सम्पन्न हैं। इन विभिन्न निर्वचनों से स्पष्ट होता है कि नाम का विस्तार लौकिक मनोरथों की पूर्ति से लेकर शिवाभेदरूपी परम फल तक है।

ब्रह्माण्डपुराण का प्रमाण

भास्करराय इस नाम की पुष्टि में ब्रह्माण्डपुराण का वचन उद्धृत करते हैं:

सर्वज्ञा साक्षिभावेन तत्तत्कामानपूरयत् ।
सर्वज्ञ भगवती ने साक्षिरूप में स्थित होकर उन-उन कामनाओं को पूर्ण किया।

“साक्षिभावेन” पद विशेष महत्त्व रखता है। देवी जीव के बाह्य आचरण की ही नहीं, उसके अन्तःकरण में स्थित अभिलाषा, संस्कार और वास्तविक आवश्यकता की भी साक्षिणी हैं। उनका दान सर्वज्ञता से उद्भूत है, इसलिए वह केवल याचना के बाह्य शब्दों पर निर्भर नहीं रहता।

भगवती के चरणों की अभीष्ट-प्रदायिनी महिमा

सौन्दर्यलहरी के चतुर्थ श्लोक में भगवती के चरणों को प्रार्थना से भी अधिक फल प्रदान करने में समर्थ कहा गया है। यह पद्य “कामदायिनी” नाम की भावभूमि को सुन्दर रूप से प्रकाशित करता है:

भयात्त्रातुं दातुं फलमपि च वाञ्छासमधिकं
शरण्ये लोकानां तव हि चरणावेव निपुणौ ॥
हे समस्त लोकों की शरण्ये! भय से रक्षा करने और कामना से भी अधिक फल देने में आपके दोनों चरण ही पूर्ण समर्थ हैं।

यहाँ “वाञ्छासमधिकम्” पद यह दर्शाता है कि देवी का अनुग्रह साधक की सीमित कल्पना से बँधा हुआ नहीं है। साधक किसी अल्प फल की याचना कर सकता है, किन्तु भगवती उसके कल्याण के अनुरूप अधिक व्यापक फल प्रदान कर सकती हैं। अतः उनका वरदान केवल इच्छित वस्तु की प्राप्ति नहीं, कभी-कभी इच्छा का परिष्कार भी होता है।

श्रीविद्या में तात्त्विक संकेत

श्रीविद्या में इच्छा को सर्वथा त्याज्य नहीं माना जाता। इच्छा भगवती की इच्छाशक्तिरूपी व्यापक तत्त्व-व्यवस्था का जीव में सीमित प्रतिबिम्ब हो सकती है। बन्धन का कारण इच्छा का अस्तित्वमात्र नहीं, अपितु अविवेक, अहंभाव और विषयासक्ति से उसका संयोग है।

कामदायिनी भगवती साधक के मनोरथ को तीन प्रकार से अनुगृहीत कर सकती हैं। धर्मानुकूल इच्छा को उचित फल प्रदान करके, अहितकारी इच्छा का शमन करके तथा सीमित इच्छा को परम पुरुषार्थ की ओर परिवर्तित करके। इस प्रकार वे केवल कामना का विषय प्रदान करने वाली नहीं, कामना को शुद्ध और उदात्त करने वाली भी हैं।

भास्करराय का “कामेश्वर को भक्तों में वितरित करने” वाला अर्थ इसी उच्चतर तत्त्व की ओर संकेत करता है। भगवती का सर्वोच्च दान कोई बाह्य पदार्थ नहीं, अपितु साधक को अपने शिवस्वरूप की पहचान प्रदान करना है। यह अर्थ रहस्योपासना के विवरण का उद्घाटन किए बिना देवी के अनुग्रह की परम दिशा को प्रकट करता है।

साधक के लिए संदेश

“कामदायिनी” नाम के जप में साधक भगवती के सम्मुख अपनी कामनाओं को छिपाता नहीं, अपितु उन्हें श्रद्धापूर्वक समर्पित करता है। साथ ही वह यह प्रार्थना करता है कि देवी उसकी इच्छाओं में जो धर्मानुकूल और कल्याणकारी हो उसे पूर्ण करें, जो अहितकारी हो उसका शमन करें तथा जो सीमित हो उसे परम तत्त्व की ओर उन्नत करें।

शरणागति का अर्थ इच्छा-विहीन जड़ता नहीं है। उसका अर्थ है अपनी इच्छा को भगवती की सर्वज्ञ इच्छा के अधीन करना। साधक कहता है, “माता, मेरे मनोरथ को आप जानती हैं; किन्तु उसका कौन-सा फल मेरे लिए वास्तव में मंगलकारी है, यह भी आप ही जानती हैं।”

इस भाव से किया गया नामस्मरण याचना को उपासना में और अभिलाषा को आत्मसमर्पण में परिणत करता है। तब भगवती का वरदान कभी अभीष्ट वस्तु के रूप में, कभी विवेक के रूप में, कभी वैराग्य के रूप में और कभी शिवाभेद की परम अभिलाषा के रूप में प्रकट होता है।

नाम-सार
कामदायिनी का प्रत्यक्ष अर्थ है, मनोरथों को प्रदान करने वाली भगवती। भास्करराय के अनुसार वे जीवों की कामनाएँ पूर्ण करती हैं, भक्त को कामेश्वररूपी शिवतत्त्व प्रदान करती हैं, अनियन्त्रित कामवृत्ति का शमन करती हैं और कामेश्वर के साथ अनादिसिद्ध अभेद से सम्पन्न हैं। इस नाम के स्मरण में साधक श्रीललिताम्बिका से प्रार्थना करता है कि वे उसकी इच्छा को धर्मानुकूल करें, अन्तःकरण को शुद्ध करें और अन्ततः परम पुरुषार्थ की ओर ले जाएँ।

122.शाम्भवी - शाम्भव्यै नमः

प्रार्थना शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान...