शुक्रवार, 15 मई 2026

1.श्रीमाता - श्रीमात्रे नमः

1.श्रीमाता - Goddess Lalitha Tripura Sundari

प्रार्थना

शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥

सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
    तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
    सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ॥

ॐ श्रीमाता श्रीमहाराज्ञी श्रीमत्सिंहासनेश्वरी ।
चिदग्निकुण्डसम्भूता देवकार्यसमुद्यता ॥ १॥

श्रीललितासहस्रनाम का प्रथम नाम “श्रीमाता” है। यह नाम सम्पूर्ण सहस्रनाम का मंगलमय प्रवेशद्वार है। पूर्वपीठिका के अनुसार भगवती श्रीललिताम्बिका ने वशिनी आदि वाग्देवियों को भक्तों के हित और अपनी परा प्रीति के लिए सहस्रनाम-स्तोत्र की रचना करने की आज्ञा दी। अतः यह सहस्रनाम केवल काव्यात्मक स्तुति नहीं, अपितु भगवती की आज्ञा से प्रकट हुई रहस्यनाममयी उपासना है।

पूर्वपीठिका का संकेत
कुरुध्वमङ्कितं स्तोत्रं मम नामसहस्रकैः ।
येन भक्तैः स्तुताया मे सद्यः प्रीतिः परा भवेत् ॥

इसका भाव है कि देवी कहती हैं कि मेरे सहस्र नामों से युक्त स्तोत्र की रचना करो, जिससे भक्तों द्वारा स्तुति किए जाने पर मुझे शीघ्र परा प्रीति प्राप्त हो। इसीलिए सहस्रनाम का प्रत्येक नाम उपासना, ध्यान और तत्त्वचिन्तन का विषय है।

भास्कररायीय अर्थ

भास्करराय “श्रीमाता” नाम को अनेक स्तरों पर समझाते हैं। संसार में दुःख की अवस्था में माता का स्मरण स्वाभाविक है। लौकिक माता स्नेह और पालन देती है, पर आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक इन तीनों तापों का पूर्ण निवारण करने में समर्थ सर्वोत्तमा माता जगन्माता ही हैं। इसलिए सहस्रनाम का आरम्भ मातृत्व से होता है।

यहाँ “माता” शब्द केवल जन्म देने वाली जननी का बोध नहीं कराता। भगवती वह जगन्माता हैं जिनसे जगत्, देवता, वेद, विद्या और उपासना का प्रवाह प्रकट होता है। वे अपने शरणागत की रक्षा करती हैं, उसके दुःखों का निवारण करती हैं और उसे मोक्षमार्ग की ओर ले जाती हैं।

“श्री” शब्द का भाव

“श्री” शब्द ऐश्वर्य, कान्ति, मंगल, लक्ष्मी, सरस्वती, धी, सम्पदा और विभूति का द्योतक है। परन्तु “श्रीमाता” नाम में “श्री” का अर्थ केवल लौकिक सम्पत्ति नहीं है। भास्करराय के अनुसार भगवती उन सब श्रीरूप शक्तियों की मूल जननी हैं। वे लक्ष्मी और सरस्वती की भी अधिष्ठात्री पराशक्ति हैं।

भास्करराय एक और गूढ़ अर्थ भी देते हैं। “श्री” का परम अर्थ अनवधिक, अमृतमयी और मोक्षरूप कल्याण है। इस प्रकार “श्रीमाता” वह माता हैं जो साधक को केवल लौकिक सुख नहीं, अपितु आत्मकल्याण और मोक्ष की दिशा प्रदान करती हैं।

वेदजननी रूप

भास्करराय “माता” शब्द की एक और व्याख्या करते हैं। भगवती त्रयी, अर्थात् वेदों को ब्रह्मा को बोधित करती हैं। वे वेदविद्या की मूल प्रकाशिका हैं। इसी भाव को श्रुति-वाक्य से पुष्ट किया जाता है।

