प्रार्थना
शुक्लां बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम्॥
श्री ललिता सहस्रनाम के पैंतीसवें नाम में माँ की उस सूक्ष्म कटि (कमर) का वर्णन किया गया था, जिसका केवल अनुमान लगाया जा सकता है। अब, छत्तीसवें नाम में वाग्देवियाँ उस सूक्ष्म कटि को सहारा देने वाली शारीरिक और आध्यात्मिक संरचना का वर्णन करती हैं। छत्तीसवाँ नाम है— 'स्तनभरदलन्मध्यपट्टबन्धवलित्रया'।
यह नाम माँ ललिता के उस स्वरूप को दर्शाता है जहाँ भौतिक सौंदर्य और ब्रह्मांडीय शक्तियों का अद्भुत मिलन होता है। इस नाम के प्रत्येक शब्द में गहरा अर्थ छिपा है: स्तन-भार (वक्षस्थल का भारीपन या ऐश्वर्य का भार) + दलन्-मध्य (वह कमर जो स्तनों के भार के कारण टूटती हुई या झुकती हुई प्रतीत होती है) + पट्ट-बन्ध (रेशमी पट्टा या सुरक्षा कवच) + वलित्रया (पेट पर स्थित तीन रेखाएँ या तीन वलियाँ)। पूर्ण अर्थ: "वह देवी, जिनके उदर पर स्थित तीन रेखाएँ ऐसी प्रतीत होती हैं मानो वे उनकी सूक्ष्म कमर को भारी वक्षस्थल के भार से टूटने से बचाने के लिए एक 'सुरक्षा पट्टे' या belt की तरह बांधी गई हों"।
आदि शंकराचार्य ने 'सौन्दर्य लहरी' के 80वें श्लोक में इस नाम के भाव को अत्यंत सूक्ष्मता से उकेरा है:
कुचौ सद्यः स्विद्यत्-तट-घटित-कूर्पास-भिदुरौ
कषन्तौ दोर्मूले कनक-कलशाभौ कलयता।
तव त्रातुं भङ्गाद् अलम् इति वलग्नं तनुभुवा
त्रिधा नद्धं देवी त्रिवलि-लवली-वल्लिभिरिव ॥
भावार्थ: "हे देवी! आपके स्वर्ण-कलश के समान भारी स्तनों के कारण आपकी कमर के टूटने का भय बना रहता है। ऐसा लगता है कि आपकी कमर की रक्षा के लिए कामदेव ने तीन लताओं (त्रिवलि) से उसे तीन बार लपेट कर बांध दिया है"। यह श्लोक स्पष्ट करता है कि माँ की 'त्रिवली' केवल शारीरिक लक्षण नहीं, बल्कि उनके विग्रह की सुरक्षा और स्थिरता का प्रतीक है।
त्रिपुरा रहस्य और योगिनी हृदय: 'त्रिपुरा' शब्द स्वयं तीन अवस्थाओं जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति का प्रतीक है। माँ की ये तीन वलियाँ दर्शाती हैं कि वे इन तीनों अवस्थाओं का आधार हैं और उनसे परे 'तुरीय' अवस्था में स्थित हैं।
मूक कवि अपनी रचना में माँ के इस स्वरूप को साधक के लिए 'भक्ति', 'ज्ञान' और 'वैराग्य' की तीन सीढ़ियों के रूप में वर्णित करते हैं।
श्री विद्या साधना और तन्त्र के अनुसार, 'त्रिवली' का गहरा प्रतीकात्मक अर्थ है। ये तीन रेखाएँ माँ की तीन प्रमुख शक्तियों इच्छा, क्रिया और ज्ञान का भौतिक स्वरूप हैं।
ये रेखाएँ सत्व, रज और तमो गुणों के संतुलन को भी दर्शाती हैं। माँ का उदर (मध्य भाग) वह केंद्र है जहाँ ये तीनों गुण शांत और संतुलित अवस्था में रहते हैं।
तंत्र में 'पट्ट-बन्ध' का अर्थ उस 'अनुशासन' और 'योग' से है जो साधक की ऊर्जा को बिखरने से रोकता है। माँ की कमर पर ये रेखाएँ संकेत देती हैं कि जो शक्ति (कुण्डलिनी) मूलाधार से उठती है, उसे इन तीनों स्तरों (ग्रंथियों) को पार कर सहस्रार तक पहुँचना होता है।
'स्तनभरदलन्मध्यपट्टबन्धवलित्रया' नाम का ध्यान करने से साधक के जीवन में स्थिरता और मानसिक संतुलन आता है। यह नाम हमें सिखाता है कि जिस प्रकार माँ ने अपनी सूक्ष्म कमर को 'त्रिवली' के माध्यम से सुरक्षित किया है, हमें भी अपने आध्यात्मिक जीवन को भक्ति और ज्ञान के 'पट्टे' से बांधना चाहिए। जब हम माँ के इस स्वरूप का चिन्तन करते हैं, तो हमारे भीतर की सोई हुई चेतना जागृत होकर उस परम आनंद की ओर बढ़ती है जो माँ ललिता का वास्तविक स्वरूप है।

स्तनभारदलन्मध्यपट्टबन्धवलित्रयायै नमः
जवाब देंहटाएं