प्रार्थना
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ॥
श्रीललितासहस्रनाम के बावनवें नाम में भगवती को शिवकामेश्वराङ्कस्था, अर्थात् शिवकामेश्वर के अङ्क में विराजमान कहा गया। इसके तुरन्त पश्चात् तिरपनवाँ नाम शिवा आता है। इस क्रम में नाम का संकेत अत्यन्त सूक्ष्म है। भगवती केवल शिव के समीप स्थित देवी नहीं हैं, अपितु वे स्वयं कल्याणस्वरूपा, शिवतत्त्व से अभिन्न और परमानन्दमयी चित्शक्ति हैं।
पदच्छेद और प्रत्यक्ष अर्थ
इस नाम का पदच्छेद सरल है:
शिवा
शिव शब्द का एक प्रमुख अर्थ है कल्याण, मङ्गल, शुभ और परमशान्त चैतन्य। उसी का स्त्रीलिङ्ग रूप शिवा है। इसलिए इस नाम का प्रत्यक्ष अर्थ है, जो स्वयं कल्याणस्वरूपिणी हैं, जो मङ्गलमयी हैं, और जो शिवतत्त्व से अविभिन्न चित्शक्ति हैं।
भास्कररायीय अर्थ
भास्करराय मखिन की सौभाग्यभास्कर व्याख्या में इस नाम का मूल भाव भगवती की कल्याणस्वरूपता और शिवाभिन्नता से सम्बद्ध है। यहाँ शिवा का अर्थ केवल लौकिक दाम्पत्य-संबन्ध के रूप में “शिव की पत्नी” नहीं है। सहस्रनाम के क्रम में यह नाम बताता है कि जो देवी शिवकामेश्वर के अङ्क में विराजमान हैं, वे वस्तुतः शिव से पृथक् कोई अन्य सत्ता नहीं, अपितु शिवस्वरूपा पराशक्ति ही हैं।
शिव यदि प्रकाशस्वरूप चैतन्य हैं, तो शिवा उस चैतन्य की स्वप्रकाशिनी शक्ति हैं। श्रीविद्या की भाषा में यही प्रकाश और विमर्श का सामरस्य है। इसीलिए भगवती को शिवा कहना उनके परममङ्गलमय स्वरूप, उनके चैतन्यमय तत्त्व और शिवशक्ति-अभेद को एक साथ सूचित करता है।
सौन्दर्यलहरी में शिवशक्ति-सामरस्य
इस नाम की तात्त्विक पृष्ठभूमि के लिए सौन्दर्यलहरी का आरम्भिक वचन अत्यन्त प्रसिद्ध है:
न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि ।
यह उद्धरण शिवा नाम को समझने में सहायक है। यहाँ भगवती को शिव से हीन या पृथक् शक्ति के रूप में नहीं, अपितु शिव के स्वाभाविक सामर्थ्य, आनन्दरूप चैतन्य और विमर्शशक्ति के रूप में देखा जाता है। श्रीललिताम्बिका शिव की सहचरी मात्र नहीं, शिवस्वरूपिणी पराम्बिका हैं।
श्रीविद्या में तात्त्विक संकेत
श्रीविद्या-परम्परा में शिवा नाम का संकेत शिवशक्ति-सामरस्य की ओर है। शिव को प्रकाश और शक्ति को विमर्श कहा जाता है। प्रकाश बिना विमर्श के अपने को व्यक्त नहीं करता और विमर्श बिना प्रकाश के सम्भव नहीं होता। इस प्रकार शिव और शिवा दो पृथक् तत्त्व नहीं हैं, अपितु एक ही परब्रह्मचैतन्य के अभिन्न पक्ष हैं।
सहस्रनाम में आगे आने वाला नाम शिवशक्त्यैक्यरूपिणी इसी भाव को अधिक स्पष्ट रूप में प्रकट करता है। वहाँ जिस अद्वैत-सामरस्य को प्रत्यक्ष कहा गया है, उसका संक्षिप्त और अत्यन्त गम्भीर संकेत यहाँ शिवा नाम में मिलता है।
रहस्य-मन्त्र और बीजविचार के क्षेत्र में भी यह नाम गहन अर्थ रखता है, किन्तु ऐसे विषय गुरु-परम्परा में ही ग्राह्य हैं। सामान्य भक्तिपरक मनन के लिए इतना समझना पर्याप्त है कि भगवती का शिवा-स्वरूप साधक को कल्याण, शुद्धता और चैतन्य की ओर उन्मुख करता है।
उपासना-दृष्टि से अर्थ
उपासना-दृष्टि से शिवा नाम साधक को यह स्मरण कराता है कि भगवती का अनुग्रह केवल बाह्य ऐश्वर्य का साधन नहीं है। उनका वास्तविक प्रसाद अन्तःकरण की शुद्धि, श्रद्धा, शान्ति और कल्याणमयी वृत्ति में प्रकट होता है। जो भगवती को शिवा कहकर प्रणाम करता है, वह उनके समक्ष अपने भीतर की अमङ्गलमयी वृत्तियों को निवृत्त करने की प्रार्थना करता है।
यहाँ “शिव” का अर्थ केवल संहारकर्ता देवता के रूप में सीमित नहीं है। शिव का अर्थ है शुद्ध, मङ्गलमय, कल्याणरूप चैतन्य। उसी चैतन्य की पराशक्ति जब मातृभाव से साधक के हृदय में प्रतिष्ठित होती हैं, तब वे शिवा कही जाती हैं।
साधक के लिए संदेश
शिवा नाम साधक को कल्याणमयी दृष्टि प्रदान करता है। यह नाम सिखाता है कि भगवती की उपासना का सार केवल बाह्य पूजा-विधान में नहीं, अपितु अन्तःकरण को शिवमय बनाने में है। जब साधक भगवती को शिवा कहकर प्रणाम करता है, तब वह प्रार्थना करता है कि उसके विचार, वचन और कर्म मङ्गलमय हों, उसका अन्तःकरण शुद्ध हो और उसमें भगवती के चैतन्य का प्रकाश स्थिर हो।
इस नाम का मनन साधक को शिव और शक्ति के अभेद की ओर ले जाता है। भक्त और भगवती के मध्य शरणागति का भाव बना रहता है, परन्तु तत्त्वदृष्टि से वही शरणागति अन्ततः चैतन्य की एकत्वभूमि की ओर संकेत करती है।
श्रीललिताम्बिका शिवा हैं, अर्थात् वे स्वयं कल्याणस्वरूपिणी, मङ्गलमयी और शिवतत्त्व से अभिन्न पराशक्ति हैं। इस नाम में भगवती का सौम्य मातृभाव, परात्त्विक चैतन्य और श्रीविद्या का शिवशक्ति-सामरस्य एक साथ प्रकट होता है। साधक इस नाम के जप में भगवती से प्रार्थना करता है कि उसका अन्तःकरण शुद्ध, श्रद्धामय और शिवमय बने।