सोमवार, 3 अगस्त 2026

81.महा-पाशुपतास्त्राग्नि-निर्दग्धासुर-सैनिका - महापाशुपतास्त्राग्निनिर्दग्धासुरसैनिकायै नमः

महा-पाशुपतास्त्राग्नि-निर्दग्धासुर-सैनिका

प्रार्थना

शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥

सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ॥

कराङ्गुलिनखोत्पन्ननारायणदशाकृतिः ।
महापाशुपतास्त्राग्निनिर्दग्धासुरसैनिका ॥३२॥

श्रीललिताम्बिका और भण्डासुर के मध्य चल रहे महायुद्ध के निर्णायक चरण में यह नाम आता है। पिछले नाम में देवी की कराङ्गुलियों के नखों से प्रकट हुई नारायण की दस आकृतियों ने असुर द्वारा उत्पन्न विघातक शक्तियों का प्रतिकार किया। अब युद्धभूमि में विद्यमान विशाल असुर-सेना के विनाश के लिए स्वयं श्रीललिता महापाशुपतास्त्र का प्रयोग करती हैं। इस नाम का प्रत्यक्ष विषय किसी सामान्य विजय का वर्णन नहीं, अपितु उस अस्त्र की प्रचण्ड अग्नि द्वारा शत्रु-सैन्य का पूर्ण दाह है।

पदच्छेद एवं प्रत्यक्ष अर्थ

महा-पाशुपत-अस्त्र-अग्नि-निर्दग्ध-असुर-सैनिका

महा का अर्थ है महान्, अत्यन्त प्रबल अथवा असाधारण सामर्थ्य से सम्पन्न। पाशुपत उस दिव्य अस्त्र का नाम है जिसका सम्बन्ध पशुपति भगवान् शिव से माना जाता है। अस्त्र वह आयुध है जिसका प्रयोग संकल्पपूर्वक दूरस्थ लक्ष्य पर किया जाता है। अग्नि यहाँ उस अस्त्र से प्रकट होने वाली दाहक ज्वाला है। निर्दग्ध का अर्थ है पूर्णतया जला दिया गया। असुर-सैनिका का अभिप्राय असुरों की सेना से है।

समस्त पदों का सम्बन्ध देवी से बताने पर नाम का प्रत्यक्ष अर्थ है: “वे श्रीललिताम्बिका, जिन्होंने महापाशुपतास्त्र की अग्नि से असुरों की सेना को पूर्णतः जला दिया।”

यह स्त्रीलिङ्गीय बहुव्रीहि-प्रधान विशेषण देवी को उस विशिष्ट युद्धकर्म से परिचित कराता है जिसके फलस्वरूप असुर-सैन्य निर्दग्ध हुआ। नाम में प्रयुक्त “निर्दग्ध” शब्द विशेष ध्यान देने योग्य है। इसका अर्थ केवल पराजित, तितर-बितर अथवा अस्थायी रूप से निष्क्रिय किया गया नहीं है। उपसर्ग “निर्” के कारण यहाँ पूर्ण दाह और विनाश का भाव प्रबल है।

भास्कररायीय अर्थ

भास्करराय मखिन् की व्याख्या इस नाम को भण्डासुर-वध से सम्बन्धित वास्तविक युद्धक्रम में रखती है। महापाशुपत नामक अस्त्र से प्रकट अग्नि ने भण्डासुर के पक्ष में युद्ध कर रहे असुर-सैनिकों को जला दिया। इस प्रकार भाष्य नाम के पदों को किसी अस्पष्ट रूपक में विलीन नहीं करता, बल्कि पहले उस युद्धघटना को स्थापित करता है जिसमें देवी ने एक विशिष्ट दिव्य अस्त्र का प्रयोग किया।

यहाँ असुर-सेना और स्वयं भण्डासुर के विनाश में स्पष्ट भेद है। वर्तमान नाम में लक्ष्य असुर-सैन्य है। इसके पश्चात् आने वाला नाम कामेश्वरास्त्र द्वारा भण्डासुर और उसकी शून्यक नगरी के विनाश का वर्णन करता है। अतः महापाशुपतास्त्र को उसी आगामी घटना का दूसरा नाम मान लेना सहस्रनाम के सूक्ष्म क्रम को अस्पष्ट कर देगा। वर्तमान चरण में देवी पहले शत्रु की व्यापक युद्धशक्ति का उन्मूलन करती हैं; प्रधान असुर का अन्त अगले चरण का विषय है।

भास्कररायीय दृष्टि में “पाशुपत” शब्द का सम्बन्ध पशुपति से है। पशुपति भगवान् शिव का नाम है, जो बद्ध जीवों के अधिपति और बन्धन से मोक्ष प्रदान करने वाले परमेश्वर हैं। युद्धकथा के स्तर पर यह शिवसम्बद्ध महास्त्र है; तात्त्विक स्तर पर इसका नाम उस शक्ति का संकेत भी देता है जिसके सम्मुख जीव को बाँधने वाली आसुरी प्रवृत्तियाँ स्थिर नहीं रह सकतीं। यह दूसरा पक्ष प्रत्यक्ष घटना के बाद ग्रहण किया जाने वाला अर्थ है, उसका स्थानापन्न नहीं।

