सोमवार, 1 जून 2026

18.वक्त्रलक्ष्मी-परीवाह-चलन्मीनाभ-लोचना - वक्त्रलक्ष्मीपरीवाहचलन्मीनाभलोचनायै नमः

वक्त्रलक्ष्मीपरीवाहचलन्मीनाभलोचना

प्रार्थना

शुक्लां बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥

सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
      तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
      सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम्॥

वदनस्मर-माङ्गल्य-गृहतोरण-चिल्लिका।
वक्त्रलक्ष्मी-परीवाह-चलन्मीनाभ-लोचना॥६॥

श्री ललिता सहस्रनाम के सत्रहवें नाम में माँ की धनुषाकार भौहों की सुंदरता का वर्णन करने के बाद, वाग्देवियाँ अब उनके अत्यंत प्रभावशाली और करुणामयी 'लोचन' (नेत्रों) का वर्णन करती हैं। अठारहवाँ नाम है 'वक्त्र-लक्ष्मी-परीवाह-चलन्मीनाभ-लोचना'।

यह नाम माँ ललिता के मुखमंडल को केवल एक चेहरा नहीं, बल्कि सौंदर्य और ऐश्वर्य का एक प्रवाह मानता है।आइए इस नाम के गहरे रहस्यों को समझते हैं:

यह नाम सौंदर्य शास्त्र और अध्यात्म का अद्भुत मेल है: वक्त्र (मुख) + लक्ष्मी (ऐश्वर्य और अपार सौंदर्य) + परीवाह (बाढ़ या जल का प्रवाह) + चलन्-मीन (तैरती या चलती हुई मछलियाँ) + आभ (के समान चमक वाली) + लोचना (नेत्र)। पूर्ण अर्थ: "वह देवी, जिनका मुखमंडल सौंदर्य के बहते हुए प्रवाह (तालाब) के समान है, और जिनके नेत्र उस सौंदर्य-प्रवाह में तैरती हुई सुंदर मछलियों की तरह चंचल और दीप्तिमान हैं"।

आदि शंकराचार्य ने 'सौन्दर्य लहरी' के श्लोक 50 में माँ के इन नेत्रों की चंचलता और उनके कानों तक विस्तार का वर्णन किया है:
कवीनां सन्दर्भ-स्तबक-मकरन्दैक-रसिकं कटाक्ष-व्याक्षेप-भ्रमर-कलभौ कर्ण-युगलम्। 
अमुञ्चन्तौ दृष्ट्वा तव नवरसा-स्वाद-तरलौ असूया-संसर्गादलिक-नयनं किंचिदरुणम् ॥

भावार्थ: "हे माता! आपके दोनों नेत्र कवियों के काव्य-रूपी फूलों के गुच्छों के मकरंद (शहद) का पान करने के लिए लालायित रहते हैं। वे कानों तक इतने लंबे हैं कि मानो वे कानों के पास जाकर उस अमृत को पीना चाहते हैं। आपकी आँखों की इस निकटता और चंचलता को देखकर आपका तीसरा नेत्र (ललाट स्थित) ईर्ष्या से थोड़ा लाल हो गया है"।

मूक कवि द्वारा रचित 'मूक पंचशती' में भगवती के कटाक्ष (तिरछी दृष्टि) की महिमा गाई गई है। इसमें बताया गया है कि माँ के नेत्र 'मीनाक्षी' हैं। जिस प्रकार मछली अपनी पलकें नहीं झपकाती और केवल अपनी दृष्टि से ही अपनी संतानों का पालन करती है, उसी प्रकार माँ ललिता भी बिना पलक झपकाए संपूर्ण ब्रह्मांड का अपनी करुणामयी दृष्टि से पोषण करती हैं।

'देवी भागवत पुराण' के अनुसार, भगवती के नेत्र कमल के दल के समान विशाल और सुंदर हैं। पुराणों में उनके मुख को एक ऐसा सरोवर माना गया है जहाँ 'लावण्य' (सौंदर्य) का अमृत बहता है। उनके नेत्रों की मछलियों जैसी आकृति यह संकेत देती है कि वे ज्ञान और आनंद के सागर में निरंतर 'विहार' कर रही हैं।

माँ का चेहरा शुद्ध चेतना का केंद्र है। 'लक्ष्मी' यहाँ भौतिक धन नहीं, बल्कि 'आत्म-लक्ष्मी' (आध्यात्मिक ऐश्वर्य) है। मीनाक्षी तत्व: साधना में 'मीन' (मछली) एकाग्रता का प्रतीक है। माँ के नेत्र हमें संसार के बंधनों से मुक्त कर अंतर्मुखी होने की प्रेरणा देते हैं। उनके नेत्रों में नौ रसों (प्रेम, दया, वीर आदि) का समावेश है, जो भक्तों की स्थिति के अनुसार प्रकट होते हैं।

'वक्त्र-लक्ष्मी-परीवाह-चलन्मीनाभ-लोचना' नाम का ध्यान करने से साधक के जीवन में मानसिक शांति और दिव्यता का संचार होता है। यह नाम हमें सिखाता है कि माँ की दृष्टि सदैव हम पर बनी हुई है, और उनकी एक तिरछी चितवन (कटाक्ष) ही हमारे जीवन के दुखों को समाप्त कर हमें परम आनंद के सागर में डुबोने के लिए पर्याप्त है।

1 टिप्पणी:

168.निष्क्रोधा - निष्क्रोधायै नमः

प्रार्थना शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान...