प्रार्थना
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ॥
श्रीललितासहस्रनाम में भगवती के चिन्तामणिमय भवन, पञ्चब्रह्ममय आसन और परम राजराजेश्वरी स्वरूप का वर्णन करने के पश्चात् उनके दिव्य निवास-परिसर का निरूपण किया गया है। इसी क्रम में उनसठवाँ नाम महापद्माटवी-संस्था आता है। इस नाम का प्रत्यक्ष अर्थ है कि श्रीललिताम्बिका महान् कमलों से व्याप्त दिव्य वन में सम्यक् रूप से विराजमान हैं।
यह नाम भगवती के बाह्य दिव्य अधिष्ठान और साधक के भीतर स्थित उनके सूक्ष्म अधिष्ठान, दोनों की ओर संकेत करता है। भास्करराय की व्याख्या में पहले श्रीपुरगत महापद्माटवी का वर्णन है और उसके पश्चात् ब्रह्मरन्ध्रस्थित सहस्रदल-पद्म को भी पद्माटवी कहा गया है। अतः सहस्रार-संबंधी अर्थ इस नाम का महत्त्वपूर्ण उपासना-पक्ष है, किन्तु वही इसका एकमात्र प्रत्यक्ष अर्थ नहीं है।
पदच्छेद, समास और प्रत्यक्ष अर्थ
नाम: महापद्माटवी-संस्था
पदच्छेद: महापद्माटव्यां संस्था।
शब्दार्थ: महापद्म अर्थात् अत्यन्त विशाल अथवा महान् कमल, अटवी अर्थात् वन और संस्था अर्थात् सम्यक् रूप से स्थित या विराजमान।
समस्तार्थ: महान् कमलों से व्याप्त वन में सम्यक् रूप से विराजमान भगवती।
भास्कररायीय अर्थ
श्रीभास्करराय मखिन् इस नाम की अत्यन्त सरल और प्रत्यक्ष व्याख्या करते हैं। जिस वन में महान् कमल विद्यमान हों, उस पद्माटवी में भगवती सम्यक् रूप से स्थित हैं।
भाष्यकार इस दिव्य पद्माटवी के समर्थन में रुद्रयामल और ललितास्तवरत्न का उल्लेख करते हैं। ललितास्तवरत्न में मणिमय भवन के समीप विस्तीर्ण कमलवन का काव्यमय वर्णन प्राप्त होता है। वहाँ ऊँचे कमलनालों, विकसित कमलों, केसर-समूहों, प्रवाहित मकरन्द, भ्रमर-समूह तथा सुगन्धमय वायु का निरूपण किया गया है। इससे महापद्माटवी केवल एक सामान्य उपवन नहीं, अपितु श्रीनगरी के परम रमणीय और दिव्य प्रदेश के रूप में प्रकट होती है।
यहाँ संस्था पद केवल अस्थायी उपस्थिति को नहीं, अपितु भगवती के स्थिर अधिष्ठान को सूचित करता है। वे उस पद्ममय दिव्य प्रदेश की अधिष्ठात्री, चेतना और परम शोभा हैं।
श्रीपुर और महापद्माटवी
पूर्ववर्ती नामों में भगवती को श्रीमन्नगर की नायिका, सुमेरु के मध्यशृङ्ग पर स्थित, चिन्तामणिगृह के भीतर विराजमान और पञ्चब्रह्ममय आसन पर अधिष्ठित कहा गया है। वर्तमान नाम उसी दिव्य निवास-वर्णन को आगे बढ़ाता है। महापद्माटवी श्रीपुर की अलौकिक शोभा का एक अंग है, जिसके मध्य भगवती का परम अधिष्ठान प्रकाशित होता है।
यहाँ कमल का भाव विशेष महत्त्व रखता है। कमल जल में उत्पन्न होकर भी जल से अलिप्त रहता है। वह प्रकाश की ओर विकसित होता है और अपनी सुगन्ध तथा सौन्दर्य से परिवेश को पवित्र करता है। श्रीविद्या-परम्परा में कमल चेतना के प्रस्फुटन, पवित्रता और दिव्य अधिष्ठान का स्वाभाविक प्रतीक है। महापद्मों की अटवी भगवती की अनन्त शक्ति, सौन्दर्य और चैतन्यमय विभूति का भाव प्रकट करती है।
ब्रह्माण्ड और पिण्डाण्ड का साम्य
भास्करराय बाह्य श्रीपुरगत पद्माटवी का वर्णन करने के पश्चात् एक सूक्ष्म अर्थ भी प्रस्तुत करते हैं। उनके अनुसार ब्रह्मरन्ध्र में स्थित सहस्रदल-पद्म को भी पद्माटवी कहा जाता है। वे स्वच्छन्दतन्त्र के आधार पर इसे महापद्मवन के रूप में ग्रहण करते हैं और इस अर्थ का आधार ब्रह्माण्ड तथा पिण्डाण्ड का ऐक्य बताते हैं।
इसका अभिप्राय यह है कि जो दिव्य श्रीनगरी व्यापक ब्रह्माण्ड में भगवती का अधिष्ठान है, उसका अनुरूप सूक्ष्म अधिष्ठान मनुष्य-देह में भी है। बाह्य महापद्माटवी और अन्तःस्थित सहस्रदल-पद्म परस्पर विरोधी अर्थ नहीं हैं। एक समष्टिगत दिव्य प्रदेश का निरूपण करता है और दूसरा उसी तत्त्व के व्यष्टिगत, साधनात्मक अनुभव की ओर संकेत करता है।
श्रीविद्या में तात्त्विक संकेत
उपासना-दृष्टि से महापद्माटवी साधक के निर्मल और प्रस्फुटित अन्तःकरण का संकेत देती है। जैसे असंख्य कमलों से युक्त वन सर्वत्र सुगन्ध और सौन्दर्य से परिपूर्ण रहता है, वैसे ही भगवती के अनुग्रह से शुद्ध हुआ अन्तःकरण सद्भाव, विवेक, भक्ति और चैतन्य से प्रकाशित होता है।
सहस्रदल-पद्म का संबंध योगपरम्परा में ब्रह्मरन्ध्रगत सर्वोच्च सूक्ष्म केन्द्र से माना गया है। भास्करराय द्वारा इस पद्म को महापद्माटवी कहना यह दर्शाता है कि भगवती का निवास किसी जड़ प्रदेश में नहीं, अपितु चेतना के परम प्रस्फुटन में है। फिर भी यह विषय गुरु-उपदिष्ट साधना से संबंधित है। अतः इसके रहस्यात्मक पक्ष को केवल सामान्य बौद्धिक कल्पना या स्वेच्छाचारी साधना का विषय नहीं बनाना चाहिए।
महापद्माटवी का भाव यह भी स्मरण कराता है कि परमेश्वरी किसी एक सीमित रूप या स्थान में बद्ध नहीं हैं। वे श्रीपुर के दिव्य कमलवन में अधिष्ठित हैं, ब्रह्मरन्ध्रगत सहस्रदल में प्रकाशमान हैं और प्रत्येक शुद्ध भाव में चैतन्यरूप से उपस्थित हैं।
साधक के लिए संदेश
इस नाम के जप में साधक भगवती से प्रार्थना करता है कि उसका अन्तःकरण भी उनके निवास के योग्य कमलवन के समान निर्मल, सुगन्धित और प्रस्फुटित बने। कामना, क्रोध, दम्भ और अविवेकरूपी मलिनताएँ क्षीण हों तथा हृदय में श्रद्धा, शरणागति और भगवद्भाव का विकास हो।
कमल की अलिप्तता साधक को संसार से पलायन नहीं, अपितु संसार में रहते हुए भी उसके मल से असंस्पृष्ट रहने की प्रेरणा देती है। कमल का प्रकाश की ओर खुलना इस भाव का प्रतीक है कि साधक की वृत्तियाँ विषयों की ओर बिखरने के स्थान पर भगवती के चैतन्य की ओर उन्मुख हों।
इस प्रकार महापद्माटवी-संस्था नाम भगवती के दिव्य निवास का साक्षात् वर्णन करते हुए साधक को अन्तर्मुखता की ओर भी प्रेरित करता है। बाह्य श्रीपुर का ध्यान अन्तःस्थित दिव्य अधिष्ठान के स्मरण से पूर्ण होता है और अन्तःकरण का प्रस्फुटन श्रीललिताम्बिका की कृपा पर आश्रित माना जाता है।