शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

50.अनवद्याङ्गी - अनवद्याङ्ग्यै नमः

प्रार्थना

शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥

सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ॥

सर्वारुणाऽनवद्याङ्गी सर्वाभरणभूषिता ।
शिवकामेश्वराङ्कस्था शिवा स्वाधीनवल्लभा ॥ २१॥

श्रीललिता सहस्रनाम में पिछले नाम सर्वारुणा द्वारा भगवती के सम्पूर्ण अरुण-वर्ण स्वरूप का वर्णन हुआ। अब वाग्देवियाँ उसी दिव्य विग्रह की निष्कलङ्क पूर्णता को प्रणाम करती हैं। पचासवाँ नाम है अनवद्याङ्गी। यह नाम बताता है कि श्रीललिताम्बिका के अंगों में किसी प्रकार का अवद्य, अर्थात् निन्दनीय दोष, न्यूनता या असन्तुलन नहीं है। उनका प्रत्येक अंग मंगलमय, सौन्दर्यमय और दिव्य लक्षणों से सम्पन्न है।

पदच्छेद, अर्चना-मन्त्र और प्रत्यक्ष अर्थ

पदच्छेद: अनवद्याङ्गी = अनवद्य + अङ्गी। इसका व्याकरणिक भाव है, अनवद्यानि अङ्गानि यस्याः सा अनवद्याङ्गी, अर्थात् जिनके अंग अनवद्य हैं, वे अनवद्याङ्गी हैं।

अर्चना-मन्त्र: ॐ अनवद्याङ्ग्यै नमः।

प्रत्यक्ष अर्थ: जिनके अंग दोषरहित, निन्दारहित, सुशोभित और पूर्ण हैं, वे अनवद्याङ्गी हैं। यहाँ अनवद्य शब्द केवल बाह्य सुन्दरता का सूचक नहीं है। यह दोषाभाव, शुभलक्षण, अनुपम माधुर्य और दिव्य समन्वय का द्योतक है। भगवती के अंग किसी लौकिक शरीर की भाँति विकारग्रस्त नहीं, अपितु चैतन्यमयी शक्ति के दिव्य प्रकाश से प्रकाशित हैं।

भास्कररायीय अर्थ

सौभाग्य-भास्कर में भास्करराय इस नाम का अर्थ भगवती के अंगों में अवद्य, अर्थात् निन्दनीय दोष, के सर्वथा अभाव के रूप में ग्रहण करते हैं। देवी के अंग न तो किसी न्यूनता से युक्त हैं, न किसी विषमता से, न किसी अशुभ लक्षण से। इसलिए वे अनवद्याङ्गी हैं।

इस अर्थ में अङ्गी शब्द देवी के अंगों से युक्त दिव्य-विग्रह का बोध कराता है। श्रीललिताम्बिका का यह विग्रह साधारण देहबुद्धि का विषय नहीं है। वह उपासना में चिन्मयी, शक्तिमयी और आनन्दमयी देवता-विग्रह के रूप में ध्यातव्य है। अतः अनवद्याङ्गी नाम उनकी दिव्य पूर्णता और मंगलमयी शोभा का नाम है।

सहस्रनाम-क्रम में स्थान

इस नाम का स्थान अत्यन्त सुचिन्तित है। सर्वारुणा नाम में देवी की सर्वव्यापी अरुण-कान्ति कही गई। उसके पश्चात् अनवद्याङ्गी नाम बताता है कि उस अरुण-कान्ति से प्रकाशित प्रत्येक अंग निर्दोष और मंगलमय है। फिर अगले नाम सर्वाभरणभूषिता में उन्हीं दिव्य अंगों पर शोभित समस्त आभरणों का वर्णन आएगा।

इस प्रकार सहस्रनाम का क्रम केवल वर्णन-क्रम नहीं है, अपितु ध्यान-क्रम भी है। पहले देवी का अरुण प्रकाश, फिर उनके दोषरहित अंग, और फिर उन पर सुशोभित आभरण। इससे साधक का ध्यान धीरे-धीरे श्रीललिताम्बिका के सौन्दर्यमय, चैतन्यमय और कल्याणमय विग्रह में स्थिर होता है।

सौन्दर्यलहरी का सहायक संकेत

सौन्दर्यलहरी में भगवती के सौन्दर्य की अनुपमता बार-बार व्यक्त हुई है। निम्न पंक्ति इस नाम की प्रत्यक्ष व्याख्या नहीं है, परन्तु देवी-सौन्दर्य की अतुलनीयता को समझने में सहायक संकेत देती है।

त्वदीयं सौन्दर्यं तुहिनगिरिकन्ये तुलयितुं
कवीन्द्राः कल्पन्ते कथमपि विरिञ्चिप्रभृतयः ॥ १२॥

भावार्थ: हे हिमगिरिकन्ये, आपके सौन्दर्य की तुलना करने के लिए ब्रह्मा आदि श्रेष्ठ कवि भी किसी प्रकार समर्थ नहीं हो पाते।

इस श्लोक का भाव अनवद्याङ्गी नाम से स्वाभाविक रूप से जुड़ता है। जहाँ कोई उपमा पर्याप्त नहीं होती, वहाँ दोष की कल्पना भी नहीं रह जाती। भगवती का सौन्दर्य केवल अंग-सौष्ठव का विषय नहीं, अपितु अनिर्वचनीय दिव्य माधुर्य का अनुभव है।

ध्यान में निष्कलङ्क विग्रह

ध्यानश्लोक में देवी को सिन्दूरारुणविग्रहा, त्रिनयना, माणिक्यमौली से शोभित, स्मितमुखी और सौम्या कहा गया है। यह ध्यान-वर्णन भी उनके अंगों और सम्पूर्ण विग्रह की दिव्यता का बोध कराता है। अनवद्याङ्गी नाम इसी ध्यान-विषय को एक संक्षिप्त नामरूप में प्रस्तुत करता है।

सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।

भावार्थ: परमाम्बिका का विग्रह सिन्दूर के समान अरुण है। वे त्रिनयना हैं, माणिक्यमय मुकुट से शोभित हैं, चन्द्रशेखरा हैं और मन्दस्मित से युक्त सौम्य स्वरूपिणी हैं।

यहाँ देवी के विग्रह का प्रत्येक अंग सौम्यता और प्रभा से युक्त है। अतः अनवद्याङ्गी का अर्थ केवल “सुन्दर अंगोंवाली” इतना ही नहीं, बल्कि “दोषरहित, शुभलक्षणसम्पन्न और चैतन्य-दीप्त अंगोंवाली” है।

श्रीविद्या में तात्त्विक संकेत

श्रीविद्या में भगवती का विग्रह केवल रूप-सौन्दर्य की वस्तु नहीं है। वह चिदानन्दमयी शक्ति का ध्यानस्वरूप है। अतः उनके अंगों की अनवद्यत्व-पूर्णता साधक को यह संकेत देती है कि परमशक्ति में कोई आन्तरिक विरोध, विकार या अपूर्णता नहीं है। वे समन्वय, माधुर्य, करुणा और चैतन्य की पूर्ण अधिष्ठात्री हैं।

उपासना-दृष्टि से देवी के अंगों का ध्यान साधक के अन्तःकरण को भी क्रमशः संयत, सौम्य और शुद्ध करता है। जिस प्रकार उपास्य-विग्रह में दोष की कल्पना नहीं की जाती, वैसे ही साधक अपने भीतर की दोष-दृष्टि को शरणागति और श्रद्धा में रूपान्तरित करने की प्रार्थना करता है। यहाँ रहस्य-मन्त्र अथवा बीज-विचार के गूढ़ पक्षों में प्रवेश किए बिना इतना ही समझना पर्याप्त है कि भगवती का अनवद्य-विग्रह श्रीविद्या की मंगलमयी पूर्णता का प्रतीक है।

साधक के लिए संदेश

अनवद्याङ्गी नाम का जप करते हुए साधक भगवती से प्रार्थना करता है कि उसकी दृष्टि दोष-दर्शन से हटकर मंगल-दर्शन में स्थिर हो। संसार में राग, द्वेष, अहंकार और असन्तोष के कारण मन अनेक दोष देखता है। भगवती के अनवद्य स्वरूप का स्मरण साधक को सिखाता है कि शुद्ध दृष्टि में सौन्दर्य और करुणा का अनुभव अधिक गहरा होता है।

इस नाम में साधक अपने अन्तःकरण की विषमता, अशुद्धि और असन्तुलन को भगवती के चरणों में अर्पित करता है। वह प्रार्थना करता है कि श्रीललिताम्बिका की कृपा से उसके विचार, वचन और कर्म भी क्रमशः शुद्ध, सन्तुलित और कल्याणमय बनें।

सार: अनवद्याङ्गी नाम का प्रत्यक्ष अर्थ है, जिनके अंग अनवद्य अर्थात् दोषरहित और निन्दारहित हैं। भास्कररायीय अर्थ में यह श्रीललिताम्बिका के दिव्य-विग्रह की निष्कलङ्क पूर्णता का नाम है। उपासना-दृष्टि से यह नाम साधक को स्मरण कराता है कि भगवती की करुणा में सौन्दर्य, शुद्धता और चैतन्य का पूर्ण समन्वय है। इस नाम के जप में साधक उनसे प्रार्थना करता है कि उसकी दृष्टि, भावना और अन्तःकरण भी शुद्ध और मंगलमय हों।

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168.निष्क्रोधा - निष्क्रोधायै नमः

प्रार्थना शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान...