सोमवार, 13 जुलाई 2026

60.कदम्बवन-वासिनी - कदम्बवनवासिन्यै नमः

प्रार्थना

शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥

सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ॥

महापद्माटवीसंस्था कदम्बवनवासिनी
सुधासागरमध्यस्था कामाक्षी कामदायिनी ॥२३॥

श्रीललितासहस्रनाम के इस भाग में वाग्देवियाँ श्रीललिताम्बिका के दिव्य निवास का क्रमशः वर्णन करती हैं। भगवती चिन्तामणिगृह के अन्तर्भाग में विराजमान हैं, महापद्माटवी में स्थित हैं और कदम्बवृक्षों से सुशोभित वन में निवास करती हैं। इसी दिव्य निवास-वैभव को प्रकट करने वाला साठवाँ नाम है, कदम्बवन-वासिनी

इस नाम का प्रथम और मुख्य अर्थ किसी केवल रूपकात्मक अवस्था का निर्देश नहीं करता। यह भगवती के श्रीपुरस्थित दिव्य निवास का प्रत्यक्ष वर्णन है। अतः इसके तात्त्विक अर्थों पर विचार करने से पूर्व इसका सरल शाब्दिक अर्थ समझना आवश्यक है।

पदच्छेद, समास और प्रत्यक्ष अर्थ

पदच्छेद: कदम्ब-वन-वासिनी।

कदम्ब एक प्रसिद्ध पुष्पवृक्ष है। वन का अर्थ वृक्षसमूह से युक्त अरण्य अथवा उपवन है और वासिनी का अर्थ वहाँ निवास करने वाली है।

अतः कदम्बवन-वासिनी का प्रत्यक्ष अर्थ है, “कदम्बवृक्षों के वन में निवास करने वाली भगवती।”

समास की दृष्टि से “कदम्बानां वनम्” अर्थात् कदम्बों का वन और उस वन में वास करने वाली देवी, इस प्रकार यह अधिकरणार्थक तत्पुरुषसम्बद्ध पद है।

भास्कररायीय अर्थ

श्रीभास्करराय मखिन् इस नाम की व्याख्या अत्यन्त स्पष्ट शब्दों में करते हैं। कदम्ब को नीप का पर्याय मानते हुए वे बताते हैं कि भगवती कदम्बों के वन में निवास करती हैं। उनके विवेचन के अनुसार चिन्तामणिगृह के चारों ओर मणिमण्डप और उसके परिवेश में कदम्बवन स्थित है। इस प्रकार यह नाम श्रीपुर के अन्तरतम दिव्य प्रदेश की भौगोलिक तथा उपासनात्मक रचना का वर्णन करता है।

कदम्बानां नीपानां वने वसतीति तथा।
अर्थ: कदम्ब अथवा नीपवृक्षों के वन में निवास करने के कारण भगवती कदम्बवन-वासिनी कहलाती हैं।

यहाँ “नीप” और “कदम्ब” को पर्याय रूप में ग्रहण किया गया है। अतः कदम्बवन को किसी अन्य देवी का पृथक् निवास मानकर इस सहस्रनाम को श्रीललिताम्बिका से विच्छिन्न करना उचित नहीं है। प्रस्तुत नाम में सम्बोधन स्वयं श्रीललिताम्बिका का ही है।

सौन्दर्यलहरी में नीपोपवन

सौन्दर्यलहरी के आठवें श्लोक में भगवती के इसी दिव्य निवास का निकटवर्ती वर्णन प्राप्त होता है। वहाँ मणिद्वीप, चिन्तामणिगृह तथा नीपोपवनयुक्त प्रदेश का उल्लेख है।

सुधासिन्धोर्मध्ये सुरविटपिवाटीपरिवृते
मणिद्वीपे नीपोपवनवति चिन्तामणिगृहे ।
अर्थ: अमृतसमुद्र के मध्य, देववृक्षों की वाटिकाओं से घिरे हुए, नीप अर्थात् कदम्ब के उपवनों से युक्त मणिद्वीपस्थित चिन्तामणिगृह में भगवती विराजती हैं।

यह वर्णन सहस्रनाम के निकटवर्ती नामों, चिन्तामणिगृहान्तस्था, महापद्माटवीसंस्था, कदम्बवनवासिनी और सुधासागरमध्यस्था के परस्पर सम्बन्ध को स्पष्ट करता है। ये नाम किसी असम्बद्ध स्थानों की सूची नहीं हैं, अपितु श्रीपुर के दिव्य केन्द्र का क्रमबद्ध चित्र प्रस्तुत करते हैं।

श्रीललिता और मन्त्रिणी के प्रसंग का भेद

कदम्बवन का सम्बन्ध श्रीविद्या-परम्परा में श्रीमन्त्रिणी अथवा राजश्यामला की उपासना से भी प्रसिद्ध है। इस कारण कभी-कभी “कदम्बवनवासिनी” विशेषण सुनते ही राजश्यामला का स्मरण होता है। तथापि वर्तमान सहस्रनाम-पद्य में यह नाम श्रीललिताम्बिका के एक सहस्र नामों में ही पठित है। अतः यहाँ इसका प्रत्यक्ष वाच्य श्रीललिताम्बिका हैं।

श्रीमन्त्रिणी भगवती की मन्त्रशक्ति तथा राज्यव्यवस्था की अधिष्ठात्री अङ्गदेवता हैं। उनके साथ कदम्बवन का सम्बन्ध श्रीललिता के सार्वभौम श्रीपुर-वैभव का विरोध नहीं करता, अपितु उसी दिव्य शासन और उपासना-क्रम का एक अङ्ग माना जा सकता है। दोनों प्रसंगों को मिलाकर मूल सहस्रनाम का वाच्यार्थ परिवर्तित नहीं करना चाहिए।

श्रीविद्या में तात्त्विक संकेत

उपासना-दृष्टि से श्रीपुर केवल बाह्य दिव्य लोक का वर्णन नहीं है। श्रीविद्या-परम्परा स्थूल ब्रह्माण्ड और साधक के अन्तःकरण के मध्य अनुरूपता का भी चिन्तन करती है। इस दृष्टि से कदम्बवन को चैतन्य की बहुविध, सजीव और आनन्दमयी अभिव्यक्तियों से युक्त अन्तःप्रदेश का संकेत माना जा सकता है।

वन में अनेक वृक्ष होते हुए भी वे एक ही भूमि में स्थित रहते हैं। उसी प्रकार अन्तःकरण में अनेक विचार, भाव और वृत्तियाँ प्रकट होती हैं, परन्तु उनका आधार एक ही चेतना है। साधक जब उन सबके अधिष्ठानरूपी भगवती का स्मरण करता है, तब वह बाह्य विविधता के भीतर स्थित एक चैतन्यतत्त्व की ओर उन्मुख होता है।

यह साधनात्मक संकेत है, नाम का एकमात्र अथवा प्रत्यक्ष अर्थ नहीं। नाम का प्रधान अर्थ कदम्बवन में भगवती का निवास ही है।

साधक के लिए संदेश

“कदम्बवन-वासिनी” नाम का जप करते हुए साधक भगवती को श्रीपुर के सुशोभित कदम्बोपवन में विराजमान देख सकता है। इस ध्यान में वन की पवित्रता, पुष्पों की सुगन्ध, दिव्य शान्ति और भगवती की सर्वव्यापी सन्निधि का भाव प्रमुख रहता है।

साधक भगवती से प्रार्थना करता है कि उसका अन्तःकरण भी उपासना के योग्य पवित्र उपवन बने। उसमें अशुद्ध वृत्तियों का आधिपत्य न रहे, अपितु श्रद्धा, विनय, विवेक, भक्ति और शरणागतिरूपी सद्भाव विकसित हों।

कदम्बवन का ध्यान साधक को यह भी स्मरण कराता है कि भगवती केवल किसी दूरस्थ लोक में सीमित नहीं हैं। वृक्ष, पुष्प, सुगन्ध, जीवन और चेतना में व्यक्त होने वाला समस्त सौन्दर्य उन्हीं की शक्ति से प्रकाशित होता है। तथापि उपासक उस सौन्दर्य को स्वयं भगवती का स्थानापन्न न मानकर उनके अनन्त वैभव का संकेत समझता है।

भक्तिपरक सार

श्रीललिताम्बिका कदम्बवृक्षों से सुशोभित दिव्य वन में निवास करने के कारण कदम्बवन-वासिनी कहलाती हैं। यह वन चिन्तामणिगृह और श्रीपुर के अन्तरतम वैभव से सम्बद्ध है। इस नाम का स्मरण करते हुए साधक भगवती से प्रार्थना करता है कि वे उसके अन्तःकरणरूपी उपवन में विराजें और उसे श्रद्धा, शुद्ध भाव तथा चैतन्यमयी उपासना से सुशोभित करें।

122.शाम्भवी - शाम्भव्यै नमः

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