गुरुवार, 2 जुलाई 2026

49.सर्वारुणा - सर्वारुणायै नमः

प्रार्थना

शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥

सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ॥

सर्वारुणाऽनवद्याङ्गी सर्वाभरणभूषिता ।
शिवकामेश्वराङ्कस्था शिवा स्वाधीनवल्लभा ॥ २१॥

श्रीललिता सहस्रनाम में भगवती के दिव्य विग्रह की क्रमिक वन्दना करते हुए अब वाग्देवियाँ उनके सम्पूर्ण स्वरूप की अरुण प्रभा का वर्णन करती हैं। उनचासवाँ नाम है सर्वारुणा। इससे पहले नामों में श्रीललिताम्बिका के अंगों की शोभा, लावण्य और चरण-माधुर्य का गान हुआ। अब यह नाम बताता है कि भगवती का स्वरूप सर्वथा अरुण है। यह अरुणता केवल किसी एक अंग की नहीं, अपितु सम्पूर्ण दिव्य विग्रह की आभा का सूचक है।

पदच्छेद, अर्चना-मन्त्र और प्रत्यक्ष अर्थ

पदच्छेद: सर्वारुणा = सर्व + अरुणा। इसका व्याकरणिक आशय है, सर्वम् अरुणं यस्याः सा सर्वारुणा, अर्थात् जिनका सम्पूर्ण स्वरूप अरुण-वर्ण से दीप्त है, वे सर्वारुणा हैं।

अर्चना-मन्त्र: ॐ सर्वारुणायै नमः।

प्रत्यक्ष अर्थ: जो सर्वथा अरुण-वर्णा हैं, वे सर्वारुणा हैं। यहाँ अरुण शब्द प्रातःकालीन सूर्य की कोमल लालिमा, सिन्दूर-कान्ति और रक्त-पद्मवत् प्रभा का बोध कराता है। श्रीललिताम्बिका का यह रूप सौम्य भी है और तेजोमय भी। इसमें करुणा, सौन्दर्य, चेतना और शक्ति का संयुक्त भाव प्रकट होता है।

भास्कररायीय अर्थ

सौभाग्य-भास्कर में भास्करराय इस नाम को मुख्यतः भगवती की अरुण-कान्ति के आधार पर ग्रहण करते हैं। सर्वारुणा का भाव यह है कि देवी सर्वाङ्ग से अरुण हैं। यह अरुणता उनके स्वरूप की स्वाभाविक प्रभा है, किसी बाह्य अलङ्कार से आरोपित रंग नहीं। भगवती स्वयं प्रकाशस्वरूपिणी हैं, अतः उनकी कान्ति भी स्वतः सिद्ध है।

इस अर्थ में सर्व शब्द केवल स्थूल अंगों तक सीमित नहीं है। उपासना-दृष्टि से भगवती के अंग, वस्त्र, अलङ्कार, चरण, नयन और सम्पूर्ण प्रभामण्डल अरुण भाव से संयुक्त माने जाते हैं। इसलिए ध्यानश्लोक में भी देवी का ध्यान सिन्दूरारुणविग्रहा के रूप में किया जाता है। यह नाम उस ध्यान-वर्णन का सहस्रनामात्मक संक्षेप है।

ध्यानश्लोक में अरुण-विग्रह

सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।

भावार्थ: परमाम्बिका का विग्रह सिन्दूर के समान अरुण है। वे त्रिनयना हैं, माणिक्यमय मुकुट से शोभित हैं, चन्द्रशेखरा हैं और मन्दस्मित से युक्त सौम्य स्वरूपिणी हैं।

यह ध्यान-वचन सर्वारुणा नाम के प्रत्यक्ष अर्थ को दृढ़ करता है। यहाँ अरुण-वर्ण को केवल देह-वर्णन के रूप में नहीं, अपितु परमाम्बा की करुणा और चेतन-प्रभा के रूप में भी अनुभव किया जाता है। भगवती का यह रंग रक्त-पद्म, सिन्दूर और उषःकाल की अरुणिमा का स्मरण कराता है।

सौन्दर्यलहरी का तात्त्विक संकेत

सौन्दर्यलहरी में भी भगवती की अरुणता को करुणा के साथ जोड़ा गया है। यह श्लोक प्रत्यक्षतः इसी सहस्रनाम की व्याख्या नहीं है, परन्तु अरुणा शब्द के आध्यात्मिक सौन्दर्य को समझने में सहायक तात्त्विक संकेत अवश्य देता है।

भृशं तन्वी मध्ये पृथुरुरसिजारोहविषये
जगत्त्रातुं शम्भोर्जयति करुणा काचिदरुणा ॥ ९३॥

भावार्थ: जगत् की रक्षा के लिए शम्भु की कोई अनिर्वचनीय अरुण करुणा विजयिनी होती है। यहाँ अरुणा देवी की करुणामयी शक्ति का काव्यमय संकेत है।

इस दृष्टि से सर्वारुणा नाम में अरुणता केवल वर्ण-सौन्दर्य नहीं रह जाती। वह करुणा की दीप्ति, चैतन्य की उषा और शक्ति की सृजनात्मक स्पन्दना का भी सूचक बनती है। फिर भी मुख्य अर्थ वही है जो नाम के पदच्छेद से प्रकट होता है, अर्थात् देवी का सर्वथा अरुण-वर्ण स्वरूप।

पूर्वनाम से सम्बन्ध

इस नाम से ठीक पहले भगवती को महालावण्यशेवधिः कहा गया है। वहाँ वे महान् लावण्य की निधि हैं। उसके बाद सर्वारुणा नाम उनके उस लावण्य की वर्ण-कान्ति को प्रकट करता है। लावण्य और अरुणता का यह सम्बन्ध अत्यन्त सुंदर है। लावण्य में माधुर्य है और अरुणता में प्रकाश। इस प्रकार श्रीललिताम्बिका माधुर्य और तेज, दोनों की पूर्ण अधिष्ठात्री हैं।

अगले नाम अनवद्याङ्गी में उनके अंगों की निष्कलङ्कता कही जाएगी, और सर्वाभरणभूषिता में उनके समस्त दिव्याभरणों का उल्लेख होगा। इस क्रम में सर्वारुणा नाम उनके सम्पूर्ण विग्रह को एक अरुण प्रभामय एकता में देखता है।

श्रीविद्या में तात्त्विक संकेत

श्रीविद्या-परम्परा में अरुण वर्ण का सम्बन्ध शक्ति-तत्त्व, करुणा, सौन्दर्य और सृजनात्मक चैतन्य से माना जाता है। यहाँ रहस्य-मन्त्र अथवा बीज-विचार के गूढ़ पक्षों को प्रकट करना उचित नहीं है, पर सामान्य उपासना-दृष्टि से इतना कहा जा सकता है कि अरुणिमा भगवती के जाग्रत् चैतन्य और करुणामय अनुग्रह की सूचक है।

शैव-शाक्त तत्त्वदृष्टि में शिव प्रकाशरूप हैं और शक्ति विमर्शरूपिणी हैं। शक्ति के बिना प्रकाश में सृष्टि की अभिव्यक्ति नहीं होती। सर्वारुणा नाम में भगवती की वही स्फुरणमयी शक्ति रूपायित होती है। यह अरुणिमा सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोधान और अनुग्रह इन पञ्चकृत्यों में प्रवहमान देवी-चैतन्य का सौन्दर्यमय संकेत है।

साधक के लिए संदेश

सर्वारुणा नाम का जप करते हुए साधक भगवती से प्रार्थना करता है कि उसके अन्तःकरण में भी ऐसी पवित्र अरुणिमा प्रकट हो, जिसमें करुणा, श्रद्धा, सौम्यता और चैतन्य का उदय हो। जैसे उषा का अरुण प्रकाश रात्रि के अन्धकार को धीरे-धीरे दूर करता है, वैसे ही भगवती की करुणा साधक के अन्तःकरण से मलिनता, जड़ता और अहंकाररूपी अन्धकार को शान्त करे।

इस नाम का ध्यान साधक को यह स्मरण कराता है कि श्रीललिताम्बिका का सौन्दर्य केवल दृश्य-माधुर्य नहीं है। वह चैतन्यमयी करुणा का सौन्दर्य है। उनके अरुण स्वरूप में भक्त सौम्यता, तेज, प्रेम और शरणागति का एक साथ अनुभव करता है।

सार: सर्वारुणा नाम श्रीललिताम्बिका के सर्वथा अरुण-वर्ण स्वरूप का द्योतक है। भास्कररायीय अर्थ में यह देवी की स्वाभाविक अरुण-कान्ति का नाम है। उपासना-दृष्टि से वही अरुणिमा करुणा, चैतन्य, सौन्दर्य और शक्ति की प्रकाशमयी अभिव्यक्ति है। इस नाम के स्मरण में साधक भगवती से प्रार्थना करता है कि वे उसके अन्तःकरण में श्रद्धा, सौम्यता और करुणामय प्रकाश का उदय करें।

122.शाम्भवी - शाम्भव्यै नमः

प्रार्थना शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान...