मंगलवार, 4 अगस्त 2026

82.कामेश्वरास्त्र-निर्दग्ध-सभण्डासुर-शून्यका - कामेश्वरास्त्रनिर्दग्धसभण्डासुरशून्यकायै नमः

कामेश्वरास्त्र-निर्दग्ध-सभण्डासुर-शून्यका

प्रार्थना

शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥

सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ॥

कामेश्वरास्त्रनिर्दग्धसभण्डासुरशून्यका
ब्रह्मोपेन्द्रमहेन्द्रादिदेवसंस्तुतवैभवा ॥33॥

श्रीललिताम्बिका और भण्डासुर के मध्य चल रहा महायुद्ध अब अपने निर्णायक क्षण पर पहुँचता है। पूर्ववर्ती नाम में भगवती ने महापाशुपतास्त्र की अग्नि से असुर-सेना का संहार किया था। वर्तमान नाम उस अन्तिम देवीकृत्य का वर्णन करता है जिसमें अकेला रह गया भण्डासुर तथा उसकी राजधानी शून्यक, दोनों कामेश्वरास्त्र के तेज से पूर्णतः दग्ध हो जाते हैं। यहाँ युद्ध का लक्ष्य केवल विरोधी सेना को परास्त करना नहीं, अधर्म के मूल केन्द्र का समूल उन्मूलन है।

पदच्छेद एवं प्रत्यक्ष अर्थ

कामेश्वर-अस्त्र-निर्दग्ध-स-भण्डासुर-शून्यका

कामेश्वर से अभिप्राय श्रीललिता के दिव्य सहचर परमशिवस्वरूप कामेश्वर से है। अस्त्र का अर्थ मन्त्रशक्ति से प्रयुक्त दिव्य आयुध है। निर्दग्ध का अर्थ पूर्णतः जला दिया गया या भस्मीकृत किया गया है। का अर्थ ‘सहित’ है। भण्डासुर उस असुरराज का नाम है जिसके विनाश के लिए श्रीललिताम्बिका की शक्तिसेना ने युद्ध किया। शून्यका भण्डासुर की राजधानी का नाम है।

समस्त पद का व्याकरणिक आशय है: जिनके द्वारा कामेश्वर के अस्त्र की अग्नि से भण्डासुर-सहित शून्यक नामक उसकी नगरी पूर्णतः दग्ध कर दी गई, वे भगवती कामेश्वरास्त्र-निर्दग्ध-सभण्डासुर-शून्यका हैं। विशेषण के रूप में यह नाम उस देवी को सूचित करता है जिनकी निर्णायक शक्ति ने असुरराज तथा उसके सुरक्षित सत्ता-केन्द्र, दोनों का एक साथ अन्त कर दिया।

भास्कररायीय अर्थ

भास्करराय मखिन् अपने सौभाग्यभास्कर में पहले प्रत्यक्ष युद्धार्थ को स्पष्ट करते हैं। उनके अनुसार कामेश्वर का यह अस्त्र पूर्वप्रयुक्त महापाशुपतास्त्र से भी अधिक प्रभावशाली है। उसी की अग्नि से भण्डासुर और उसके साथ शून्यक नामक नगर दग्ध हुआ। इस व्याख्या से आयुधों का क्रम भी स्पष्ट होता है: महापाशुपतास्त्र ने भण्डासुर की शेष सेना का नाश किया, किन्तु कामेश्वरास्त्र ने स्वयं असुरराज तथा उसके नगर को समाप्त किया।

इसके बाद भास्करराय अध्यात्मपरक अर्थ प्रस्तुत करते हैं। उनके विवेचन में कामेश्वरास्त्र चिदग्नि, अर्थात् चैतन्य की अग्नि है। चिदात्मा ही वास्तविक कामेश्वर है, क्योंकि समस्त प्रियता अन्ततः आत्मा के कारण ही होती है। भण्डासुर उस जीवभाव का संकेत है जो द्वैत का भान उत्पन्न करता है, जबकि शून्यका दग्ध वस्त्र की क्षीण छाया के समान शेष दिखाई पड़ने वाले द्वैताभास का द्योतक है। जब जीवभाव और उसका द्वैताभास चिदग्नि में निवृत्त होते हैं, तब केवल चिन्मात्र का अवशेष रहता है।

ललितोपाख्यान में निर्णायक संहार

भण्डासुर की व्यापक सेना, उसके सहायक और उसके द्वारा उत्पन्न विविध प्रतिरोध एक-एक करके समाप्त हो चुके थे। अब वह अपने बन्धु-बान्धवों से रहित होकर स्वयं युद्धभूमि में शेष था। पराजय समीप देखकर भी उसका क्रोध शान्त नहीं हुआ; वह जगत् में पुनः विप्लव उत्पन्न करने के संकल्प से युद्धरत रहा। इस स्थिति में श्रीललिताम्बिका ने उस पर महाकामेश्वरास्त्र का प्रयोग किया।

ब्रह्माण्डपुराण-परम्परा में वर्णित प्रसंग के अनुसार उस अस्त्र का तेज सहस्र सूर्यों के समान था। उसने भण्डासुर का प्राणान्त कर दिया और उससे निकली ज्वालाओं ने उसकी राजधानी शून्यक को भी दग्ध कर दिया। नगर के भवन, सैन्य-साधन, भण्डार और उसकी असुरी व्यवस्था कुछ भी सुरक्षित नहीं रहा; अन्त में केवल भूमि शेष रह गई। इस प्रकार ‘शून्यक’ नाम वाला नगर वस्तुतः शून्य हो गया। भास्करराय इसी प्रसंग को वर्तमान नाम का प्रत्यक्ष आधार बताते हैं।

नाम में नगर का उल्लेख विशेष अर्थ रखता है। किसी अत्याचारी शासक का वध होने पर भी उसके द्वारा निर्मित दमनकारी व्यवस्था बनी रह सकती है। यहाँ भगवती केवल भण्डासुर को नहीं मारतीं; वे उस संरचना को भी नष्ट करती हैं जिसमें उसका अधर्म संगठित, संरक्षित और पुनरुत्पादित होता था। अतः ‘सभण्डासुर-शून्यका’ पद देवी-विजय की सम्पूर्णता व्यक्त करता है।

कामेश्वरास्त्र की विशिष्टता

‘कामेश्वरास्त्र’ को सामान्य लौकिक शस्त्र के समान समझना उचित नहीं है। अस्त्र उस दिव्य शक्ति का नाम है जो संकल्प, अधिष्ठाता देवता और मन्त्रशक्ति से कार्य करती है। वर्तमान युद्धक्रम में इसकी विशिष्टता उसके प्रभाव से प्रकट होती है। जहाँ अन्य देवीशक्तियाँ भण्डासुर के सेनापतियों, पुत्रों, विघ्नयन्त्रों और मायावी आयुधों का प्रतिकार करती हैं, वहीं यह अस्त्र युद्ध के मूल विरोधी तथा उसके नगर पर निर्णायक प्रहार करता है।

‘कामेश्वर’ नाम यहाँ लौकिक कामना का सूचक नहीं है। श्रीविद्यापरम्परा में कामेश्वर परमशिव का वह स्वरूप है जो श्रीललिता से अभिन्न दिव्य सामरस्य में प्रतिष्ठित है। इसलिए कामेश्वरास्त्र को देवी से पृथक किसी बाहरी सत्ता का आयुध नहीं मानना चाहिए। वह भगवती के परम ऐश्वर्य और शिवशक्ति-सामरस्य से अभिव्यक्त संहारशक्ति है। उसके द्वारा किया गया संहार उग्रता का अनियन्त्रित प्रदर्शन नहीं, धर्म-संस्थापन के लिए आवश्यक और पूर्णतः लक्षित देवीकृत्य है।

‘शून्यका’ का नाम और उसका अभिप्राय

प्रत्यक्ष कथा में शून्यका एक वास्तविक असुरनगरी है। उसका नाम पहले से ‘शून्यका’ था; देवी के अस्त्र से दग्ध होने के बाद वह अपने नाम के अनुरूप रिक्त हो गई। इस शब्दालंकार को भास्करराय भी रेखांकित करते हैं। नगर का विनाश इतना पूर्ण था कि उसकी पूर्व समृद्धि, दुर्ग-संरचना और सैन्यबल का कोई आधार शेष नहीं रहा।

तात्त्विक विवेचन में ‘शून्यका’ को किसी साधारण भौतिक रिक्तता अथवा निरर्थक अभाव का पर्याय नहीं बनाया गया है। भास्करराय इसे द्वैतभान की उस अवशिष्ट प्रतीति से जोड़ते हैं जो आत्मज्ञान के उदय के बाद भी प्रारब्ध के कारण कुछ समय तक दग्ध वस्त्र की आकृति के समान दिखाई दे सकती है। चिदग्नि उस अन्तिम आभास का भी अपगम करती है। फलतः निष्कर्ष शून्यवाद नहीं, प्रत्युत चिन्मात्र का अवशेष है।

श्रीविद्या में तात्त्विक संकेत

उपासना-दृष्टि से भण्डासुर को उस सीमित जीवभाव का संकेत माना जा सकता है जो अपने को स्वतन्त्र, पृथक् और पूर्णतः देह-मन तक सीमित समझता है। इस भाव से उत्पन्न द्वैत-दृष्टि ही उसके लिए एक ‘शून्यक’ निर्मित करती है: नाम-रूपों, आग्रहों और स्वनिर्मित धारणाओं का ऐसा सुरक्षित नगर जिसमें अहन्ता अपने अस्तित्व को स्थायी मान बैठती है।

आरम्भिक विवेक अनेक आविद्यक वृत्तियों को क्षीण कर सकता है, फिर भी उनका केन्द्रभूत ‘मैं पृथक् हूँ’ का भाव सूक्ष्म रूप में बचा रह सकता है। भास्कररायीय संकेत में कामेश्वरास्त्ररूपी चिदग्नि उस मूल जीवभाव को ही निवृत्त करती है। तब साधक किसी जड़ शून्यता में नहीं पहुँचता; वह उस चैतन्य की ओर उन्मुख होता है जिसके प्रकाश में ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का समस्त व्यवहार प्रकट होता है।

इस अर्थ को किसी त्वरित मानसिक कल्पना अथवा बाहरी संघर्ष से जोड़ना उचित नहीं है। यह आत्मस्वरूप की परिपक्व पहचान की दिशा में दिया गया तात्त्विक संकेत है। यहाँ संहार का अर्थ अस्तित्व का निषेध नहीं, मिथ्या पृथक्त्व-बोध का अपगम है। जो शेष रहता है वह भगवती का चिद्रूप, अखण्ड और स्वयंप्रकाश स्वरूप है।

साधक के लिए संदेश

यह नाम साधक को अपने भीतर के दोषों के प्रति असंयत कठोरता नहीं, बल्कि सत्यनिष्ठ विवेक रखने की प्रेरणा देता है। कभी-कभी किसी एक अनुचित प्रवृत्ति को रोक देना पर्याप्त नहीं होता; उस प्रवृत्ति को आश्रय देने वाली मान्यताओं, आसक्तियों और अहंभाव को भी भगवती के सम्मुख समर्पित करना पड़ता है। अन्यथा बाहरी परिवर्तन के बाद भी उसका मूल केन्द्र बना रह सकता है।

इस नाम का स्मरण करते हुए साधक ऐसी प्रार्थना कर सकता है: हे श्रीललिताम्बिका, जो असत्य को आश्रय देने वाली मेरी अन्तःसंरचनाएँ हैं, उन्हें अपने ज्ञानमय प्रकाश से स्पष्ट कर दीजिए। मेरे भीतर जो पृथक्त्व, अभिमान और आग्रह आपके सर्वव्यापक चैतन्य को ढकते हैं, उन्हें अपनी कृपा से निवृत्त कीजिए। मुझे किसी रिक्त निराशा में नहीं, आपके स्वयंप्रकाश स्वरूप की शरण में स्थिर कीजिए।

भाव-सार

श्रीललिताम्बिका कामेश्वरास्त्र की अग्नि से भण्डासुर और उसकी राजधानी शून्यक को समूल दग्ध करने वाली परमेश्वरी हैं। प्रत्यक्ष कथा में यह अधर्म और उसके सत्ता-केन्द्र का निर्णायक अन्त है। भास्कररायीय दृष्टि में यही अस्त्र चिदग्नि है, जो द्वैत उत्पन्न करने वाले जीवभाव तथा उसके अवशिष्ट आभास को निवृत्त कर केवल चिन्मात्र को प्रकाशित करती है।

122.शाम्भवी - शाम्भव्यै नमः

प्रार्थना शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान...