शनिवार, 4 जुलाई 2026

51.सर्वाभरण-भूषिता - सर्वाभरणभूषितायै नमः

प्रार्थना

शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥

सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ॥

श्रीललिता सहस्रनाम में नाम
सर्वारुणाऽनवद्याङ्गी सर्वाभरणभूषिता
शिवकामेश्वराङ्कस्था शिवा स्वाधीनवल्लभा ॥२१॥

श्रीललिता सहस्रनाम में पचासवें नाम अनवद्याङ्गी से भगवती के निर्दोष अङ्ग-सौन्दर्य का निर्देश हुआ। उसी क्रम में इक्यावनवाँ नाम सर्वाभरण-भूषिता आता है। यहाँ वाग्देवियाँ श्रीललिताम्बिका के उस दिव्य राजराजेश्वरी-स्वरूप का स्तवन करती हैं, जो समस्त आभरणों से सुशोभित है। यह नाम पहले-पहल भगवती के मूर्त, ध्यानयोग्य और सौम्य अलंकृत स्वरूप को प्रकट करता है। इसके बाद ही उपासना-दृष्टि से इसमें देवी के पूर्ण ऐश्वर्य, माधुर्य और कल्याणगुणों का संकेत देखा जाता है।

पदच्छेद और प्रत्यक्ष अर्थ

इस नाम का पदच्छेद है: सर्व-आभरण-भूषिता। यहाँ सर्व का अर्थ है समस्त, आभरण का अर्थ है अलंकार अथवा भूषण, और भूषिता का अर्थ है सुशोभित अथवा अलंकृत। अतः प्रत्यक्ष अर्थ हुआ: जो भगवती समस्त आभरणों से सुशोभित हैं

व्याकरण-दृष्टि से इसे सर्वैः आभरणैः भूषिता इस प्रकार समझना उचित है, अर्थात् वे देवी जिनका स्वरूप सब प्रकार के दिव्य आभरणों से शोभित है। अर्चना में इसका मन्त्ररूप है:

ॐ सर्वाभरणभूषितायै नमः ॥

भास्कररायीय अर्थ

भास्करराय मखीन की सौभाग्य-भास्कर व्याख्या में इस नाम का मूल आशय सीधा और स्पष्ट है। भगवती श्रीललिता समस्त आभरणों से भूषित हैं। इस प्रकार यह नाम देवी के शृङ्गारमय राजराजेश्वरी-स्वरूप का निर्देश करता है। पिछले नाम में जिन अनवद्य अङ्गों का वर्णन हुआ, वे अङ्ग अब दिव्य आभरणों से युक्त होकर उपासक के ध्यान में पूर्ण माधुर्य और ऐश्वर्य के साथ प्रतिष्ठित होते हैं।

यहाँ आभरण केवल बाह्य शोभा के लिए नहीं हैं। श्रीविद्या-परम्परा में देवी का अलंकार उनकी पूर्णता, प्रभुता और करुणामयी सौन्दर्य-प्रकाशना का अंग है। आभरण देवी को सुन्दर नहीं बनाते, परन्तू देवी की चैतन्यमयी प्रभा से ही वे आभरण शोभा पाते हैं। इसी कारण इस नाम में भगवती की स्वाभाविक शोभा और अलंकारजन्य माधुर्य दोनों का संगम है।

ललितोपाख्यान में स्वरूप-संगति

ब्रह्माण्डपुराणस्थ ललितोपाख्यान में श्रीललिताम्बिका के प्रादुर्भाव और राजराजेश्वरी-स्वरूप का वर्णन अत्यन्त ऐश्वर्यमय है। सहस्रनाम की इसी पंक्ति में सर्वारुणा, अनवद्याङ्गी और सर्वाभरणभूषिता ये तीनों नाम साथ-साथ आते हैं। इससे ध्यान में यह क्रम बनता है कि भगवती का वर्ण अरुण है, उनके अङ्ग निर्दोष हैं और वे समस्त आभरणों से अलंकृत हैं।

इसलिए इस नाम को केवल किसी एक आभरण के वर्णन तक सीमित नहीं करना चाहिए। यह भगवती के सम्पूर्ण अलंकृत विग्रह का नाम है। किरीट, कर्णाभरण, हार, केयूर, कङ्कण, काञ्ची, नूपुर आदि समस्त भूषण उनके राजराजेश्वरी भाव को प्रकाशित करते हैं। यह सूची केवल ध्यान-सहायिका के रूप में समझनी चाहिए, न कि इस नाम की किसी सीमित परिभाषा के रूप में।

सौन्दर्यलहरी का सावधान संकेत

सौन्दर्यलहरी में भगवती के किरीट, काञ्ची, चरण, नूपुर और अन्य अलंकारों का अनेक स्थानों पर काव्यमय स्तवन मिलता है। इन वर्णनों को इस नाम की प्रत्यक्ष व्याख्या नहीं कहना चाहिए, पर वे यह अवश्य दिखाते हैं कि देवी का अलंकृत स्वरूप भक्त-हृदय में सौन्दर्य, माधुर्य और ऐश्वर्य का दिव्य संगम प्रकट करता है।

इस दृष्टि से सौन्दर्यलहरी की अलंकार-स्तुतियाँ सर्वाभरणभूषिता नाम की भावभूमि को पुष्ट करती हैं। भगवती का प्रत्येक भूषण उनकी करुणा, प्रभुता और चैतन्यमयी कान्ति से दीप्त है। अतः उपासक इन आभरणों को केवल रत्न और सुवर्णरूपी पदार्थ न मानकर, देवी की अनन्त विभूतियों की झलक के रूप में देखता है।

श्रीविद्या में तात्त्विक संकेत

श्रीविद्या की उपासना-दृष्टि से भगवती स्वयं चिदानन्दरूपा पराशक्ति हैं। उनमें जो ऐश्वर्य, ज्ञान, करुणा, माधुर्य, शासन-शक्ति और अनुग्रह-शक्ति प्रकट होती है, वे सब उनके भूषणों के समान समझी जा सकती हैं। यह प्रतीकात्मक अर्थ है, प्रत्यक्ष पदार्थ नहीं। प्रत्यक्ष अर्थ तो यही है कि श्रीललिताम्बिका समस्त आभरणों से सुशोभित हैं।

साधनात्मक अर्थ में आभरण शुद्ध अन्तःकरण के गुणों का भी संकेत देते हैं। श्रद्धा, शरणागति, विनय, भक्ति, संयम और भगवती के चरणों में स्थिर प्रेम, ये साधक के अन्तःकरण के भूषण हैं। जब साधक भगवती को सर्वाभरणभूषिता के रूप में स्मरण करता है, तब वह अपने भीतर भी ऐसे ही सात्त्विक और देवपूज्य गुणों की याचना करता है।

साधक के लिए संदेश

सर्वाभरणभूषिता नाम साधक को यह स्मरण कराता है कि भगवती का सौन्दर्य केवल रूपमाधुर्य नहीं है। वह सौन्दर्य धर्म, ज्ञान, करुणा और अनुग्रह से युक्त पूर्णता है। बाह्य आभरण देवी के परम ऐश्वर्य का संकेत करते हैं, और आन्तरिक दृष्टि में वे उनके अनन्त कल्याणगुणों के प्रतीक बन जाते हैं।

इस नाम के जप में साधक भगवती से प्रार्थना करता है कि उसका अन्तःकरण भी श्रद्धा, विनय और भक्ति से सुशोभित हो। जैसे देवी समस्त दिव्य आभरणों से भूषित हैं, वैसे ही साधक का जीवन भी सद्गुण, सत्स्मृति और श्रीचरणों में स्थिर प्रेम से अलंकृत हो। यही इस नाम का कोमल, भक्तिपूर्ण और साधनात्मक संदेश है।

समापन भाव:
सर्वाभरणभूषिता श्रीललिताम्बिका समस्त आभरणों से सुशोभित राजराजेश्वरी हैं। उनके आभरण उनकी चैतन्यमयी प्रभा, परम ऐश्वर्य और करुणामय सौन्दर्य के प्रकाशक हैं। इस नाम का स्मरण करते हुए साधक भगवती से प्रार्थना करता है कि उसके अन्तःकरण में भी भक्ति, विनय, श्रद्धा और शरणागति रूपी दिव्य भूषण विकसित हों, और उसका जीवन श्रीमाता के चरणारविन्दों की सेवा में सुशोभित हो।

123.शारदाराध्या - शारदाराध्यायै नमः

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