बुधवार, 8 जुलाई 2026

55.सुमेरु-मध्य-श‍ृङ्गस्था - सुमेरुमध्यश‍ृङ्गस्थायै नमः

प्रार्थना

शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥

सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ॥

सुमेरु-मध्य-शृङ्गस्था श्रीमन्नगर-नायिका ।
चिन्तामणि-गृहान्तस्था पञ्च-ब्रह्मासन-स्थिता ॥२२॥

श्रीललिता सहस्रनाम में भगवती के दिव्य विग्रह, शोभा और अलङ्कारों का वर्णन करने के पश्चात् वाग्देवियाँ अब उनके दिव्य निवास का निरूपण आरम्भ करती हैं। पचपनवाँ नाम है सुमेरु-मध्य-शृङ्गस्था। इस नाम में श्रीललिताम्बिका के उस परम अधिष्ठान का स्मरण है जहाँ वे समस्त देवता, तत्त्व और शक्तियों की अधिष्ठात्री पराशक्ति के रूप में विराजमान हैं।

पदच्छेद और प्रत्यक्ष अर्थ

इस नाम का पदच्छेद है सुमेरु-मध्य-शृङ्ग-स्थासुमेरु का अर्थ है दिव्य मेरुपर्वत, जिसे पुराणों में लोकों के मध्य स्थित महान् पर्वत के रूप में कहा गया है। मध्य का अर्थ है मध्यभाग। शृङ्ग का अर्थ है शिखर। स्था का अर्थ है स्थित रहने वाली।

अतः सुमेरु-मध्य-शृङ्गस्था का प्रत्यक्ष अर्थ है, “वे भगवती जो सुमेरु पर्वत के मध्य शिखर पर स्थित हैं।” अर्चना में इसका मन्त्ररूप है:

ॐ सुमेरु-मध्य-शृङ्गस्थायै नमः ।
अर्थात् सुमेरु के मध्य शिखर पर विराजमान भगवती को नमस्कार है।

भास्कररायीय अर्थ

भास्करराय मखिन् के सौभाग्य-भास्कर में इस नाम का अर्थ अत्यन्त सरल और प्रत्यक्ष रूप में लिया गया है। भगवती सुमेरु के मध्य शिखर पर स्थित हैं। यह अर्थ अगले नामों से भी स्वाभाविक रूप से जुड़ता है, क्योंकि उसी प्रसङ्ग में उनके श्रीमन्नगर, चिन्तामणि-गृह और पञ्चब्रह्मासन का वर्णन आता है। इस प्रकार यह नाम भगवती के दिव्य निवास-वर्णन का प्रवेश-द्वार है।

यहाँ “सुमेरु” केवल पर्वत का सामान्य नाम नहीं है। वह देवताओं के मध्य स्थित दिव्य अधिष्ठान का द्योतक है। “मध्य-शृङ्ग” कहने से भगवती का स्थान सामान्य शिखर पर नहीं, अपितु मेरु के केन्द्रीय और प्रधान शिखर पर सूचित होता है। इस नाम से श्रीललिताम्बिका की सर्वोच्च अधिष्ठात्री-स्थिति प्रकट होती है।

ललितोपाख्यान और श्रीपुर का संकेत

ललितोपाख्यान में भगवती ललिता के दिव्य नगर श्रीपुर का वर्णन विस्तृत रूप से प्राप्त होता है। सहस्रनाम के इस क्रम में पहले सुमेरु के मध्य शिखर का उल्लेख है, फिर “श्रीमन्नगर-नायिका” नाम में उसी दिव्य नगर की अधिष्ठात्री के रूप में भगवती का निर्देश है। इसलिए इस नाम को अगले नाम से पृथक् करके नहीं, बल्कि उसी निवास-वर्णन की आरम्भिक कड़ी के रूप में समझना चाहिए।

शास्त्रीय दृष्टि से सुमेरु का मध्य शिखर देवताओं के भी अतीन्द्रिय अधिष्ठान का संकेत देता है। वहाँ भगवती का स्थित होना यह बताता है कि वे किसी एक लोक या देवता तक सीमित नहीं हैं। वे समस्त लोक-व्यवस्था, देवशक्ति और ब्रह्माण्डीय ऐश्वर्य की मूल अधिष्ठात्री हैं।

सौन्दर्यलहरी में दिव्य निवास का भाव

आदि शङ्कराचार्यकृत सौन्दर्यलहरी में भगवती के दिव्य निवास का जो भाव आता है, वह इस नाम के प्रसङ्ग में स्मरणीय है। वहाँ मणिद्वीप और चिन्तामणि-गृह का उल्लेख मिलता है, जो सहस्रनाम के आगे के नामों से भी सम्बद्ध है।

सुधासिन्धोर्मध्ये सुरविटपिवाटीपरिवृते
मणिद्वीपे नीपोपवनवति चिन्तामणिगृहे ।
अर्थात् अमृत-सागर के मध्य, देववृक्षों की वाटिकाओं से परिवृत्त मणिद्वीप में, कदम्ब-वन से सुशोभित चिन्तामणि-गृह में भगवती का दिव्य निवास है।

यह उद्धरण सीधे “सुमेरु-मध्य-शृङ्गस्था” शब्द का भाष्य नहीं है, परन्तु भगवती के दिव्य निवास-वर्णन की उसी परम्परा को प्रकाशित करता है। इसलिए इसे यहाँ केवल सहायक तात्त्विक संकेत के रूप में ग्रहण करना उचित है।

श्रीविद्या में तात्त्विक संकेत

श्रीविद्या की उपासना-दृष्टि में मेरु का सम्बन्ध श्रीचक्र से भी जोड़ा जाता है। श्रीचक्र का त्रिविम स्वरूप मेरु कहलाता है। उसके केन्द्रीय तत्त्व, बिन्दु में पराशक्ति का परम अधिष्ठान माना जाता है। इसी दृष्टि से “सुमेरु-मध्य-शृङ्गस्था” नाम साधक को यह स्मरण कराता है कि भगवती समस्त आवरणों, देवताओं और शक्तियों के परात्पर केन्द्र में विराजमान हैं।

यह अर्थ प्रत्यक्ष अर्थ का विकल्प नहीं है, बल्कि उपासना में प्रयुक्त तात्त्विक संकेत है। प्रत्यक्ष अर्थ में भगवती सुमेरु के मध्य शिखर पर स्थित हैं। साधनात्मक अर्थ में वही मध्य शिखर चैतन्य के परम केन्द्र का बोध कराता है। इस विषय में रहस्य-मन्त्र, बीज और आन्तरिक विधियों का विवेचन गुरु-परम्परा के अधीन ही ग्राह्य है।

साधक के लिए संदेश

इस नाम के जप में साधक श्रीललिताम्बिका से प्रार्थना करता है कि उसका अन्तःकरण भी मेरु के मध्य शिखर के समान स्थिर, पवित्र और भगवत्स्मरणमय बने। जैसे भगवती सुमेरु के दिव्य शिखर पर विराजती हैं, वैसे ही साधक अपने हृदय में उनके चरणों का स्थिर आसन स्थापित करने की भावना करता है।

“सुमेरु-मध्य-शृङ्गस्था” नाम साधक को ऊर्ध्वगामी भाव देता है। इसका आशय संसार से पलायन नहीं, बल्कि जीवन के मध्य रहते हुए भी अन्तःकरण को भगवती के परम चैतन्य से जोड़ना है। यह नाम बताता है कि भगवती का अधिष्ठान सर्वोच्च है, परन्तु उनकी कृपा से वही सर्वोच्च तत्त्व भक्त के हृदय में भी अनुभव का विषय बन सकता है।

सार रूप में, “सुमेरु-मध्य-शृङ्गस्था” नाम श्रीललिताम्बिका के परम अधिष्ठान का नाम है। वे सुमेरु के मध्य शिखर पर, श्रीपुर और चिन्तामणि-गृह की दिव्य परम्परा में, समस्त देवशक्तियों की स्वामिनी के रूप में स्थित हैं। उपासना-दृष्टि से वे श्रीचक्र के परम केन्द्र में विराजमान पराशक्ति हैं। इस नाम का स्मरण करते हुए साधक भगवती से प्रार्थना करता है कि उसके अन्तःकरण में भी श्रद्धा, शरणागति और चैतन्य का दिव्य मेरु प्रतिष्ठित हो।

122.शाम्भवी - शाम्भव्यै नमः

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