ललितोपाख्यान में युद्ध-प्रसंग

भण्डासुर का युद्ध केवल दो योद्धाओं का द्वन्द्व नहीं था। उसके साथ एक विस्तृत आसुरी सैन्य-व्यवस्था, अनेक सेनापति, विविध आयुध और मायामय युद्धशक्तियाँ सक्रिय थीं। देवी की ओर से भी मन्त्रिणी, दण्डनाथा, बाला, सम्पत्करी, अश्वारूढा तथा अनगिनत शक्तियाँ सुव्यवस्थित दिव्य सेना के रूप में युद्ध कर रही थीं। क्रमशः भण्डासुर के प्रमुख सहायकों और विघ्नकारी उपायों का निराकरण होने पर युद्ध उस अवस्था में पहुँचा जहाँ शेष आसुरी सेना का समूल विनाश आवश्यक था।

इस प्रसंग में श्रीललिता केवल सेना की दूरस्थ अधिष्ठात्री नहीं रहतीं। वे स्वयं चक्रराजरथ पर स्थित होकर युद्ध का संचालन करती हैं और आवश्यकता पड़ने पर परम आयुधों का प्रयोग करती हैं। महापाशुपतास्त्र का प्रक्षेपण उनके सार्वभौम नियन्त्रण तथा शस्त्रविद्या की पराकाष्ठा को प्रकट करता है। उनकी शान्त, राजराजेश्वरी मुद्रा युद्ध के मध्य भी परिवर्तित नहीं होती। उनका प्रहार आवेशजनित हिंसा नहीं, धर्मविरोधी शक्ति के निश्चित निरसन का साधन है।

अस्त्र की अग्नि असुर-सैनिकों को घेरकर उनका दाह करती है। इसे लौकिक अग्निबाण की सीमित क्रिया समझना पर्याप्त नहीं होगा। “महा” विशेषण उसके असाधारण विस्तार और सामर्थ्य को सूचित करता है। असुरों की संख्या, कवच, आयुध और संगठित सैन्यबल उस दाहक शक्ति के सामने निष्फल हो जाते हैं। फिर भी इस चरण में भण्डासुर का विनाश नहीं दिखाया गया है। सहस्रनाम की कथा अपनी निश्चित गति से अगले अस्त्र और अगले परिणाम की ओर बढ़ती है।

महापाशुपतास्त्र का अभिप्राय

भारतीय आयुध-परम्परा में “अस्त्र” और हाथ में धारण करके प्रहार किए जाने वाले सामान्य “शस्त्र” के बीच भेद किया जाता है। अस्त्र किसी उच्चतर देवशक्ति से सम्बद्ध, विशिष्ट संकल्प से प्रयुक्त और लक्ष्य पर दूर से प्रभाव डालने वाला आयुध माना जाता है। पाशुपतास्त्र का नाम पशुपति शिव से सम्बन्धित होने के कारण उसमें संहार-सामर्थ्य के साथ परमेश्वर की अधिष्ठातृ शक्ति का भी बोध होता है।

यहाँ शिवसम्बद्ध अस्त्र का श्रीललिता द्वारा प्रयोग किसी भिन्न देवता की शक्ति उधार लेने का संकेत नहीं है। श्रीविद्या-दृष्टि में शिव और शक्ति परस्पर-विरहित स्वतन्त्र सत्ताएँ नहीं हैं। शक्ति शिव की क्रियाशीलता है और शिव शक्ति का अविचल आधार। अतः देवी के हाथ में पाशुपतास्त्र शिवशक्ति-सामरस्य के भीतर कार्यरत संहारशक्ति का प्रकाश है। इस तात्त्विक सम्बन्ध को स्वीकार करते हुए भी नाम का प्रथम अर्थ युद्धभूमि में प्रयुक्त वास्तविक दिव्य अस्त्र ही रहता है।

“अग्नि” भी यहाँ मात्र प्रकाश नहीं है। अग्नि वस्तु को उसके पूर्व रूप में रहने नहीं देती। वह दाह, शोधन और रूपान्तरण की शक्ति है। असुर-सैन्य का निर्दग्ध होना बताता है कि उसकी युद्धक्षमता केवल रोकी नहीं गई, बल्कि उसका वह संगठित रूप समाप्त कर दिया गया जिससे अधर्म का प्रतिरोध पुनः खड़ा हो सकता था।

श्रीविद्या में तात्त्विक संकेत

उपासना-दृष्टि से “पशु” उस जीव की अवस्था का द्योतक हो सकता है जो अविद्या, सीमित अहंभाव और कर्मजन्य बन्धनों से आबद्ध है। “पशुपति” उन बन्धनों के अधीश्वर तथा उनसे मुक्त करने वाले परम तत्त्व हैं। इस पृष्ठभूमि में महापाशुपतास्त्र की अग्नि को उस ज्ञानशक्ति का संकेत माना जा सकता है जो बन्धन को पोषित करने वाली वृत्तियों की संगठित सेना को क्षीण नहीं, दग्ध करती है।

असुर-सैन्य को किसी एक दोष का रूपक मानना सीमित होगा। सेना अनेक सैनिकों, आयुधों और आदेशों से निर्मित संगठित शक्ति होती है। उसी प्रकार अन्तःकरण में एक मूल अविद्या से राग, द्वेष, दम्भ, भय, मत्सर, असंयम और विपरीत धारणाओं की अनेक सहायक प्रवृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं। वे परस्पर एक-दूसरे को पुष्ट करती हुई साधक के विवेक का विरोध कर सकती हैं। देवी की ज्ञानमयी अग्नि का स्मरण इन प्रवृत्तियों के साथ समझौता करने के स्थान पर उनके मूल पोषण को पहचानने की प्रेरणा देता है।

यह संकेत आत्मनिन्दा अथवा भावनाओं के कठोर दमन की शिक्षा नहीं है। युद्धकथा में देवी का संहार धर्मरक्षा के लिए सुविवेचित है। साधना में भी आवश्यक है कि साधक पहले यह पहचाने कि कौन-सी वृत्ति सामान्य मानवीय सीमा है और कौन-सी वृत्ति सत्य, करुणा तथा आत्मसंयम का निरन्तर विरोध कर रही है। विवेक से पहचानी गई आसुरी प्रवृत्ति पर ज्ञान, अनुशासन और देवी-स्मरण की संयुक्त शक्ति ही सार्थक पाशुपताग्नि बनती है।

साधक के लिए संदेश

इस नाम का जप करते समय साधक श्रीललिताम्बिका को युद्धोन्मत्त रूप में नहीं, अपितु पूर्ण आत्मसंयम से युक्त सार्वभौम जननी के रूप में स्मरण कर सकता है। वे जानती हैं कि किस विघ्न का प्रतिकार सहायक शक्तियों से होना है, कहाँ रक्षा आवश्यक है और कब किसी आसुरी संरचना का पूर्ण अन्त करना उचित है। उनकी करुणा दुर्बल उदासीनता नहीं है; वह सत्य की रक्षा करने वाली सजग शक्ति है।

साधक प्रार्थना करे कि पराम्बा उसके भीतर छिपी उन वृत्तियों को प्रकाशित करें जो अकेली नहीं आतीं, बल्कि अपने साथ अनेक तर्क, बहाने और आदतें जोड़कर एक सेना बना लेती हैं। वह देवी से किसी व्यक्ति के विनाश की कामना न करे, बल्कि अपने भीतर के असत्य, द्वेष, प्रमाद और अहंकार को पोषण देने वाली व्यवस्था के शमन की याचना करे।

“महापाशुपतास्त्राग्निनिर्दग्धासुरसैनिकायै नमः” का नमस्कार-भाव यह स्मरण कराता है कि आध्यात्मिक जीवन में कुछ प्रवृत्तियों को केवल थोड़े समय के लिए दबाना पर्याप्त नहीं होता। उन्हें सत्यदृष्टि, संयम और भगवती की शरणागति से ऐसा निर्बल करना होता है कि वे पुनः संगठित होकर साधना को आक्रान्त न कर सकें। यह कार्य क्रोध से नहीं, स्पष्ट विवेक और स्थिर अनुग्रह से सम्पन्न होता है।

भाव-सार

महा-पाशुपतास्त्राग्नि-निर्दग्धासुर-सैनिका नाम श्रीललिताम्बिका के उस युद्धकर्म का उद्घोष है जिसमें उन्होंने महापाशुपतास्त्र की अग्नि से भण्डासुर की विशाल सेना को पूर्णतः भस्म कर दिया। प्रत्यक्ष कथा में यह धर्मविरोधी सैन्यशक्ति का निर्णायक विनाश है। उपासना-दृष्टि से यह देवी की उस ज्ञानमयी संहारशक्ति का संकेत है जो जीव को बाँधने वाली आसुरी वृत्तियों के संगठित प्रभाव को दग्ध कर सकती है। साधक उनके चरणों में प्रार्थना करता है कि उसका विवेक दृढ़ हो, अन्तःकरण शुद्ध हो और असत्य को पोषित करने वाली प्रवृत्तियाँ भगवती के अनुग्रह से पुनः शक्ति न प्राप्त कर सकें।

122.शाम्भवी - शाम्भव्यै नमः

प्रार्थना शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान...