प्रार्थना
शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ॥
सर्वारुणाऽनवद्याङ्गी सर्वाभरणभूषिता ।
शिवकामेश्वराङ्कस्था शिवा स्वाधीनवल्लभा ॥२१॥
श्रीललिता सहस्रनाम में इक्यावनवें नाम सर्वाभरणभूषिता द्वारा भगवती के दिव्य अलंकारों का स्मरण करने के पश्चात् वाग्देवियाँ उनके परम ऐश्वर्यमय आसन और शिव-कामेश्वर से उनके अविभाज्य सम्बन्ध का निर्देश करती हैं। बावनवाँ नाम है शिवकामेश्वराङ्कस्था। यह नाम पहले-पहल एक अत्यन्त स्पष्ट दिव्य दृश्य बताता है कि श्रीललिताम्बिका शिव-कामेश्वर के अङ्क में विराजमान हैं। इसी प्रत्यक्ष अर्थ में श्रीविद्या का गूढ़ तत्त्व भी संकेतित है।
पदच्छेद और प्रत्यक्ष अर्थ
इस नाम का पदच्छेद है: शिव-कामेश्वर-अङ्क-स्था।
शिव यहाँ मंगलस्वरूप, शुद्धचैतन्यमय परमेश्वर का बोधक है। कामेश्वर श्रीविद्या-परम्परा में परमशिव के उस दिव्य रूप का नाम है जो भगवती श्रीललिता के सहचर के रूप में प्रतिष्ठित हैं। अङ्क का अर्थ है गोद, उत्सङ्ग या समीपस्थ आसन। स्था का अर्थ है स्थित होने वाली। अतः शिवकामेश्वराङ्कस्था का प्रत्यक्ष अर्थ हुआ: वे भगवती जो शिव-कामेश्वर के अङ्क में स्थित हैं।
अर्चना-मन्त्र का रूप है: ॐ शिवकामेश्वराङ्कस्थायै नमः। यहाँ “स्थायै” दत्तिविभक्ति, स्त्रीलिङ्ग, एकवचन का रूप है, जो “उन देवी को नमस्कार” इस अर्थ को व्यक्त करता है।
कुछ उपासना-चित्रों और ध्यान-परम्पराओं में भगवती को कामेश्वर के वामाङ्क में विराजमान दिखाया जाता है। यह उपासना और मूर्तिरचना की दृष्टि से ग्राह्य है, परन्तु इस नाम के प्रत्यक्ष पद में “अङ्क” शब्द है, अतः उसका प्रथम अर्थ केवल “अङ्क में स्थित” ही माना जाना चाहिए।
भास्कररायीय अर्थ
भास्करराय के सौभाग्य-भास्कर में इस नाम की व्याख्या अत्यन्त सरल और गम्भीर भाव से समझी जाती है। शिवकामेश्वर अर्थात् शिवरूपी कामेश्वर, और अङ्कस्था अर्थात् उनके अङ्क में स्थित भगवती। यहाँ देवी का आसन केवल अलंकारिक सौन्दर्य का प्रसंग नहीं है। यह शिव और शक्ति के अभिन्न सामरस्य का सूचक है।
श्रीविद्या में शिव निरुपाधिक प्रकाशस्वरूप चैतन्य के रूप में माने जाते हैं और शक्ति उस चैतन्य की स्वाभाविक विमर्शशक्ति हैं। प्रकाश और विमर्श में वस्तुतः भेद नहीं है, तथापि उपासना की करुणामयी पद्धति में वही अद्वैत तत्त्व शिव और श्रीललिताम्बिका के रूप में भक्त के लिए सुगम बनता है। इस नाम में भगवती का कामेश्वर के अङ्क में विराजना उसी अभिन्नता का सौम्य, माधुर्यमय और राजराजेश्वरी-स्वरूप संकेत है।
इस नाम के तुरन्त बाद सहस्रनाम में शिवा और स्वाधीनवल्लभा नाम आते हैं। इससे यह क्रम और भी स्पष्ट होता है कि वाग्देवियाँ पहले भगवती के शिव-कामेश्वर-संबद्ध आसन का वर्णन करती हैं, फिर उनके शिवस्वरूप और उनके परम ऐश्वर्य का गान करती हैं। अतः यहाँ भगवती को शिव से पृथक् किसी अधीन सत्ता के रूप में नहीं, अपितु शिव के ही चैतन्यमय सामरस्य में प्रतिष्ठित पराशक्ति के रूप में समझना चाहिए।
सौन्दर्यलहरी से तात्त्विक समर्थन
इस नाम का प्रत्यक्ष आधार सहस्रनाम और भास्कररायीय व्याख्या ही है। फिर भी शिव और शक्ति की अविभाज्यता को समझाने के लिए सौन्दर्यलहरी का प्रथम श्लोक अत्यन्त प्रसिद्ध और उपयुक्त तात्त्विक संकेत देता है:
शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं
न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि ।
अर्थ: शिव जब शक्ति से संयुक्त होते हैं, तभी सृष्टि आदि कार्यों में समर्थ होते हैं। शक्ति से रहित स्थिति में वे स्पन्दन करने में भी प्रवृत्त नहीं होते। यहाँ “असमर्थता” किसी लौकिक दुर्बलता का सूचक नहीं है, अपितु यह बताती है कि शिव और शक्ति का अभिन्न संयोग ही सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोधान और अनुग्रह का मूल रहस्य है।
