बुधवार, 15 जुलाई 2026

62.कामाक्षी - कामाक्ष्यै नमः

प्रार्थना

शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ॥

महापद्माटवीसंस्था कदम्बवनवासिनी ।
सुधासागरमध्यस्था कामाक्षी कामदायिनी ॥ २३ ॥

श्रीललितासहस्रनाम का बासठवाँ नाम कामाक्षी है। पूर्ववर्ती नामों में श्रीललिताम्बिका के श्रीनगर, चिन्तामणिगृह, महापद्माटवी, कदम्बवन तथा सुधासागर के मध्य स्थित दिव्य अधिष्ठान का निरूपण हुआ है। अब वाग्देवियाँ भगवती के कमनीय नेत्रों तथा कामेश्वर से सम्बद्ध उनकी दिव्य दृष्टि का वर्णन करती हैं।

इस नाम का प्रत्यक्ष अर्थ समझते समय कामाक्षी को अगले नाम कामदायिनी में मिला देना उचित नहीं है। कामाक्षी नाम का प्रथम अर्थ भगवती के कमनीय नेत्रों से सम्बन्धित है, जबकि कामदायिनी नाम उनके द्वारा अभिलषित फल प्रदान किए जाने का बोध कराता है।

नाम, व्युत्पत्ति और प्रत्यक्ष अर्थ

नाम: कामाक्षी

व्युत्पत्तिगत विग्रह: कामे, अर्थात् कमनीये, अक्षिणी यस्याः सा कामाक्षी।

कामे कमनीये अक्षिणी यस्याः ।
अर्थ: जिन भगवती के दोनों नेत्र कमनीय, मनोहर और दर्शनमात्र से चित्त को आकृष्ट करनेवाले हैं, वे कामाक्षी हैं।

यहाँ काम पद को भास्करराय सर्वप्रथम कमनीय, अर्थात् सुन्दर, प्रिय तथा मनोहर अर्थ में ग्रहण करते हैं। अक्षि का अर्थ नेत्र है। बहुव्रीहिसमास के द्वारा यह नाम उस देवी का बोध कराता है जिनके दोनों नेत्र परम कमनीय हैं। भास्करराय इस शब्दरूप की सिद्धि में समासान्त टच् प्रत्यय का भी निर्देश करते हैं।

भास्कररायीय अर्थ

सौभाग्यभास्कर में भास्करराय इस नाम के दो प्रमुख अर्थ प्रस्तुत करते हैं। प्रथम अर्थ भगवती के कमनीय नेत्रों से सम्बन्धित है। श्रीललिताम्बिका के नेत्र केवल बाह्य सौन्दर्य के अवयव नहीं हैं। वे उनकी सौम्यता, सर्वज्ञता, वात्सल्य तथा अनुग्रहपूर्ण अवलोकन के द्योतक भी हैं।

द्वितीय अर्थ में भास्करराय कहते हैं कि कामेश्वर ही उनका नेत्र हैं

कामेश्वर एव नेत्रं यस्याः ।
अर्थ: जिन भगवती के लिए कामेश्वर स्वयं नेत्ररूप हैं, वे कामाक्षी हैं।

भास्करराय स्पष्ट करते हैं कि कामेश्वर भगवती की दृष्टि के विषय हैं, इसलिए उपचार अथवा रूपक के द्वारा उन्हें देवी का नेत्र कहा गया है। इसे प्रतिमा के किसी पृथक् नेत्रविधान के रूप में नहीं समझना चाहिए। इसका भाव यह है कि देवी की दृष्टि कामेश्वर में प्रतिष्ठित है तथा कामेश्वर और कामेश्वरी परस्पर अविभाज्य हैं।

काञ्चीपीठ की अधिष्ठात्री

भास्करराय का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण निर्देश यह है कि कामाक्षी काञ्चीपीठ की अधिष्ठात्री देवी का असाधारण, अर्थात् विशिष्ट नाम है। इस प्रकार सहस्रनाम में कामाक्षी केवल सुन्दर नेत्रों का सामान्य विशेषण नहीं है। यह श्रीललिताम्बिका के काञ्चीपीठस्थित उपास्य स्वरूप का भी स्पष्ट निर्देश करता है।

काञ्ची की कामाक्षी और श्रीविद्या की श्रीललितामहात्रिपुरसुन्दरी को पृथक् देवता मानना भास्कररायीय व्याख्या के अनुरूप नहीं है। नामभेद तथा स्थानविशेष होने पर भी उपास्य पराशक्ति एक ही हैं।

ब्रह्माण्डपुराण का प्रमाण

कामाक्षी नाम की व्याख्या करते हुए भास्करराय ब्रह्माण्डपुराण का एक प्रसंग उद्धृत करते हैं। उसमें भगवती को सर्वज्ञ तथा साक्षीभाव में स्थित होकर प्राणियों की पृथक्-पृथक् कामनाएँ पूर्ण करते हुए वर्णित किया गया है।

सर्वज्ञा साक्षिभावेन तत्तत्कामानपूरयत् ।
तद्दृष्ट्वा चरितं देव्या ब्रह्मा लोकपितामहः ॥
अर्थ: सर्वज्ञ भगवती ने साक्षीभाव में स्थित होकर सबकी पृथक्-पृथक् कामनाएँ पूर्ण कीं। देवी के इस चरित को देखकर लोकपितामह ब्रह्मा चकित हुए।

इसके अनन्तर ब्रह्मा ने भगवती को कामाक्षी और कामेश्वरी नाम प्रदान किए। इस पुराणप्रसंग से नाम का एक विस्तृत भाव सामने आता है। भगवती सबके अन्तःकरण को जानती हैं और साक्षीभाव में स्थित होकर पात्रता तथा विधान के अनुरूप अनुग्रह करती हैं।

इस प्रसंग का अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक लौकिक अभिलाषा बिना विवेक अथवा मर्यादा के पूर्ण हो जाती है। यहाँ देवी की सर्वज्ञता, साक्षित्व और अनुग्रहशक्ति का स्तवन है।

कामाक्षी और कामदायिनी का पार्थक्य

सहस्रनाम के पद्य में सुधासागरमध्यस्था, कामाक्षी और कामदायिनी नाम साथ आते हैं, किन्तु प्रत्येक नाम का अपना स्वतंत्र व्युत्पत्तिगत अर्थ है।

सुधासागरमध्यस्था भगवती के दिव्य अधिष्ठान का बोध कराता है। कामाक्षी उनके कमनीय नेत्रों, कामेश्वरनिष्ठ दृष्टि तथा काञ्चीपीठस्थित स्वरूप का निर्देश करता है। कामदायिनी अभिलषित फल प्रदान करनेवाली देवी का नाम है। अतः कामनाओं की पूर्ति को कामाक्षी का एकमात्र प्रत्यक्ष अर्थ मानना दोनों नामों के पार्थक्य को मिटा देता है।

नामक्रम में सुन्दर अर्थसामञ्जस्य अवश्य है। सुधासागर के मध्य विराजमान भगवती अपने कमनीय नेत्रों से समस्त जगत् का अवलोकन करती हैं और कामदायिनी के रूप में जीवों को उनकी पात्रता के अनुरूप फल प्रदान करती हैं।

श्रीविद्या में तात्त्विक संकेत

उपासना दृष्टि से नेत्र ज्ञान, प्रकाश और अवलोकन का प्रतीक है। भगवती का कामाक्षी स्वरूप यह स्मरण कराता है कि समस्त दृश्य जगत् उनकी सर्वज्ञ चैतन्यदृष्टि में प्रकाशित हो रहा है। वे प्रत्येक जीव के बाह्य आचरण के साथ उसके अन्तःकरण की गति को भी जानती हैं।

भास्करराय का “कामेश्वर ही उनका नेत्र हैं” वाला अर्थ शिव और शक्ति की परस्पर अभिन्नता का सूक्ष्म संकेत देता है। कामेश्वरी की दृष्टि कामेश्वर से पृथक् नहीं और कामेश्वर का प्रकाश कामेश्वरी की विमर्शशक्ति से पृथक् नहीं माना जाता। यह साधनात्मक संकेत है, नाम के प्रत्यक्ष अर्थ का प्रतिस्थापन नहीं।

ब्रह्माण्डपुराण में वर्णित साक्षीभाव भी इसी तत्त्व को पुष्ट करता है। देवी सबकी कामनाओं को जानती हैं, किन्तु स्वयं उनसे बँधती नहीं हैं। वे साक्षिणी हैं, सर्वज्ञा हैं और अनुग्रह की स्वतन्त्र अधिष्ठात्री हैं।

साधक के लिए संदेश

ॐ कामाक्ष्यै नमः का जप करते हुए साधक भगवती के कमनीय, करुणापूर्ण और सर्वज्ञ नेत्रों का स्मरण करता है। वह प्रार्थना करता है कि उसकी अपनी दृष्टि भी राग, द्वेष, असूया और अविवेक से मुक्त होकर शुद्ध तथा कल्याणमयी बने।

इस नाम का चिन्तन साधक को अपनी कामनाओं का परीक्षण करने की प्रेरणा देता है। जो कामना धर्म, उपासना और अन्तःकरण की शुद्धि में सहायक हो, उसे भगवती के चरणों में समर्पित करना चाहिए। जो अभिलाषा बन्धन, अहंकार अथवा विषयासक्ति को बढ़ाती हो, उसके परिष्कार के लिए देवी से विवेक माँगना चाहिए।

कामाक्षी की उपासना में साधक केवल यह नहीं कहता कि भगवती उसकी ओर देखें। वह यह भी स्वीकार करता है कि देवी की दृष्टि उससे कभी पृथक् थी ही नहीं। उसकी प्रत्येक भावना, प्रार्थना और अन्तःकरण की गति भगवती के सर्वज्ञ साक्षित्व में ही प्रकाशित होती है।

भावसार

कामाक्षी नाम का प्रत्यक्ष अर्थ है, कमनीय नेत्रोंवाली भगवती। भास्करराय इसके साथ यह वैकल्पिक अर्थ भी देते हैं कि कामेश्वर स्वयं उनका नेत्र हैं। यह काञ्चीपीठ की अधिष्ठात्री श्रीललिताम्बिका का विशिष्ट नाम है। सर्वज्ञ और साक्षिरूपा भगवती सबके अन्तःकरण को जानती हैं तथा पात्रता के अनुरूप अनुग्रह करती हैं। उनके चरणों में साधक यही प्रार्थना करता है कि उसकी दृष्टि शुद्ध हो, उसकी कामनाएँ पवित्र हों और उसका अन्तःकरण कामेश्वरी तथा कामेश्वर की अभिन्न चैतन्यसत्ता में प्रतिष्ठित हो।

122.शाम्भवी - शाम्भव्यै नमः

प्रार्थना शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान...