प्रार्थना
सुधासागरमध्यस्था कामाक्षी कामदायिनी ॥ २३ ॥
श्रीललितासहस्रनाम का एकसठवाँ नाम सुधासागर-मध्यस्था भगवती के दिव्य अधिष्ठान का वर्णन करता है। पूर्ववर्ती नामों में चिन्तामणिगृह, महापद्माटवी और कदम्बवनरूपी श्रीपुर के अन्तरंग प्रदेशों का निर्देश हुआ है। प्रस्तुत नाम बताता है कि यह दिव्य श्रीपुर सुधासागर के मध्य स्थित है और श्रीललिताम्बिका उसके परम केन्द्र में विराजमान हैं।
इस नाम का प्रथम और प्रत्यक्ष अर्थ स्थानवाचक है। अतः इसकी व्याख्या केवल प्रतीकात्मक अथवा योगपरक अर्थ में सीमित नहीं करनी चाहिए। भास्करराय पहले भगवती के दिव्य निवास का निरूपण करते हैं और तत्पश्चात् उसी तत्त्व की पिण्डाण्ड तथा उपासना-दृष्टि से अन्तर्मुख व्याख्या भी प्रस्तुत करते हैं।
पदच्छेद और प्रत्यक्ष अर्थ
पदच्छेद: सुधा + सागर + मध्यस्था
समास-विग्रह: सुधायाः सागरः सुधासागरः, सुधासागरस्य मध्ये तिष्ठति या सा सुधासागरमध्यस्था।
यहाँ सुधा का अर्थ अमृत अथवा पीयूष, सागर का अर्थ समुद्र और मध्यस्था का अर्थ उसके मध्य में स्थित होना है। इस प्रकार नाम का सीधा अर्थ है, जो अमृत-सागर के मध्य विराजमान हैं।
अर्चना में इसका स्त्रीलिङ्ग चतुर्थी-रूप सुधासागरमध्यस्थायै होता है। अतः अर्चनामन्त्र है, ॐ सुधासागरमध्यस्थायै नमः।
भास्कररायीय अर्थ
भास्करराय के सौभाग्यभास्कर में श्रीनगर के दो रूपों का संकेत मिलता है। एक श्रीनगर मेरु से सम्बद्ध है और दूसरा समस्त ब्रह्माण्डों से परे सुधासागर के मध्य स्थित रत्नद्वीप अथवा मणिद्वीप में है। उसी मणिद्वीप में महापद्माटवी, कदम्बवन और चिन्तामणिगृहरूपी भगवती का दिव्य अधिष्ठान माना गया है।
प्रस्तुत नाम की व्याख्या करते हुए भास्करराय केवल एक बाह्य अथवा दिव्य सुधासागर का ग्रहण नहीं करते। वे इसके अनेक शास्त्रसम्मत स्तरों का निर्देश करते हैं।
प्रथमतः एक ऊर्ध्वस्थ सुधासागर है, जिसके मध्य भगवती का दिव्य नगर स्थित माना गया है। यह श्रीललिताम्बिका के पारमेश्वर्यपूर्ण, लोकातीत अधिष्ठान का द्योतक है।
द्वितीयतः पिण्डाण्ड में इसका स्थान सहस्रार-कमल की कर्णिका के भीतर, चन्द्रमण्डल के मध्य स्थित बिन्दु में बताया गया है। इस प्रकार बाह्य श्रीपुर और साधक के अन्तःस्थित चैतन्यकेन्द्र के मध्य अनुरूपता स्थापित होती है। यह अन्तर्मुख अर्थ प्रत्यक्ष स्थानवाचक अर्थ का निषेध नहीं करता, अपितु उसी दिव्य तत्त्व का साधनात्मक प्रतिबिम्ब है।
तृतीयतः भास्करराय ब्रह्मलोक-सम्बद्ध अपराजिता पुरी तथा छान्दोग्योपनिषद् में उल्लिखित अर और ण्य नामक अर्णवों की ओर भी संकेत करते हैं। उनकी व्याख्या का आशय यह है कि इस नाम में इन सभी सुधामय अधिष्ठानों का समाहार समझना चाहिए।
सौन्दर्यलहरी में समान निवास-वर्णन
सौन्दर्यलहरी के अष्टम श्लोक में सुधासिन्धु, मणिद्वीप, दिव्य-वृक्षवाटिका और चिन्तामणिगृह का जो क्रम मिलता है, वह इस नाम के प्रत्यक्ष अर्थ का सुन्दर शास्त्रीय समर्थन करता है।
हिन्दी अर्थ: अमृत-सिन्धु के मध्य, दिव्य वृक्षों की वाटिका से घिरे मणिद्वीप में, नीपवृक्षों के उपवन से युक्त चिन्तामणिगृह में भगवती का परम अधिष्ठान है।
यहाँ सुधासागर के मध्य मणिद्वीप, उसके भीतर दिव्य उपवन और तत्पश्चात् चिन्तामणिगृह का वर्णन है। यह क्रम सहस्रनाम के चिन्तामणिगृहान्तस्था, महापद्माटवीसंस्था, कदम्बवनवासिनी और सुधासागरमध्यस्था नामों में व्यक्त श्रीपुर-वर्णन के अनुरूप है।
श्रीविद्या में तात्त्विक संकेत
उपासना-दृष्टि से सुधा भगवती के अमृतमय चैतन्य और आनन्दस्वरूप अनुग्रह का संकेत करती है। सागर उसकी अपरिमितता और परिपूर्णता का बोध कराता है तथा मध्यस्था उस परम केन्द्र का निर्देश करती है, जहाँ से समस्त शक्तियों का प्रसरण होता है और जहाँ वे पुनः एकरस होती हैं।
भास्करराय द्वारा सहस्रार-कर्णिका के चन्द्रमण्डलस्थ बिन्दु का उल्लेख इस अन्तर्मुख उपासना-दृष्टि को आधार प्रदान करता है। साधक भगवती को केवल किसी दूरस्थ दिव्य लोक में ही नहीं, अपने अन्तःकरण के निर्मलतम चैतन्यकेन्द्र में भी अधिष्ठित मानकर उनका ध्यान करता है।
श्रीविद्या के रहस्यात्मक मन्त्र, बिन्दु और आन्तरिक उपासना-क्रम गुरु-परम्परा से ग्रहण किए जाने योग्य हैं। यहाँ इतना ही तात्त्विक संकेत पर्याप्त है कि बाह्य श्रीपुर और अन्तःस्थित चैतन्यपीठ एक ही पराशक्ति के दो उपासनात्मक आयाम हैं।
साधक के लिए संदेश
संसार के विषयों में प्रवृत्त चित्त प्रायः बाह्य आकर्षणों, राग-द्वेष और विविध चिन्ताओं से चञ्चल होता रहता है। सुधासागर-मध्यस्था नाम साधक को अपने चित्त को पुनः उस दिव्य केन्द्र की ओर उन्मुख करने की प्रेरणा देता है, जहाँ भगवती अमृतमय शान्ति और चैतन्य के रूप में विराजमान हैं।
इस नाम के जप में साधक श्रीललिताम्बिका से प्रार्थना करता है कि वे उसके अन्तःकरण के ताप को अपनी करुणारूपी सुधा से शान्त करें, चित्त को निर्मलता प्रदान करें और उसे भगवती के चरणों में स्थिर श्रद्धा तथा शरणागति से सम्पन्न करें।
सुधासागर-मध्यस्था वे श्रीललिताम्बिका हैं जो अमृत-सागर के मध्य स्थित दिव्य श्रीपुर में विराजमान हैं। भास्करराय की व्याख्या में यही सुधामय अधिष्ठान ऊर्ध्वस्थ दिव्य लोक, सहस्रार-कर्णिका के चन्द्रमण्डलस्थ बिन्दु तथा ब्रह्मलोक के सुधामय अर्णवों में विभिन्न स्तरों पर प्रकाशित होता है। इस नाम का स्मरण करते हुए साधक भगवती से प्रार्थना करता है कि उसका चित्त उनके अमृतमय चैतन्य, शान्ति और अनुग्रह की ओर निरन्तर उन्मुख रहे।