इस दृष्टि से शिवकामेश्वराङ्कस्था नाम भगवती के परम आसन का वर्णन करते हुए यह भी संकेत करता है कि श्रीललिताम्बिका शिव से पृथक् नहीं हैं। वे शिव की सहज चिच्छक्ति, आनन्दरूपिणी और पराशक्ति हैं।
पञ्चब्रह्मासन से सम्बन्ध
सहस्रनाम के अगले चरणों में चिन्तामणिगृहान्तस्था और पञ्चब्रह्मासनस्थिता जैसे नाम आते हैं। उस क्रम में भगवती का आसन, उनका श्रीनगर, उनका चिन्तामणि-गृह और उनका पञ्चब्रह्मासन क्रमशः वर्णित होते हैं। वर्तमान नाम उस व्यापक राजराजेश्वरी-वर्णन का सूक्ष्म और अत्यन्त मधुर अंग है, जहाँ देवी शिव-कामेश्वर के अङ्क में स्थित बताई गई हैं।
पञ्चब्रह्मासन की परम्परा में ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव जैसे तत्त्व भगवती के अधिष्ठान से ही चैतन्य-प्राप्त और कार्यक्षम माने जाते हैं। इस अर्थ में भगवती का शिव-कामेश्वराङ्कस्थत्व किसी लौकिक राजासन का वर्णन मात्र नहीं है, अपितु यह बताता है कि समस्त देवतत्त्वों की मूलाधिष्ठात्री परमेश्वरी स्वयं शिव-सामरस्य में प्रतिष्ठित हैं।
श्रीविद्या में तात्त्विक संकेत
श्रीविद्या की उपासना में शिव और शक्ति को केवल दो देवताओं के रूप में नहीं, अपितु एक ही परतत्त्व के प्रकाश और विमर्श रूप के रूप में देखा जाता है। शिव प्रकाशस्वरूप हैं और शक्ति उस प्रकाश की आत्मबोधमयी विमर्शशक्ति हैं। प्रकाश बिना विमर्श के उपासक के लिए अप्रकट रहता है, और विमर्श बिना प्रकाश के असम्भव है। इसी कारण दोनों का सामरस्य श्रीविद्या का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तत्त्व माना गया है।
शिवकामेश्वराङ्कस्था नाम में भगवती का अङ्कस्थित रूप साधक को यह स्मरण कराता है कि परम तत्त्व में विरोध नहीं, सामरस्य है। शिव और शक्ति में जो अभेद है, वही अन्तःकरण में ज्ञान और भक्ति, शान्ति और करुणा, निश्चलता और अनुग्रह के रूप में प्रकट होता है। रहस्य-मन्त्र और बीज-तत्त्वों की दृष्टि से इस विषय के अनेक सूक्ष्म संकेत परम्परा में माने जाते हैं, परन्तु ऐसे रहस्य सद्गुरु-उपदेश और अधिकार के विषय हैं। सामान्य लेख में उनका केवल संकेत ही उचित है।
साधक के लिए संदेश
इस नाम के जप और स्मरण में साधक भगवती से प्रार्थना करता है कि उसके अन्तःकरण में शिव-शक्ति-सामरस्य का भाव दृढ़ हो। जहाँ केवल ज्ञान है पर करुणा नहीं, वहाँ साधना सूखी हो सकती है। जहाँ केवल भावना है पर तत्त्वबोध नहीं, वहाँ चित्त स्थिर नहीं रहता। श्रीललिताम्बिका शिव-कामेश्वराङ्कस्था हैं, अतः वे साधक को ज्ञान और करुणा, शान्ति और आनन्द, भक्ति और तत्त्वबोध का समन्वय प्रदान करने वाली पराम्बिका हैं।
यह नाम साधक को यह भी सिखाता है कि देवी की उपासना में द्वैत और अद्वैत विरोधी नहीं हैं। आरम्भ में साधक भगवती को प्रणम्य, पूज्या और कृपामयी माता के रूप में देखता है। धीरे-धीरे उसी भक्ति में यह बोध उदित होता है कि शिव और शक्ति का अभेद ही सम्पूर्ण जगत् और स्वयं साधक के चैतन्य का मूल रहस्य है।
शिवकामेश्वराङ्कस्था नाम में श्रीललिताम्बिका के दिव्य आसन का, शिव-कामेश्वर से उनके अविच्छिन्न सामरस्य का और पराशक्ति की परम ऐश्वर्यमयी माधुरी का स्मरण है। इस नाम के जप में साधक भगवती से प्रार्थना करता है कि उसके हृदय में शिवतत्त्व की शान्ति और शक्तितत्त्व की अनुग्रह-मयी चेतना एकरस होकर प्रकट हो। ऐसी शिव-कामेश्वराङ्कस्था श्रीमाता को बारम्बार नमस्कार है।