श्रुति का संकेत
यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै ॥

इसका भाव है कि वही परम तत्त्व आदिकाल में ब्रह्मा को प्रकट करता है और उसी को वेदों का ज्ञान प्रदान करता है। श्रीविद्या-दृष्टि से वह परम तत्त्व भगवती त्रिपुरसुन्दरी ही हैं। इसलिए “श्रीमाता” नाम वेद, विद्या और आत्मबोध की मूल जननी का भी स्मरण कराता है।

शिव-शक्ति-सामरस्य

श्रीविद्या में भगवती केवल एक देवता नहीं, अपितु चिदानन्दरूप परब्रह्म की विमर्शशक्ति हैं। सौन्दर्यलहरी के प्रथम श्लोक में भी यही भाव प्रकट होता है कि शिव शक्ति से युक्त होकर ही सृष्टि-व्यापार में समर्थ होते हैं।

सौन्दर्यलहरी १
शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं
न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि ॥

इसका भाव है कि शिव शक्ति से संयुक्त होने पर ही सृष्टि आदि कार्यों में समर्थ होते हैं; अन्यथा वे स्पन्दन करने में भी समर्थ नहीं होते। “श्रीमाता” नाम इसी पराशक्ति को जगन्माता रूप में प्रणाम करता है।

त्रिपुरा-तत्त्व

त्रिपुरारहस्य की दृष्टि से परम देवी त्रिपुरा जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओं को प्रकाशित करने वाली शुद्ध चैतन्यमयी सत्ता हैं। वे इन अवस्थाओं में सीमित नहीं होतीं, अपितु इन्हें प्रकाशित करने वाली आधारभूता चिति हैं।

इस तात्त्विक दृष्टि से “श्रीमाता” केवल देहधारी जगत् की जननी नहीं हैं। वे अनुभूति, ज्ञान, स्मृति, वेद, देवता और सम्पूर्ण विश्व-व्यवहार को प्रकाशित करने वाली चैतन्यमयी माता हैं। साधक उनके मातृत्व में शरण लेकर अपने सीमित अहंकार से ऊपर उठता है।

देवीभागवत का मातृभाव

देवीभागवत में मणिद्वीप की भावभूमि में भगवती को मुक्तिदात्री और ज्ञानप्रदायिनी रूप में वर्णित किया गया है। वहाँ वे मुक्ति-मण्डप में जीवों को संसार-बन्धन से मुक्त करती हैं और ज्ञान-मण्डप में ज्ञानोपदेश देती हैं। यह वर्णन “श्रीमाता” नाम के उस अर्थ को पुष्ट करता है कि देवी केवल पालन करने वाली माता नहीं, अपितु मोक्ष और ज्ञान प्रदान करने वाली परम जननी हैं।

साधक के लिए संदेश

अर्चना में यह नाम “श्रीमात्रे नमः” रूप से उच्चरित होता है। इस जप में साधक भगवती को जगन्माता, वेदजननी, मोक्षप्रदायिनी और करुणामयी पराशक्ति के रूप में प्रणाम करता है। वह अपनी अहंता, ममता, भय और असहायता को उनके चरणों में समर्पित करता है।

इस नाम का स्मरण साधक को बताता है कि वह जगत् में अनाथ नहीं है। उसके भीतर और बाहर जो चैतन्य, करुणा, ज्ञान और संरक्षण का प्रवाह है, वही श्रीमाता की कृपा है। जब साधक भगवती को माता मानकर शरण ग्रहण करता है, तब उसका चित्त धीरे-धीरे विश्वास, विनय और आत्मकल्याण की दिशा में स्थिर होता है।

इस प्रकार “श्रीमाता” नाम सहस्रनाम का केवल प्रथम उच्चारण नहीं, अपितु सम्पूर्ण श्रीविद्या-मार्ग का मंगलद्वार है। इसमें भगवती की श्री, मातृत्व, वेदजननी-स्वरूपता, शिव-शक्ति-सामरस्य, चैतन्यमयी त्रिपुरा-तत्त्व और मोक्षप्रदायिनी करुणा एक साथ समाहित हैं। जो साधक श्रद्धा से “श्रीमाता” का स्मरण करता है, वह स्वयं को जगन्माता की कृपा-छाया में स्थित करता है।

1 टिप्पणी:

168.निष्क्रोधा - निष्क्रोधायै नमः

प्रार्थना शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान...